भारतीय संविधान से ‘धर्मनिरपेक्षता’ शब्द हो सकता है बाहर

केंद्रीय राज्य मंत्री अनंत कुमार हेगड़े ने जतायी इच्छा, सेक्युलर शब्द को संविधान से हटाने का दिया संकेत

‘धर्मनिरपेक्षता’ शब्द को भारत के संविधान से बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है। ऐसा संकेत केंद्रीय राज्य मंत्री अनंत कुमार हेगड़े की बातों से मिला है। इस मामले में उन्होंने इच्छा जतायी है। उन्होंने कहा है कि कुछ लोग कहते हैं कि ‘सेक्युलर’ शब्द संविधान में है इसलिए इसे मानना पड़ेगा। इसका सम्मान करना पड़ेगा। आने वाले समय में यह बदलेगा। पहले भी संविधान में कई बदलाव हुए हैं। अब हम संविधान बदलने आये हैं।

हेगड़े ने आगे कहा कि सेक्युलरिस्ट लोगों में नया रिवाज है। कोई खुद को अगर मुस्लिम, ईसाई, लिंगायत या हिंदू बताता है तो मैं खुश होऊंगा। मगर जो खुद को सेक्युलर कहते हैं, मैं नहीं जानता कि उन्हें क्या कहा जाये। दरअसल, ये वो लोग हैं जिनके मां-बाप का पता नहीं होता या अपने खून का पता नहीं होता। कर्नाटक के कोप्पल जिले में ब्राह्मण युवा परिषद के कार्यक्रम में दो दिन पहले बोलते हुए केंद्रीय राज्य मंत्री श्री हेगड़े ने ये बातें कही थीं।

बहरहाल, हेगड़े की बातों की रोशनी में कुछ तथ्यात्मक बातें जरूरी हैं। अब तक सौ से अधिक संविधान संशोधन किये जा चुके हैं। लोगों के जेहन में ये सवाल भी है कि क्या संसद को यह अधिकार है कि वह संविधान की मूल प्रस्तावना को बदल सके? वर्ष 1973 में सुप्रीम कोर्ट के सामने पहली बार यह सवाल आया था। उस समय केसवनंदा भारती बनाम स्टेट ऑफ केरला की सुनवाई में मुख्य न्यायाधीश एसएम सिकरी की अध्यक्षता वाली 13 जजों की बेंच ने इस मामले में ऐतिहासिक फैसला दिया था।

उल्लेखनीय है कि जब वर्ष 1973 में यह केस सुप्रीम कोर्ट में सुना गया तो जजों की राय अलग-अलग थी। पर, सात जजों के बहुमत से फैसला दिया गया कि संसद की शक्ति संविधान संशोधन करने की तो है मगर संविधान की प्रस्तावना के मूल ढांचे को नहीं बदला जा सकता है। संविधान प्रस्तावना की भावना के खिलाफ कोई भी संशोधन नहीं हो सकता है। वैसे, संविधान के आर्टिकल 368 के हिसाब से संसद संविधान में संशोधन कर सकती है। मगर, यह केस इसलिए भी ऐतिहासिक रहा क्योंकि इसने संविधान को सबसे ऊपर माना। न्यायिक समीक्षा, पंथनिरपेक्षता, स्वतंत्र चुनाव व्यवस्था और लोकतंत्र को संविधान की मूल संरचना कहा और साफ किया कि संसद की शक्तियां संविधान के मूल ढांचे को बिगाड़ नहीं सकतीं।

जो हो, सेक्युलर शब्द पर इससे पहले केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह भी ऐतराज जता चुके हैं। उन्होंने सदन में पिछले शीतकालीन सत्र के दौरान कहा था कि देश में सेक्युलर शब्द का सबसे अधिक दुरुपयोग हुआ है और इसे बंद किया जाना चाहिए। अंग्रेजी के शब्द सेक्युलर का औपचारिक अनुवाद उन्होंने पंथनिरपेक्ष बताया था। कहा था कि इसका अनुवाद धर्मनिरपेक्ष नहीं होता है। राजनाथ सिंह ने कहा था कि संविधान में वर्ष 1976 को 42वां संशोधन कर उसकी प्रस्तावना में सेक्युलर और सोशलिस्ट शब्द डाले गये थे। उन्होंने कहा था कि संविधान का मसौदा तैयार करने वाली समिति के अध्यक्ष डॉक्टर भीमराव आंबेडकर इसके पक्ष में नहीं थे। सो, संविधान की प्रस्तावना में इन शब्दों को नहीं डाला गया था।

तथ्यों के अनुुसार संविधान की प्रस्तावना में भी अब तक एक बार वर्ष 1976 में संशोधन किया गया, जिसमें सेक्युलर और सोशलिस्ट शब्दों को शामिल किया गया। मगर, इससे पहले पंथनिरपेक्षता का भाव ही प्रस्तावना में शामिल था। दरअसल, प्रस्तावना में सभी नागरिकों को विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता और समानता का अधिकार पहले से ही लिखित है। वर्ष 1976 के 42वें संशोधन में केवल सेक्युलर शब्द को जोड़कर इसे स्पष्ट किया गया।

वर्ष 1971 की जीत के बाद इंदिरा गांधी सरकार ने संविधान में कुछ ऐेसे संशोधन किये जिससे संसद की शक्ति अनियंत्रित हो गयी। यहां तक कि अदालतों के आदेशों और फैसलों की न्यायिक समीक्षा की शक्ति भी खत्म कर दी गयी। बाद में वर्ष 1973 में केसवनंदा भारती केस में सुप्रीम कोर्ट ने 703 पन्नों का फैसला दिया और स्पष्ट किया कि संसद की शक्तियां अनियंत्रित नहीं हैं। वर्ष 1998 में वाजपेयी सरकार ने भी संविधान की समीक्षा के लिए कमेटी बनायी थी। तब बहस उठी थी कि संविधान के मूल ढांचे को प्रभावित करने की कोशिश है। हालांकि तब तत्कालीन गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने एक लेख में केसवनंदा भारती केस का जिक्र करते हुए लिखा था कि सेक्युलरिज्म भारत की संस्कृति में है। इधर कुछ हफ्ते पहले उपराष्ट्रपति वैंकेया नायडू ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के लिए अपने भाषण में कहा था कि भारत इसलिए सेक्युलर नहीं है क्योंकि यह हमारे संविधान में है, बल्कि भारत के डीएनए में सेक्युलरिज्म है।

 

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