हामिद की जगह खुद को कैसे बनवाया राष्ट्रपति?

प्रणव दा की पुस्तक में कई और खुलासे रह गये बाकी

पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी की पुस्तक ‘द कोअलिशन इयर्स’ एक राजनीतिक दस्तावेज बन गयी है। इसमें कई खुलासे किये गये हैं। श्री मुखर्जी कुछ और खुलासे कर पाते तो लोगों को कई और जानकारी मिलती। पुस्तक में कुछ प्रश्न ऐसे हैं जो अनुत्तरित रह गये। उन्होंने हामिद अंसारी की जगह खुद को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाने के लिए सोनिया गांधी पर कैसे दबाव बनाया? सोनिया गांधी ने उनकी जगह मनमोहन सिंह को क्यों चुना? पहले वित्त मंत्री पद क्यों ठुकराया और फिर पांच साल बाद उन्होंने क्यों स्वीकार उसे किया? कुछ ऐसे ही सवाल अनुत्तरित रह गये हैं।

पुस्तक के मुताबिक प्रणव दा ने वर्ष 2004 में सोनिया गांधी से कहा था कि वह वित्त मंत्रालय नहीं चाहते हैं। ऐसे में फिर वर्ष 2009 में उन्होंने यह पद क्यों स्वीकार किया? जबकि पहले उन्होंने यही कह कर पद लेने से इनकार किया था कि उनकी और मनमोहन सिंह की आर्थिक दृष्टि अलग-अलग है। वे लिखते हैं कि वर्ष 1997 में चिदंबरम ने स्वप्निल बजट तो पेश किया, लेकिन आंकड़ों में मात खा गए।

उनकी राजनीतिक स्मृतियों पर आधारित किताबों की इस श्रृंखला में उनकी किताब के तीन खंड आ चुके हैं। बतौर राष्ट्रपति उनके कार्यकाल से जुड़ा चैथा खंड शायद आगे आएगा। जो हो, पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के विवरण और संदर्भ अचूक होते हैं। लेकिन किताब में कई जगह वे संकेतों का जिक्र करते हैं। जबकि कुछ अहम तथ्यों के बारे में कुछ अहम पड़ावों पर विस्तार से प्रकाश डाल सकते थे।

पहले दो खंड उस समय आये जब वे राष्ट्रपति थे। उस पद की मर्यादा का ध्यान रखना जरूरी भी था। तीसरे खंड में तो उनके पास यह बचाव भी नहीं था। अपने कुछ समकालीनों को सांकेतिक रूप से आरोपित भी किया है। प्रणव मुखर्जी ने ही अपने दम पर टीम अन्ना को असंवैधानिक जन लोक पाल के लिए दबाव बनाने से रोका था। वह कुछ अहम घटनाओं के बारे में चर्चा से बचते दिखे। 278 पन्नों की किताब में उस घटना का उन्होंने जिक्र तक नहीं किया है, जिसमें वह दिल्ली हवाई अड्डे पर काले धन के मुद्दे पर बाबा रामदेव से मिलने गए थे।
इंदिरा गांधी की हत्या के बाद प्रणव दा को प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया गया। वर्ष 2004 में सोनिया गांधी ने उन पर भरोसा नहीं किया और पसंदीदा गृह मंत्रालय नहीं सौंपा। वर्ष 2007 में उन्हें राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार नहीं बनाया। हालांकि तब उन्होंने कई तरीके अपनाये और उनका नामांकन हो सका।

दो जून 2012 को वह सोनिया गांधी के साथ एक मुलाकात से पीछे हट गये। चर्चा थी कि वह मनमोहन को राष्ट्रपति बनवाने और उनको प्रधानमंत्री बनवाने वाली हैं। मुखर्जी कहते हैं कि मैंने सुना था कि कौशांबी हिल्स में छुट्टियों के दौरान उन्होंने इस बारे में गंभीरता से सोचा था। बाद में जब उन्होंने सुषमा स्वराज को चेताकर लोकसभा में शांति कायम की तो सोनिया ने उनसे कहा कि इसीलिए आप राष्ट्रपति नहीं हो सकते।

प्रणव मुखर्जी लिखते हैं कि एमजे अकबर उनके राष्ट्रपति पद के नामांकन के लिए भाजपा में सक्रिय थे। वह 27 मई 2012 को प्रणव दा से मिलने आये और उन्हें बताया कि आडवाणी और जसवंत सिंह दोनों उनके समर्थन में हैं। उन्हें लगा था कि उनका चुनाव सर्वसम्मति से होगा। अब उन्होंने अपनी पार्टी को भाजपा से समर्थन जुटाने के बारे में बताया था या नहीं इसका खुलासा नहीं हुआ है। वैसे, वे बताते हैं कि बाला साहब ठाकरे के समर्थन के बाद उनसे मिलकर धन्यवाद देने पर सोनिया गांधी और अहमद पटेल बुरी तरह नाराज हो गए थे।

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