काॅलेजियम प्रणाली से असंतुष्ट भाजपा को मिलेगा मौका?

जजों के विद्रोह से मिलेगा देश की सियासी पार्टियों को न्यायपालिका से खुन्नस निकालने का अवसर

तमाम शिकायतों के बाद भी सुप्रीम कोर्ट के चार सिटिंग जजों का विद्रोह न्यायपालिका यानी लोकतंत्र के मजबूत खंबे को ही हिलायेगा। जजों के विद्रोह के बाद का रास्ता जोखिम भरा हो सकता है। क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद और वित्तमंत्री अरुण जेटली समेत कई केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता कई बार न्यायपालिका को अपने अधिकार क्षेत्र में ही रहने की चेतावनी दे चुके हैं और लक्ष्मण रेखा को नहीं लांघने का सुझाव दिया है। ऐसे में इस विद्रोह को भाजपा न्यायपालिका में हस्तक्षेप का बहाना भी बना सकती है। साथ ही इस पर अंकुश लगाने की कोशिश की जा सकती है।

इतना ही नहीं इस विद्रोह के बाद अन्य राजनीतिक दल भी इस विवाद में कूदेंगे। कांग्रेस ने तो इस मुद्दे पर बाजाप्ता बैठक की और मीडिया तक भी पहुंच गयी। कुछ सियासी दल या नेता प्रधान न्यायाधीश पर या चार विद्रोही न्यायाधीशों पर महाभियोग चलाने की मांग भी कर सकते हैं। बताते चलें कि सरकार पहले से ही कॉलेजियम प्रणाली से असंतुष्ट थी और अब वह इसकी जगह अपनी पसंद की प्रणाली लागू करने की कोशिश भी कर सकती है।

लोकतंत्र में जब-जब लोक की शक्तियां कमजोर हुई है, लोग न्यायपालिका की ओर भरोसे से देखने लगते रहे हैं। मगर, उस भरोसे की रक्षा न्यायपालिका तभी तक कर सकती है जब तक वह निष्पक्ष ढंग से स्थापित परंपराओं का निर्वाह करे और जिम्मेदारी को अंजाम दे। साथ ही कार्यपालिका यानी सरकार से खुद को दूर भी रखे। मगर, न्यायपालिका की निष्पक्ष भूमिका के प्रति अगर खुद न्यायाधीशों को ही संदेह होने लगे तो यह न्यायपालिका व लोकतंत्र के लिए एक खतरा है।

हालांकि अंदर ही अंदर कुछ जरूर पहले से चल रहा है जो 10 जनवरी 2018 को सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे का लेख सामने आया। लेख में उन्होंने देश के सर्वोच्च न्यायालय के कामकाज की समीक्षा की और पूछा कि क्या देश के प्रधान न्यायाधीश कानून के ऊपर हैं या किसी भी अन्य व्यक्ति की तरह कानून के अधीन हैं। अनुभवी और वरिष्ठ विधिवेत्ता दुष्यंत दवे का यह सवाल उठाना स्पष्ट करता था कि सुप्रीम कोर्ट में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। कुछ जानकारों की आशंका सही साबित हुई और दो दिन बाद 12 जनवरी 2018 को सुप्रीम कोर्ट के चार सीनियर जजों ने एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक कदम उठाकर दवे की चिंताओं को पुष्ट किया।

बहरहाल, चारों जजों ने मीडिया तक पहुंच कर देशवासियों को बताया कि प्रधान न्यायाधीश को इस बात के लिए समझाने में असफल रहने के कारण वे ऐसा कर रहे हैं। उन्होंने सात पेज के एक बयान में प्रधान न्यायाधीश पर मनमाने ढंग से केस खंडपीठों के पास भेजने का आरोप लगाया। जाहिर है कि न्यायपालिका के सर्वोच्च स्तर पर इस प्रकार के खुले विद्रोह से न्यायपालिका और लोकतंत्र पर दूरगामी असर पड़ेगा। चारों जजों ने स्पष्ट कर दिया है कि प्रधान न्यायाधीश सरकार और सत्तारूढ़ दल भाजपा के प्रति निष्पक्ष रवैया नहीं अपना रहे।

उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट में प्रधान न्यायाधीश को मिलाकर पांच वरिष्ठतम जजों का एक कॉलेजियम होता है, जो न्यायधीशों की नियुक्ति, प्रोन्नति मामलों को खंडपीठों को आवंटित करने जैसे काम मिलजुल कर आम सहमति पर करता है। वैसे, दशक भर समय से कॉलेजियम प्रणाली के असफल होने की बात कही जाती रही है। मगर, अब ये साफ हो गया है कि यह प्रणाली नाकाम हो चुकी है। क्योंकि, पांच में से चार सदस्य प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा के खिलाफ बागी हो गये हैं। ये चार विद्रोही जज न्यायमूर्ति जे चेलमेश्वर, न्यायमूर्ति रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर और न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ हैं।

इन बागी जजों की शिकायत है कि सीनियर जजों को नजरअंदाज कर मुकदमे मनमाने ढंग से खंडपीठों को आवंटित किये जा रहे हैं और एक खास किस्म के मामले एक खास किस्म के खंडपीठ को दिये जा रहे हैं। सीबीआई जज बीएच लोया की संदिग्ध हालत में मौत का मामला भी उन कारणों में शामिल है, जिन्होंने चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों को विद्रोह के लिए मजबूर किया। लोया उन हत्याओं की जांच कर रहे थे जिनमें भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भी आरोपी हैं।

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