फासीवाद के चंगुल में आजादी

मनोज भक्त

आज 71 साल बाद हम नेहरू की उस गुंजती आवाज को फिर सुनें तो एक विडंबना सामने खड़ी मूर्त हो जाती है. नियति से यह तयशुदा मुलाकात एक भयावह दु:स्वपन से होकर गुजरती लगती है. संविधान क्लब के सामने सत्ता की पगुराती हुई मनुवादी टोली जंतर-मंतर में संविधान जला रही है. उमर खालिद को संविधान क्लब में गोली मारी जाती है क्योंकि उसने आजादी की बात की थी. चालीस लाख लोगों पर नागरिकता-हरण की तलवार लटकाकर सत्ता में बैठी भाजपा एनआरसी को चुनावी सान दे रही है. बच्चियां बालिका-गृहों में नेताओं-अफसरों की हवस का निवाला बन रही हैं. खेत में काम कर रहे आदिवासियों को मारकर नक्सली हिंसा रोकने का टारगेट-डिजिट पूरा किया जा रहा है. गाय पालने वाले रकबर की हत्या होती है, अलीमुद्दीन के हत्यारों को केंद्रीय मंत्री माला पहना रहे हैं और दलितों के लिए बराबरी की बात करना गुनाह है. वैज्ञानिकों-तकनिशयनों-चिकित्सों की गोष्ठियों में भारत का प्रधानमंत्री गणेश सर्जरी और नाले की गैस की चाय पर तालियां बटोरता है.

bhagat-singhjpg220px-Dr._Bhimrao_Ambedkarभगत सिंह ने आजादी की अलग तस्वीर बनायी थी. अंबेदकर ने साफ कहा था कि इन तमाम सामाजिक विभाजनों और वंचनाओं के बावजूद यदि हम एक राष्ट्र होने पर यकीन कर रहे हैं तो हम एक बड़ा मतिभ्रम पाल रहे हैं. आज यह मतिभ्रम खूनी रूप ले चुका है. 15 अगस्त 2018 मोदी सरकार के पांचवें साल का गवाह है. आजादी पर मंडरा रहा फासीवादी खतरा अब एक चेतावनी भर नहीं है, यह आज का सच है. संघ भारतीय राज्य पर अपनी चौतरफा पकड़ बना चुका है और देश भीड़-तंत्र के कब्जे में फंस गया है.

पिछले महीने इलाहाबाद में एक इनवेस्टर्स समिट में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि उन्हें उद्योगपतियों के साथ खड़ा होने में डर नहीं लगता. लेकिन सवाल इसके उलट है. किस डर की वजह से मोदी चुनिंदे कॉरपोरेट घरानों के सामने घुटने टेक रहे हैं और देश को बौना बना रहे हैं? राफेल सौदा-घोटाला से लेकर जियो इंस्टिट्युट विवाद और विदेशी दौरों में अपने क्रोनियों के लिए ठेकों की तलाश प्रधानमंत्री मोदी को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं. इन पांच सालों में प्रधानमंत्री के चहेते कारोबारियों की आय में छप्पर-फाड़ इजाफा सच की ओर इशारा करता है. पांच सालों में देश की गरीबी-बेरोजगारी बेतहाशा बढ़ी है. ऑक्सफेम के आंकड़ों को यहां दुहराने की जरूरत नहीं है. मंहगाई खासकर इंधनों के दाम  कमजोर तबकों को बाजार में खड़ा होने से रोक रहे हैं. सरकार की उपेक्षा ने किसानों को कर्ज और तबाही में धकेल दिया है. राष्ट्रीय अपराध ब्युरो के आंकड़े कह रहे हैं कि किसानों की आत्महत्या में 41.7% वृद्धि हुई है. रुपया लुढ़क कर सत्तर पर पहुंच गया है. जारी व्यापार-युद्ध में भारत के अंदर मोदी की चहेती कॉरपोरेट मंडली तमाम चोटों के बावजूद अमेरिका की ताबेदारी के लिए बेचैन है.

