जन गन मन में भला वह कौन भारत भाग्य विधाता है…

अमित राजा

पैसे से सत्ता और सत्ता से पैसा। सत्ता के लिए सियासत को साधने का हरेक तरीका भी पैसे से होकर ही अपना रास्ता बना रहा है। राजनेता, कारपोरेट और मुट्ठी भर प्रभु वर्ग की दौलत में बेतहाशा वृद्धि हो रही है। लेकिन, सैंकड़ों अरबपतियों-खरबपतियों वाले अपने देश में ‘भूख’ अब भी बड़ी समस्या है। यह हालत देश को आजादी मिले 70 साल से अधिक हो जाने के बाद भी कायम है। हद तो ये कि आज जब हम देश को मिली आजादी का जश्न मना रहे हैं, तब भी भूख, रोग, पसीना, धूप, ठंड से बचाव के साधन चंद लोगों के ही हाथ है। इन हालातों में अपनी पंक्ति के साथ रघवीर सहाय उपस्थित हो पड़ते हैं- ‘जन गन मन में भला वह कौन भारत भाग्य विधाता है / फटा सुथन्ना पहने जिसके गुण हरचरना गाता है।’ मगर, अफसोस तो ये है कि आजादी के इतने सालों बाद भी रघुवीर सहाय के सवाल अनुत्तरित हैं।

वैश्विक महाशक्ति बनने की राह पर आगे बढ़ रहे भारत के लिए हाल ही में आयी ग्लोबल हंगर इंडेक्स की रिपोर्ट चिंताजनक तस्वीर पेश करती है। रिपोर्ट के अनुसार भारत में ‘भूख’ अभी भी एक गंभीर समस्या है। पिछले वर्ष ग्लोबल हंगर इंडेक्स में 97वें स्थान पर रहने वाला भारत, अब तीन पायदान नीचे खिसक कर 100वें स्थान पर पहुंच गया है। जाहिर है ‘भूख’ लाइलाज हो चला है। मगर, देश का भविष्य जिन सियासी दलों के हाथ में है, वे भूख से हुई मौतों पर शोर तो मचाते हैं, पर उनके लिए या तो देश की राष्ट्रीय समस्या ब्राह्मणवाद-सवर्णवाद है या फिर घुसपैठिया हैं या मुस्लिम। ‘भूख’ न तो आजादी के पहले हमारे तथाकथित मसीहा को बड़ी समस्या दिखी और न आज दिख रही है।

आजाद भारत में भी भूख से मौत को बीमारी का नाम दिया जा रहा है और गुलाम भारत में भूख से मौतों की वजह बीमारी बतायी गयी थी। झरिया में कोयला मजदूरों की मौत पर पूछे गये सवाल के जवाब में श्रम मंत्री, वायसराय जनरल काउंसिल (1942-46) डॉ अंबेदकर ने कहा था कि झरिया में कोयला मजदूरों की मौत भूख से नहीं मलेरिया से हुई है। यह सत्ता का चरित्र है और जब भी लोकतंत्र का लोक जाति व धर्म में बंटता है तो सत्ता लोक दबाव से मुक्त होकर इसी चरित्र को धारण कर लेती है। आज हम आजादी का जश्न तो मना रहे हैं, मगर इस बात का संकल्प नहीं ले रहे हैं कि आगे से वोट की राजनीति के लिए इंसानों को जाति व धर्म में विभाजित नहीं करेंगे। दूसरी ओर लोकतंत्र का लोक भी मुल्क को मिली आजादी की वर्षगांठ पर जाति और धर्म के नाम पर नहीं बंटने की कोई शपथ नहीं ले रहा। कुल मिलाकर जाति-धर्म में बंटा हुआ लोक मदारी बने नेताओं के आगे जम्हूरे की भूमिका में आ जाता है।

बहरहाल, आजादी के फौरन बाद देश के कुछ प्रगतिशील तबके ने एक नारा दिया था- ‘देश की आजादी झूठी है, आधी जनता भूखी है।’ मगर, हालात सात दशक बाद भी नहीं बदले हैं। इंटरनेशनल राइट्स ग्रुप ऑक्सफैम की इसी वर्ष 2018 के जनवरी में जारी सर्वे रिजल्ट के मुताबिक 67 करोड़ भारतीयों की संपत्ति में महज 1 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। पिछले साल भारत में जितनी संपति का निर्माण हुआ, उसका 73 प्रतिशत हिस्सा देश के एक प्रतिशत धनाढ्य वर्ग ने हथिया लिया है। एक अध्ययन में कहा गया है कि न्यूनतम मजदूरी पाने वाले ग्रामीण भारत के किसी मजूदर को देश के किसी गारमेंट कंपनी के एक टॉप एग्जिक्युटिव की एक साल की आमदनी के बराबर कमाई करने में 941 साल लग जाएंगे।

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