‘अंबानी’ के ‘बेस्ट बंगाल’ में ‘हवा’ में उड़ेगी ‘ममता’

‘कोलकाता’ के बहाने ‘दिल्ली’ तलाश रही राजनीति का ‘बिगबाजार’, ‘चैतन्य’ की ‘प्रेमधारा’ की होगी ‘मार्केटिंग’, ‘नैनो’ के कारखाने (!) में ‘सरसों’ की खेती

उत्तम मुखर्जी

बंगाल में कभी चैतन्य की प्रेमधारा बहती थी। कृष्ण-प्रेम की मार्केटिंग नवदीप के इस्कॉन से खूब हो रही है। निमाई के कीर्तन की धारा में कभी मुस्लिम नवाब भी बह जाते थे। आधुनिक बंगाल के रूपकार डॉ विधान चंद्र राय को कौन नहीं जानता! वे सिर्फ एक झलक देखकर बीमारी ही नहीं बता देते थे बल्कि ‘प्रेम’ की पूजा करते थे। जिसे चाहा वह नहीं मिली तो सीएम बनने के बाद उसके नाम ‘कल्याणी’ नगर बसा दिया। औद्योगिक क्षेत्र है कल्याणी। वहां इंजीनियरिंग कॉलेज है। कल-कारखाने लगे। कृष्ण प्रेम की सुधा वहां प्रवाहित हुई तो कल्याणी बीयर की धारा भी बही।

बंगाल की राजनीति की दशा-दिशा उद्योग-धंधों से तय नहीं होती है। खेत-खलिहानों में वहां की धड़कन सुनाई पड़ती है। यही वजह है कि तीन दशक से अधिक समय तक ज्योति बसु का राज वहां भूमि सुधार के नाम पर चला। जैसे ही बुद्ध ने औद्योगिक संस्कृति की धारा बहानी चाही सिंगूर ने ममता के छांव तले बंगाल की राह ढूंढ दी और बुद्ध (सीएम बुद्धदेव) का संन्यास हो गया।

कोलकाता जाने के लिए एक्सप्रेस वे में अब टाटा का स्ट्रक्चर नहीं दिखता है। अठारह सौ करोड़ की संपत्ति को तोड़कर धरती में मिला दिया गया है। अब वहां सरसों की खेती हो रही है। वह भी मामूली। सिर्फ किसान ही इस्तेमाल कर सकते हैं। टाटा के ताज बेंगल में जब रिलायंस के मुकेश भाई ने कहा कि दीदी ने वेस्ट बंगाल को बेस्ट बंगाल बना दिया तो सभी चैंक गये। अंबानी-अडानी की जोड़ी दिल्ली की राजनीति में चर्चित है, लेकिन कोलकाता में ये खुद को महफूज समझ रहे। चकमे की राजनीति समझिए बंगाल ने नैनो को खारिज किया तो गुजरात ने लपक लिया। अब प्रणव अडानी बह रहे दीदी की ममता-धारा में। कल टाटा के नैनो स्थल पर अंबानी-अडानी की फसल न लहलहाए यह कौन जानता है।

बंगाल की हवा स्पाइस को भी रास आ रही। शीघ्र कुछ नये उड़ान भरेंगे। उड़ना बंगालियों के खून में है। एक जमाना था कोलकाता से एक दर्जन उड़ान विदेशों के लिए थी। आज सिर्फ डोमेस्टिक उड़ान के बल पर कोलकाता है। बंगाल की आर्थिक बदहाली का इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि सरकार कर्मचारियों का बकाया डीए भी नहीं दे पा रही।

कुछ समय पहले तक जो सरकार कहती थी कि कारखाना नहीं लगेगा बल्कि भूमि की वापसी होगी। बंगाल में मुड़ी और चप पर गरीब निर्भर करते हैं। यही क्षुद्र उद्योग लहलहायेगा। ठीक इसके उलट अंबानी, अडानी, कोटक, जेट…बेस्ट बंगाल में तलाश रहे बांग्ला-प्रेम की रसधारा। लक्ष्मी आएगी या नहीं यह भविष्य बताएगा लेकिन मित्तल (लक्ष्मी) की एंट्री हो गई है। साथ में बियानी भी हैं। औद्योगिक बदहाली से सांस फूल रहे बंगाल में नए बाजार की तलाश है। शायद नये समीकरण में ममता का हाथ पकड़कर दिल्ली ढूंढ़ ले राजनीति का ‘बिगबाजार’।

 

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