lynching

तीन दिन पहले महाराष्ट्र में  आतंकवाद विरोधी दस्ते (एटीएस) ने सनातन संस्था के तीन लोगों को हथियार सहित पकड़ा है और उनके हथियार के कारखाने पर भी छापा मारा है और हथियारों को बरामद किया है. यह संस्था मालेगांव की तरह और कई धमाकों की साजिश में लगी है.  इसी संस्था से जुड़े सदस्यों के नेटवर्क ने गौरी लंकेश, पानसरे, डाभोलकर और कुलबर्गी की हत्या की है. इसके तार मालेगांव और अजमेर शरीफ विस्फोटों से भी सीधे जुड़े हुए हैं. सनातन संस्था के प्रवक्ता का कहना है कि उनकी संस्था धार्मिक प्रचार-प्रसार करती है और पकड़े गये उसके सदस्य गौ-रक्षा के लिए काम करते हैं. धर्म और गौरक्षा की आड़ में अल्पसंख्यकों-दलितों और तर्कवादियों को हिंसा-हत्या का शिकार बनाना हिंदुत्ववादियों की दिनचर्या हो गयी है. इस नेटवर्क की गतिविधियों पर एक सरसरी निगाह से ही स्पष्ट हो जाता है कि यह सत्ता के संरक्षण में काम करता है. अभी हाल में झारखंड के आदिवासी आंदोलन के 20 कार्यकर्ताओं पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा किया गया क्योंकि वे फेस-बुक में आदिवासियों के पत्थलगड़ी आंदोलन का समर्थन कर रहे थे. दूसरी ओर, सोशल मीडिया और अपने प्रचारों में खुले आम हिंसा का आहवान करनेवाले हिंदुत्ववादियों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर भाजपा-सरकारों का अभयदान मिला हुआ है. यह अभयदान हिंदू राष्ट्रवाद का एक बड़ा है.

आजादी के 72वें सालगिरह पर मीडिया की घुटी हुई आवाज को कौन नजरअंदाज कर सकता है. सबसे ताजा उदाहरण कार्टूनिस्ट सतीश आचार्य का मेल टुडे से निकलना है. भारत की मीडिया का एक हिस्सा मोदी के चारण में पतित हो चुका है. अपनी तटस्थता बचाने की कोशिश कर रहे पत्रकार-मीडियाकर्मी सरकार और प्रबंधन से जूझ रहे हैं. द वायर और इकोनोमिक पोलिटिकल वीकली मुकदमे झेल रहे हैं. अभी हाल में पुण्य प्रसून वाजपेयी को जिन स्थितियों में एबीपी से इस्तिफा देना पड़ा है, यह मीडिया पर मोदीतंत्र के कसते शिकंजे दिखाता है. न्यायपालिका पर सरकार का दबाब बारबार सामने आ रहा है. संस्थाओं से लेकर सड़कों तक प्रतिबंध महसूस किया जा सकता है. इस प्रतिबंध की जद से कोई भी बाहर नहीं है.

आजादी की लड़ाई में हमें गोरों से आजादी मिली. बंटवारे की अविस्मरणीय पीड़ा मिली. लेकिन हमें एकता की समझ और वजह भी मिली. हमें राष्ट्र गढ़ने और आगे बढ़ने को बेताब मजदूरों-किसानों का हुजूम भी मिला. हमें पीछे रह गई राष्ट्रीयतायें मिलीं. हमें कुचली गई अस्मिताएं मिली. महिलायें मिलीं जिनके हिम्मत की कोई सानी नहीं है. छात्र-नौजवानों का एक बाद दूसरा जत्था मिला जिसने हर बार आजादी को नये ढांचों में ढाला. यह सब बड़ी कीमतें चुका कर ही संभव था. आजादी कायम रखने के लिए हर पीढ़ी ने इसे अपने खून से सींचा. 15 अगस्त 1947 के बाद भी! हिंदुत्ववादियों ने शुरू से ही आजादी के आंदोलन के साथ गद्दारी की है. हिंदुत्ववादियों को व्यापकता, विविधता और रंग-बिरंगी आकांक्षाएं खलती रही हैं. उनके हिंदू राष्ट्र में दो तरह के नागरिक हैं – एक श्रेष्ठ और एक दोयम दर्जे का. एक सिमटा हुआ राष्ट्र है जिसमें एक कायदा, एक संस्कृति, एक आचार है! आजादी आज उनके चंगुल में फंसी हुई है. दूसरी आजादी की लड़ाई का यह दौर संविधान और लोकतंत्र की रक्षा भर के लिए नहीं है. यह देश को भगत सिंह के मजदूर-किसानों के भारत में तब्दील करने का है. यह भारतीय समाज में अंबेदकर के जाति-उन्मूलन और बराबरी स्थापित करने के कार्यभार को पूरा करने के लिए भी है. देश ने बार-बार साबित किया है कि इसे किसी तानाशाह के कैंप में नहीं बदला जा सकता है.

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