साल 2018 में लिखा गोस्वामी तुलसीदास का व्यंग्य!

पाठकों से आग्रह है कि नया काम शुरू करने के एक साल बाद गोस्वामी जी की लिखी इस रचना को पढ़ें जरूर, मगर समझने की कोशिश हरगिज न करें… उन्होंने लाभ के पदसे स्वैच्छिक सेवानिवृति ली थी। आईये अब सीधे रचना पर चलें-

अब बहुत अच्छा काम है। बीते एक साल से कुछ-कुछ आराम है। बड़ी राहत है। क्योंकि, दलाली में दक्ष होना अपने इस नये काम में अनिवार्य नहीं। अपनी कंपनी के हाकिम जो बीच-बीच में टुक्कड़खोरी और चापलूसी की कुशलता के लिए कौशल विकास प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करवाते थे, उससे भी निजात मिल गयी है।

जो हो, लौंडे वाली नौकरी से खुद को मुक्त करिये लिया। जी का जंजाल छुटा गोस्वामी। आधा वक्त कलम घिसायी और आधा समय सेल्स ब्याॅय बनकर धनपशुओं के द्वारे-द्वारे। थू-थू। कहां चप्पक-छप्पक गोस्वामी? थूक-खखार, मूत-पेशाब में हाथ और पांव ही नहीं गोस्वामी…पूरी देह भी नहीं, पूरी आत्मा चपचपा रहे थे गोस्वामी। कहां, पढ़े-लिखे। आध्यात्मिक, मर्यादा पुरूषोत्तम को गढ़ने वाले गोस्वामी। और कहां, अधेड़ावस्था में सेल्स लौंडा बनकर बादल, हवा, मुसाफिर और भटकता भूत बने फिर रहे थे गोस्वामी। जो हो, अब बहुत अच्छा काम है। बीते एक साल से कुछ-कुछ आराम है। बड़ी राहत है।

छोड़ो, मत कहो ‘लाभ का पद’। इसमें तो अलाभ ही अलाभ था। अब समझ में आया। सबकुछ फरेब था। बड़का हिजड़ा… नहीं-नहीं किन्नर था यह ‘लाभ का पद’। लिपिस्टिक, सिंदूर, पाउडर, बिंदी, क्रीम चोप कर और जूड़े में फूल खोंसकर 22 साल के लड़कों को रिझाता था यह ‘लाभ का पद’। पुलिस, नेता, सरकारी हाकिम के नजदीक जाने की प्यास लेकर जो लड़का फंसा, धंसते-धंसते धंसिये गया। सब रस किन्नरवा निकाल लेता। मगर, मजबूरी देखो चालिसा पार करने के बाद भी सेल्स लौंडा बने फिरते रहता। जो हो, अब बहुत अच्छा काम है। बीते एक साल से कुछ-कुछ आराम है। बड़ी राहत है।

बात में झूठ। औकात में झूठ। झूठ का दांत निपोरना। झूठ की खेती। कहां चले थे पुलिस, नेता, सरकारी हाकिम से नजदीकी साधने। और, कहां कौशल विकास प्रशिक्षण कार्यक्रम में दूम हिलाना सीख गये। लेकिन, वफादारी को छोड़ कर बाकी सब गुण को अपने में समाहित किया। ओह आये थे रसूख बनाने और किरानी डाॅग बनकर रह गये। कर लिया अपना बंटाधार। क्यों नहीं कोई इज्जत का काम करते?

जो हो, अब बहुत अच्छा काम है। बीते एक साल से कुछ-कुछ आराम है। बड़ी राहत है। इस काम में रहते हुए एक साल से झूठ बोलने की जरूरत नहीं पड़ी। ‘लाभ के पद’ से लाभ लेने वाले स्वार्थसाधकों से सिंथेटिक और आर्टिफिशियल दोस्ती भी छुटी। ये तो इस ‘लाभ के पद’ से मुक्ति के कारण हासिल हुआ बड़ा मोक्ष है। सो, मोक्ष दिवस पर आयोजित प्रार्थना सभा में- ‘गोस्वामी जब नाम सुनावे स्वार्थसाधक निकट न आवै’ का मंत्र गूंजेगा।

‘लाभ के पद पुरान’ पर विमर्श के बीच कुछ और दिलचस्प बात है, उसे भी सुन लें। उस अधेड़ लफंगा-लंगटलोहदा की दोस्ती से गोस्वामी को मोक्ष मिल गया। जिसके बेटे की शादी में गोस्वामी से जाया न गया, क्योंकि उससे बुलाया न गया। हां, अपना जो चूतिया-फरेबी यार था… याद है ना। बात-चीत में फोन पर जब भी- कहां हैं? पूछिये- कहता था ‘आपके दिल’ में। पता नहीं इन दिनों वह अंतरध्यान है किस बिल में।

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