आदिवासी आकांक्षा का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता अंबेदकरवाद

विश्व आदिवासी दिवस पर मौजूदा समय से टकराता विमर्श

अमित राजा

आदिवासी शब्द सामने आते ही छल-प्रपंच, नकारात्मकता से मुक्त और बदलावकारी आंदोलनों के कर्मठ लड़ाके और संघर्षशील इंसान की छवि उभरती है। मगर, वह हर कहीं छला गया। उसके आंदोलन कई बार बेचे गये। जल, जंगल, जमीन पर गांव-समाज के अधिकार की मांग तो पूरी नहीं हुई ऊपर से वह घर से भी बेदखल हुआ। आदिवासी मतलब जिनका चलना नृत्य व बोलना संगीत है। आदिवासियों का यह दर्शन उनके पूरे जीवन को ही उत्सव बना देता है। जहां, सिर्फ आज की चिंता होती है। न तो वे बीते कल में झांकते हैं और न आने वाले कल की फिक्र में उत्सव सरीखे अपने जीवन के आनंद को कम करते हैं। दरअसल आदिवासी कोई जाति नहीं, एक समृद्ध संस्कृति का नाम है। लेकिन, जिस झारखंड का निर्माण ही आदिवासियों की मुश्किलों का निदान खोजने के लिए हुआ, उस झारखंड की राजनीति आज आदिवासी मुखी न होकर सत्ता मुखी हो गयी है। जल, जंगल, जमीन छीने जाने के खतरे से मुक्ति का मार्ग आदिवासियों के जीवन और उनकी संस्कृति में ही अंतर्निहित है। यह मार्ग बिरसा, तिलका, सिद्धु-कान्हू के विचारों से होकर ही गुजरेगा। लेकिन, आज अंबेदकरवादी आदिवासियों के सवाल उठा रहे हैं। अगर आदिवासियों ने अंबेदकरवादियों का नेतृत्व स्वीकार कर लिया तो वे फिर से ठगे जायेंगे।

अंबेदकर का विचार और बिरसा मुंडा, तिलका मांझी या सिद्धु-कान्हू का रास्ता जुदा-जुदा है। अंग्रेजों के खिलाफ लिखने और उनकी आलोचना के बाद अंबेदकर अंग्रेजों की सत्ता में शामिल हो गये। भारत की गुलामी का विरोध नहीं किया। जबकि बिरसा, तिलका, सिद्धु-कान्हू ने अंग्रेजी सत्ता को चुनौती दी। लड़े। अंग्रेजों के साथ सत्ता की थाली में खीर नहीं खाया। बिरसा, तिलका, सिद्धु-कान्हू के समकालीन भी नहीं हैं अंबेदकर। अंबेदकर के समकालीन तो जयपाल सिंह मुंडा हैं। मगर, जयपाल सिंह मुंडा लगभग भुला ही दिये गये हैं। जयपाल सिंह मुंडा ने संविधान में आदिवासियों को दलितों के बराबर अधिकार दिलाने का संघर्ष किया। लेकिन, अंबेदकर की जिद की वजह से संविधान में आदिवासी शब्द शामिल नहीं हो सका।

संविधान में कहीं भी आदिवासी शब्द नहीं है। दिल्ली हाई कोर्ट ने जजमेंट दिया है कि आदिवासी की लाक्षणिकता अनुसूचित जनजाति में नहीं है। इसलिए संविधान में आदिवासी शब्द ना डाल कर आदिवासियों से छल किया गया है। इन्हीं कारणों से आदिवासी सवालों पर लिखने वाले ग्लैडसन डुंगडुंग तो सीधे दलित आंदोलन और बाबा साहेब की सीधी आलोचना से भी नहीं हिचके। उनका मानना है कि संविधान में आदिवासियों को जो भी हक मिले, वह केवल एक आदिवासी नेता जयपाल सिंह मुंडा की ही देन हैं। डुंगडुंग के अनुसार डॉ आंबेडकर आदिवासियों को कुछ भी नहीं देना चाहते थे। संविधान सभा में आदिवासी मुद्दों पर डॉ आंबेडकर और जयपाल सिंह मुंडा के बीच काफी द्वंद्व, तकरार और मतभेद थे। इस मुद्दे पर जयपाल सिंह मुंडा अकेले पड़ गये और उन्हें संविधान सभा में साथ देने वाला कोई भी नहीं मिला। वहीं इस परिस्थिति का फायदा उठाकर डॉ आंबेडकर ने आदिवासी मुद्दों की कीमत पर दलित अधिकारों को आगे रखकर संविधान सभा के सदस्यों को अपने पक्ष में कर लिया।

दलितों के सवाल और आदिवासियों का मसला भी अलग-अलग है। इसलिए एक मंच पर दोनों के सवाल रखे जाने पर आदिवासी फिर छले जाएंगे। छुआ-छुत के दौर में दलितों के भीतर मंदिर प्रवेश को लेकर बड़ी बेचैनी थी। जबकि आदिवासियों का ध्यान इस मसले पर गया ही नहीं। आदिवासी परिवारों में ही आपको धर्म के लिहाज से लघु भारत का दर्शन हो जाएगा। पांच सदस्यों के आदिवासी परिवार में इसाई, सरना और हिन्दू भी दिख जाएंगे। इसलिए जातिवाद की राजनीति आदिवासियों को पचेगी नहीं। हिन्दू धर्म से पलायन के लिए पहले अंबेदकर ने इस्लाम पर विचार किया और बाद में वे बौद्ध बन गये। मगर, आदिवासी प्रकृति पूजक हैं और वे बिना किसी धर्म के भी रह सकते हैं। अंबेदकरवादियों ने दलितों को धर्म के बिना खड़े रहना नहीं सिखाया। अंबेदकरवादी जातिवादी सियासत को आदर्श राजनीति का प्रतिमान मानते हंै। जबकि आदिवासी गांव-समाज को कन्यून यानी समुदाय बनाने की कोशिश करते हैं। जातीय राजनीति गांव-समाज को एक कम्युन बनाने की जगह इसे एक अलगाववादी, रुग्ण और विकलांग समाज के ताने-बाने से युक्त करती है।

