‘स्वदेशी आर्थिक माॅडल’ के लिए हुई आरबीआई में गुरुमर्ति की नियुक्ति!

सत्ता पर संघ के बढ़ते दबाव का माना जा रहा है नतीजा, चार्टर्ड अकाउंटेंट के रूप में भी रही है गुरुमूर्ति की ख्याति

अमित राजा

‘स्वदेशी आर्थिक माॅडल’ संघ का एजेंडा रहा है और भाजपा की सरकार में संघ अपने इस एजेंडे को आगे बढ़ाने को बेताब भी रहा है। रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया में एस मूर्ति की नियुक्ति के पीछे भी संघ का दबाव माना जा रहा है। ताकि संघ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा की सरकार में अपने आर्थिक एजेंडे पर दो कदम आगे बढ़ सके। एस गुरुमूर्ति को भारतीय रिजर्व बैंक के निदेशक मंडल में शामिल करने का निर्णय इस सरकार ने लिया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े स्वदेशी चिंतक के बतौर गुरुमूर्ति की पहचान तो है ही, साथ ही चार्टर्ड अकाउंटेंट के रूप में भी उनकी ख्याति रही है। वे स्वदेशी जागरण मंच के संस्थापकों में से एक हैं।

पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट गुरुमूर्ति की आर्थिक मामलों में खास दिलचस्पी की वजह से संघ और भाजपा के लोग आर्थिक मामलों में उनके सुझाव को अहमियत देते हैं। एक दौर में गुरुमूर्ति इंडियन एक्सप्रेस समूह के सर्वेसर्वा रामनाथ गोयनका के करीब रहे। तब उन्होंने रिलायंस और इसके संस्थापक धीरूभाई अंबानी के खिलाफ कई खोजी खबरें की थीं। एक और पहचान गुरुमूर्ति की खास है। देश के कुछ कारोबारी घरानों में जब आपसी खींचतान को लेकर विवाद बढ़ा तो उन मामलों को सुलझाने का श्रेय भी गुरुमूर्ति को ही मिला।

एस गुरुमूर्ति भाजपा के अंदरूनी कुछ विवादों को भी सुलझाते रहे हैं। वर्ष 2013 में जब नरेंद्र मोदी को 2014 के लोकसभा चुनावों के लिए चुनाव अभियान समिति का प्रमुख नियुक्त किया गया था और पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी इससे खफा थे तो उस वक्त भी गुरुमूर्ति संकटमोचक के बतौर सामने आये। वैसे तो गुरुमूर्ति भाजपा में किसी औपचारिक पद पर नहीं हैं। लेकिन, पार्टी और संघ में उनकी गहरी पैठ मानी जाती है।

वर्ष 2014 में मोदी सरकार के आते ही यह चर्चा जोरों पर थी कि वे कैबिनेट मंत्री बन सकते हैं और उन्हें कोई महत्वपूर्ण मंत्रालय मिल सकता है, मगर ऐसा नहीं हुआ और अब जाकर उस चर्चा में दम दोने की बात प्रमाणित हुई। उन्हें रिजर्व बैंक के निदेशक मंडल में रखा गया है। जो हो, इसमें संघ की खास भूमिका रही है। देश की आर्थिक नीतियों में स्वदेशी रुख अपनाने के गुरुमूर्ति हिमायती रहे हैं। नीति आयोग के मौजूदा उपाध्यक्ष राजीव कुमार भी इसी तरह की बात करते आए हैं।

बहरहाल, कहा तो ये भी जा रहा है कि राजीव कुमार और गुरुमूर्ति दोनों की नियुक्ति में ही संघ की खास भूमिका रही है। लंबे समय से संघ के पदाधिकारियों के बीचयह बात चलती रही है कि देश की आर्थिक नीतियां स्वदेशी मिजाज की नहीं हैं और दुनिया के बड़े देशों और आर्थिक संस्थाओं से प्रभावित होकर ही बनती रही हैं। केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की जब सरकार थी तब भी संघ और सरकार के बीच आर्थिक नीतियों को लेकर मतभेद था।

शुरुआती सालों में नरेंद्र मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों को लेकर भी संघ में बहुत उत्साही भाव नहीं रहा। लिहाजा, कई बार सरकार के खिलाफ संघ के कुछ सहयोगी संगठनों ने आलोचनात्मक रुख अपनाया। श्रम सुधार से संबंधित सरकार की नीतियों की भारतीय मजदूर संघ ने आलोचना सार्वजनिक तौर पर की थी। जिस जीएसटी और नोटबंदी को नरेंद्र मोदी सरकार और भाजपा ने अपनी सबसे बड़ी कामयाबी बताया है, उसे लेकर खुद संघ प्रमुख मोहन भागवत ने एक बार कहा था कि आर्थिक नीतियां बनाते वक्त देश के छोटे कारोबारियों का ध्यान रखा जाना चाहिए। तब उनके बयान का मतलब निकाला गया था कि उन्होंने सरकार को नोटबंदी और जीएसटी से छोटे कारोबारियों को हुई परेशानियों को दूर करने का संकेत दिया है।

जानकारों का तो यह भी कहना था कि भागवत का वह बयान गुरुमूर्ति से विमर्श के बाद आया था। नीति आयोग में राजीव कुमार और आरबीआई में गुरुमूर्ति को लाकर संघ ने आर्थिक नीतियों में अपना दखल बढ़ाने की कोशिश की है। नब्बे के दशक से लेकर अबतक संघ के कुछ लोग कहते रहे रहे हैं कि पार्टी से जो लोग सरकार में आते हैं, वे वहां की मजबूरियों से बंध जाते हैं और कई बार उनके पास विशेषज्ञता नहीं होती। सो, नौकरशाही के सुझाव से ही वे बंध जाते हैं। संघ के अंदरुनी सू़त्रों के अनुसार अगर गुरुमूर्ति जैसे किसी व्यक्ति को महत्वपूर्ण पद पर बैठाया जाता है तो बहुत हद तक ऐसा नहीं होने की संभावना है। वैसे, गुरुमूर्ति की नियुक्ति रिजर्व बैंक में अंशकालिक निदेशक के तौर पर है, लिहाजा, सीधे तौर पर रिजर्व बैंक की नीतियों के निर्धारण में उनकी भूमिका तो आधिकारिक तौर पर नहीं होगी, मगर सरकार की ओर से नियुक्त किए जाने और संघ- भाजपा से नजदीकी के कारण उनकी राय आरबीआई में जरूर अमल में लायी जाएगी।

 

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