वंशवाद पर भाजपाई सिद्धांत से कई भगवा दिग्गजों के सपने धुंआ

अपने बच्चों को भगवा राज में फिट करने के अरमान लिए कई बड़े नेताओं की कोशिश विफल

वंशवाद पर लालू, मुलायम और गांधी परिवार को कोसने वाले भाजपा के कई दिग्गज भी अपने बच्चों या पत्नी को भगवा राज में फिट करने की कोशिश की, लेकिन भाजपा का एक अनौपचारिक नियम उनके सपनों को धुंआ-धुंआ कर दिया। लिहाजा, अपने बच्चों को पूरी मशक्कत के बाद भी जगह नही दिला पाये कई भगवा दिग्गजों ने खुद को सांत्वना देने में ही मशक्कत का सिरा मोड़ दिया है। जानकारों के मुताबिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने वंशवाद को लेकर एक अनौपचारिक नियम बना बना दिया है।

इस नियम के तहत साफ किया गया है कि अगर बेटा मंत्री बनेगा तो पिता को मंत्री पद से दूर रहना होगा। इसी तरह अगर मां या पिता में से कोई मंत्री या मुख्यमंत्री है तो किसी भी हालत में बेटे या बेटी को प्रदेश या केंद्र सरकार में मंत्री नहीं बनाया जाएगा। ऐसे में भाजपा के तीन मुख्यमंत्री के सपने इस नियम से धुंआ-धुंआ हो गये हैं। सियासी हलकों में चर्चा के मुताबिक छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने अपने बेटे अभिषेक सिंह के लिए लोकसभा का टिकट मांगा और अभिषेक के सांसद बन जाने के बाद उन्हें केंद्र में राज्यमंत्री बनाने की पैरवी भी की थी। लेकिन, उन्हें कामयाबी नहीं मिली।

इसी तरह मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान अपनी पत्नी साधना सिंह को राजनीति में लाना चाहते हैं। मगर, उन्हें टिकट नहीं मिल सका। शिवराज सिंह की पैरवी एक महिला केंद्रीय मंत्री कर चुकी हैं लेकिन उन्हें हर बार मना कर दिया गया है। उल्लेखनीय है कि पिछले कुछ समय से शिवराज सिंह चैहान के बेटे भी सियासी मंच पर दिखने लगे हैं। मगर पार्टी का स्टैंड क्लीयर है कि जब तक शिवराज मुख्यमंत्री हैं, तब तक उनके परिवार के किसी और सदस्य की सियासत में एंट्री नहीं होगी। राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के बीच मनमुटाव भी पार्टी के इसी नियम की वजह से है। उनके बेटे और सांसद दुष्यंत सिंह को बार-बार कहने पर भी मंत्री नहीं बनाया गया। भगवा मुख्यमंत्री पुत्रों में दुष्यंत सबसे पुराने सांसद हैं। राजस्थान की 25 में से 25 सीटें जीतकर नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने में अपनी भूमिका अदा करने के बाद भी उनकी नहीं सुनी गयी है।

सूत्रों के अनुसार जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की पहली मुलाकात हुई तो दुष्यंत को मंत्री बनाने का सपना धंुआ हो गया। दूसरी ओर हिमाचल में भी ऐसा ही होता अगर प्रेम कुमार धूमल चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री बन जाते। हालांकि धूमल का चुनाव हारना और मुख्यमंत्री न बनना उनके पुत्र अनुराग ठाकुर को आगे मंत्री बना सकता है। दिल्ली के राजनीतिक समीकरण को समझें तो अनुराग ठाकुर वित्त मंत्री अरुण जेटली के खास माने जाते हैं। उधर, स्वास्थ्य मंत्री और धूमल विरोधी कहे जाने वाले जेपी नड्डा अमित शाह के खास माने जाते हैं। अनुराग ठाकुर के मंत्री बनने के हर सवाल पर अमित शाह अब तक यही कहकर विराम लगा देते थे कि उनके पिता को हिमाचल का मुख्यमंत्री बनाया जाएगा।

वरुण गांधी भी भगवा राज से इसी नियम के कारण दूर रहे हैं। यही कहकर अमित शाह ने अपनी टीम में उन्हें जगह नहीं दी कि उनकी मां मेनका गांधी मोदी सरकार में मंत्री हैं। राजनाथ सिंह ने उन्हें अपनी टीम में महासचिव का ओहदा दिया था, लेकिन अमित शाह के राज में वरूण को यह भी नहीं मिला। पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा भी इसी नियम के आगे बेबस होकर बागी बने हुए हैं। उनसे पूछा गया था कि वे अपने बेटे जयंत सिन्हा को मंत्री बनाएंगे या फिर खुद सांसद बनेंगे। यशवंत ने बेटे जयंत सिन्हा को अपने चुनावी क्षेत्र हजारीबाग से चुनाव लड़ाया था। जयंत सिन्हा राज्य मंत्री बने लेकिन यशवंत सिन्हा को कहीं भी ‘एडजस्ट’ नहीं किया गया।

पार्टी के इस अनौपचारिक नियम से पार्टी के मार्गदर्शक मंडल के आडवाणी भी बंधे हैं। कहते हैं कि भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी अब अपनी बेटी प्रतिभा आडवाणी को सियासत में लाना चाहते हैं। मगर उनसे कहा गया है कि इसके लिए आडवाणी को अपनी गांधीनगर की सीट छोड़नी होगी। पिछली बार भी उनसे यही कहा गया था। मगर, तब आडवाणी सियासत से रिटायर होने के मूड में नहीं थे। लिहाजा, प्रतिभा का नाम वेटिंग लिस्ट में रखा गया और आडवाणी को टिकट मिला।

 

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