दलितों को मंदिर प्रवेश मिल जाने के बाद अंबेदकरवादियों ने हिन्दू धर्म के मिथकों को सामने लाने को कोशिश की और बाद में एक तरह के मिथक का ही पक्षपोषण किया। उनके लिए राष्ट्रीय समस्या ब्राह्मणवाद है। इसका विरोध करते हुए वे एक प्रति संस्कृति के निर्माण और समानांतर परंपरा के संधान की कोशिश करते हैं। मिथकों की पुनर्व्याख्या करते-करते वे मिथकों को ही हथियार बना लेते हैं। महिषासुर को नायक बनाने वाले ये लोग मिथकों का ऐसा ही प्रयोग करते हैं। जबकि आदिवासियों के लिए जंगल, पानी और जमीन पर समुदाय की मिल्कियत ही मुख्य मुद्दा है। आज के अंबेदकरवादी़ कहते हैं कि दलित ही दलित का दर्द समझ सकता है। दलितों पर खूब स्याही और कागज खर्चने वाले मुंशी प्रेमचंद के साहित्य को वे दलित साहित्य मानने से इंकार कर देते हैं। इनका मानना है कि दलितों की मुक्ति के लिए बोलने का अधिकार भी गैर दलितों के पास नहीं है। जबकि वास्तव में दलित अस्मिता को स्थापित करने के सिवा अंबेडकर के पास दलित मुक्ति का कोई रास्ता नहीं था। सिर्फ भावनाओं के धरातल पर और दलित आबादी के तुष्टिकरण के लिए ही काम हुआ।

दूसरी ओर आदिवासियों के साथ ऐसी बात नहीं है। गैर दलित महाश्वेता देवी, अमर कुमार सिंह, डॉ बीडी शर्मा, डॉ कुमार सुरेश सिंह के शोधों को उन्होंने सराहा। इसे आदिवासी साहित्य का नाम दिया। आदिवासियों का जीवन स्त्री-पुरूष और प्रकृति-पशु के बिना संपूर्ण नहीं होता। इंसानों के साथ वे पशुओं की भी चिंता करते हैं। एक समय ऐसा था जब आदिवासी गांव का कोई व्यक्ति जग्ंाल से कटहल तोड़ लाता तो गांव के प्रधान उसे दंडित करते थे। उनका मानना था कि जंगल के फलों पर जगली जानवरों का अधिकार है। जंगल से फल तोड़ कर ले आने पर जंगली पशुओं को भोजन नहीं मिलेगा और वे गांव में भोजन की खोज के लिए दाखिल होंगे। आज हाथी गांव में घुस रहे हैं। तबाही मच रही है तो सिर्फ इसलिए कि आदिवासियों की संस्कृति और उनकी समाज-व्यवस्था ध्वस्त कर दी गयी। आज जंगल के जंगल काटे जा रहे हैं। आदिवासी आज में जीते हैं। निश्छल पशु पेट भरने के बाद दोबारा शिकार तबतक नहीं करते जबतक कि दोबारा उन्हें भूख नहीं लगती। उसी तरह आदिवासी आज में जीते हैं। भ्रष्ट नहीं होते। जरूरत पड़ने पर ही भोजन और संपत्ति का जुगाड़ करते हैं। इसे गलत तरीकों से जुटाते नहीं। भ्रष्टाचार के दोषी या आरोपी कुछ आदिवासी ने कुछ गलत किया है तो इसलिए कि वे बाहरी संस्कृतियों के संक्रमण में आ गये।

आदिवासी व्यवहारिक भी होते हैं और सकारात्मक भी। आदिवासियों ने अपराध या भ्रष्टाचार के मामले में किसी आदिवासी को हुई सजा पर कभी सवाल नहीं उठाया। जबकि लालू प्रसाद यादव या अन्य किसी जातिवादी नेता को जब भी अदालत ने सजा सुनायी है, अंबेदकरवादी इसका विरोध करने से नहीं चुकते। वे पूरी न्याय व्यवस्था को ही ब्राहम्णवादी-मनुवादी घोषित कर देते हैं। यही हालत रही तो कल सेक्शन 377 मामले की सुनवाई में किन्नर जज की मांग भी उठ सकती है। बहरहाल, अंबेदकर की रचना ‘जाति का उन्मूलन’ में वह कहीं भी नहीं बताते कि जाति का उन्मूलन कैसे होगा। उल्टे अंत में वह इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि जाति का उन्मूलन हो ही नहीं सकता, क्योंकि ब्राह्मण ऐसा होने नहीं देंगे। जाहिर है, ब्राह्मणों से इजाजत लेकर जाति का खात्मा नहीं हो सकता है। अंबेडकर अंत में बौद्ध धर्म को अपना लेने में ही दलितों की मुक्ति देख रहे थे। लेकिन इतिहास ने प्रदर्शित कर दिया है कि बौद्ध धर्म अपनाने वाले दलित नवबौद्ध कहलाये और उस धर्म में भी जाति का प्रवेश हो गया। वहां भी उनकी स्थिति दलितों जैसी ही बनी रही। इसलिए आदिवासियों को बिरसा, तिलका को ही आगे कर राजनीति करनी होगी और भूल से विपरीत विचारधाराओं संग मंच साझा करने से बचना होगा।

 

 

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