अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कुछ बंदिशें जरूरीः रस्किन बाॅन्ड

पद्मावत फिल्म पर विवाद के साथ उठी अभिव्यक्ति की आजादी के विवाद पर बोले अंग्रेजी के मशहूर भारतीय साहित्यकार

देश में पहली बार सुप्रीम कोर्ट के सिटिंग जजों का मीडिया तक पहुंचकर अपनी बात रखने से पहले पद्मावत फिल्म को लेकर अभिव्यक्ति की आजादी की बहस जोर पकड़ी है। ऐसे में बहस की उलझी डोर के कुछ गांठ अंग्रेजी के मशहूर भारतीय साहित्यककार रस्किन बॉन्ड खोलते हैं। उनका मानना है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को स्वच्छंद और बिना शर्त होना नहीं चाहिए। इस स्वतंत्रता पर कुछ बंदिशें जरूरी हैं।

भुवनेश्वर में तीसरे टाटा स्टील भुवनेश्वर साहित्य महोत्सव में रस्किन बाॅन्ड खुलकर बोले। फिल्म ‘पद्मावत’ से जुड़े एक सवाल के जवाब में बॉन्ड ने कहा कि मुझे नहीं लगता कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बिना किसी शर्त का स्वेच्छाचारी होना चाहिए। हमें खुद को इस देश में रहने के लिए भाग्यशाली मानना चाहिए। रहने के लिए दुनिया भर में भारत से बेहतर कोई जगह नहीं है। मैं वियतनाम, बांग्लादेश, सीरिया, चीन या लेबनान में रहना कतई नहीं चाहूंगा।

मालूम हो कि रस्किन बॉन्ड ने अपनी ज्यादातर रचनाएं जंगल, जानवरों जैसी प्राकृतिक चीजों पर तैयार की है। लोगों से उन्होंने पर्यावरण का ख्याल रखने की अपील की। साथ ही कहा है कि इन्हीं चीजों की वजह से हमारा जीवन मुमकिन हुआ है। रस्किल बाॅन्ड ने नये लेखकों को अपनी भाषा का सम्मान करने और जिंदगी में कभी-कभार होने वाली निराशाओं के लिए तैयार रहने का सुझाव दिया। रस्किन बॉन्ड बाल साहित्य लिखने के लिए मशहूर हैं। कार्यक्रम में उनकी झलक पाने के लिए बड़ी संख्या में बच्चे और टीन एजर्स मौजूद थे।

उल्लेखनीय है कि रस्किन बॉन्ड को वर्ष 1992 में ‘Our Trees Still Grow in Dehra’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था। वर्ष 1999 में पद्मश्री और वर्ष 2014 में उन्हें पद्मभूषण मिला था। ‘द ब्लू अम्ब्रेला’, ‘द रूम ऑन द रूफ’, ‘रस्टी रन्स अवे’, ‘अ फ्लाइट ऑफ पिजन्स’, ‘द पेंथर्स मून’, ‘एंग्री रिवर’, ‘रोड टू मसूरी’ रस्किन बॉन्ड के लोकप्रिय उपन्यास हैं।

 

You May Also Like

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *