गुजरात में भाजपा को हराना चाहते थे तोगड़िया?

लगातार तीन चुनावों में गुजरात से भाजपा को हटाने का चला था दांव, हार्दिक पटेल को प्रोजेक्ट करने के बाद इस बार उन्हें दिया गुरुमंत्र

कोई पांच सालों तक गुमनामी में रहे विहिप नेता प्र्रवीण तोगड़िया के बारे में गुजरात चुनाव के दौरान यही चर्चा रही थी कि वे भाजपा को हराने के लिए रणनीति बना रहे हैं। चर्चा तो यहां तक रही है कि पाटीदार नेता हार्दिक पटेल को प्रोजेक्ट भाजपा और मोदी से नाराज तोगड़िया ने ही किया था। दरअसल, तोगड़िया भी हार्दिक की तरह पटेल जाति से ही आते हैं। लेकिन, पटेलों के भीतर किसी मान्य नेता की कमी के चलते इस जाति के वोट का इस्तेमाल भाजपा के खिलाफ नहीं हो पाता था। लिहाला, हार्दिक को प्रोजेक्ट करने के बाद इस बार के चुनाव में उन्हें गुरुमंत्र भी तोगड़िया ने ही दिया था।

हालांकि प्रवीण तोगड़िया को पिछले पांच साल से मीडिया ने भुला ही दिया था। पत्रकार उनसे मिलने उनके न्योते पर भी नहीं आते थे। अफसर भी उनसे दूर भागने लगे थे। भाजपा के नेता भी प्रवीण तोगड़िया से लगभग परहेज की मुद्रा में थे। गुजरात पुलिस की मानें तो तोगड़िया को खबरों में आने के लिए ‘स्टंट’ करना पड़ा। गुजरात सरकार और कई भाजपा नेता इसे ‘स्टंट’ साबित करने में ही लगे हैं। तोगड़िया ने प्रेस कांफ्रेंस में रो-रोकर बताया कि उनका ‘एनकाउंटर’ भी हो सकता था। हालांकि, कुछ लोगों का मानना है कि तोगड़िया जब ‘एनकाउंटर’ की बात कर रहे थे तो उनका असली मतलब था पॉलिटिकल एनकाउंटर।

जानकार मानते हैं कि गुजरात विधानसभा चुनाव के बाद प्रवीण तोगड़िया के राजनीतिक एनकाउंटर की तैयारी हो चुकी थी। भाजपा और संघ में चर्चा आम थी कि गुजरात में नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी को हराने के लिए तोगड़िया ने इस बार भी पूरा जोर लगा दिया था। इसके प्रमाण तब मिले जब उनसे भाजपा विरोधी कई लोगों ने मुलाकात की। बेहोश तोगड़िया के होश में आने पर उनसे जिन जाने माने लोगों ने मुलाकात की उसमें पहले हैं हार्दिक पटेल। हार्दिक ने गुजरात में मोदी अमित शाह की जोड़ी को हराने की कसम खायी थी। जानकार तो यहां तब बताते हैं कि हार्दिक को पटेल जातियों के मुद्दे के साथ एक युवा नेता के रूप में पर्दे के पीछे से तोगड़िया ने ही प्रोजेक्ट किया था।

बहरहाल, हार्दिक पटेल ऐसे नेता हैं जो अब सिर्फ पटेल जाति की नहीं पूरे हिंदू धर्म की सियासत करना चाहते हैं। सो, वे राम मंदिर बनाने की वकालत भी करते हैं और राहुल गांधी के समर्थक होने के बावजूद प्रवीण तोगड़िया के शिष्य भी हैं। तोगड़िया से मिलने पूर्व आईपीएस अफसर डीजी वंजारा भी गये थे। वंजारा इशरत जहां एनकाउंटर केस में जेल गये। एक समय वे अमित शाह के करीबी माने जाते थे, लेकिन बाद में उन्होंने जेल से ही एक सार्वजनिक पत्र लिखकर उनपर कई आरोप लगाये थे। इस बार वे भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ना चाहते थे, लेकिन उन्हें टिकट नहीं मिला। इससे वंजारा भाजपा के खिलाफ हो गये थे।

मालूम हो कि वर्ष 2002 से पहले जब अमित शाह प्रदेश स्तर के नेता भी नहीं थे, तब तोगड़िया तत्कालीन मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल के अमित शाह हुआ करते थे। गुजरात में जब केशुभाई शीर्ष पर थे तो हिंदू राजनीति के प्रतीक तोगड़िया ही थे। वैसे, तोगड़िया और नरेंद्र मोदी अच्छे मित्र थे और गुजरात के पुलिस अधिकारी तोगड़िया के इशारे पर चलते थे। तोगड़िया का कद बढ़ता जा रहा था। भगवा राजनीति में वे इतने अपरिहार्य होते गये कि भाजपा के साथ संघ के भी कंट्रोल से बाहर हो गये।

भाजपा में अटल-आडवाणी राज के दौरान तोगड़िया को रास्ते पर लाने के लिए उनके मित्र नरेंद्र मोदी की गुजरात में वापसी हुई थी। मोदी राज की शुरूआत में भी तोगड़िया की ही तूती बोलती थी। तोगड़िया के नजदीकी ही गुजरात के गृह मंत्री बनाये गये थे, सो कहते हैं कि वर्ष 2002 में गुजरात में हुए दंगे भी काबू से बाहर हो गये थे। वर्ष 2002 के बाद नरेंद्र मोदी गुजरात और देश भर में हिंदुत्व के प्रतीक बनते चले गये और तोगड़िया की जगह मोदी से भरती गयी।

गुजरात के भाजपा नेताओं का मानना रहा है कि पिछले तीन चुनावों से तोगड़िया मोदी को हराने की कोशिश करते हैं, लेकिन कामयाब नहीं होते हैं। पिछले दो दिनों में अहमदाबाद की सड़कों और अस्पताल में हुआ सबकुछ उसी हारे हुए नेता की एक और कोशिश थी। विहिप एक नेता की मानें तो शुरू में सच में चिंता हुई कि प्रवीण भाई अचानक कहां गायब हो गये? उनका स्वास्थ्य भी ठीक नहीं चल रहा इसलिए चिंता हुई। लेकिन, आ रही खबरों से लगता है कि तोगड़िया गायब नहीं हुए थे। अपनी शक्ति वे आजमाना चाहते थे। दिल्ली से लेकर गुजरात के जिले-जिले में उन्होंने अपने शुभचिंतकों तक संदेश भिजवाया, मगर सुब्रहमण्यम स्वामी को छोड़कर किसी ने उनकी खैरियत नहीं पूछी। गुजरात में भी लोग सड़कों पर बहुत कम लोग ही निकले। सो, आखिरकार तोगड़िया को सामने आना पड़ा और प्रेस कांफ्रेंस के जरिए भावनात्मक बातें कहनी पड़ी।

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