इंकलाबी एजेंडे से भी सियासत नहीं साध पा रहे वाम दल

संताल परगना में बीमार चल रहे लाल झंडे को लेकर कॉमरेड चिंतित/कभी हुआ करते थे पाकुड़, नाला, महेशपुर, जामताड़ा व देवघर में वामपंथी विधायक / सभी क्षेत्रों में संगठन कमजोर पड़ने के साथ अब चुनाव में पड़ने लगा है उम्मीदवारों का टोटा

अमित राजा / देवघर। संताल परगना में लाल झंडा उदास है। संघर्ष और आंदोलनों से कभी दमकने वाला वामपंथी कैडरों का चेहरा भी मलीन है। वैसे, एक समय ऐसा भी था जब जामताड़ा, देवघर, महेशपुर से लेकर पाकुड़, नाला तक में कम्युनिस्ट पार्टियों के विधायक थे। लिट्टीपाड़ा, देवघर, पौडै़याहाट और महागामा जैसे क्षेत्रों में वामदल कई बार दो नंबर की पोजिशन में रहे। मगर, वर्ष 2000 में भाकपा के विशेश्वर खान अंतिम बार नाला से चुनाव जीते और संताल परगना की बाकी जगहों से वामदल साफ हो गये। कहीं दो नंबर की पोजिशन भी नहीं आयी। वर्ष 2014 के चुनाव में तो कई जगहों पर वामदलों को उम्मीदवार तक नहीं मिले। जबकि 70-80 के दशक में सभी जिला और प्रखंड मुख्यालयों में पार्टी दफ्तर था। आदिवासियों या गरीबों पर जुल्म ढाने वाले लाल झंडे देख भाग खड़े होते। मगर, लाल झंडे की यह पहचान खो गयी। आज वामपंथी नेता संगठन की ऐसी हालत का दोष कुछ ऐतिहासिक गलतियों को देते हैं।

कभी आबाद था पार्टी ऑफिस, अब निशान तक नहीं

संताल क्षेत्र के 6 जिलों में पार्टी का दफ्तर 24 घंटे काम करता। सभी मसलों पर जीवंत बहसों का दौर चलता। इंसाफ के लिए लोग दफ्तर पहुंचते तो पार्टी होल टाइमरों पर उनकी लड़ायी को निर्णायक लक्ष्य तक पहुंचाने की जवाबदेही होती। लेकिन, पार्टियों के दफ्तर के निशान तक अब मौजूद नहीं हैं।

इन जगहों पर मजबूत था वामदल

नाला विधानसभा क्षेत्र से भाकपा के विशेश्वर खान आधा दर्जन बार चुनाव जीते। जबकि जामताड़ा विस पर तीन बार वामदलों का कब्जा रहा। वर्ष 1967 और 1982 के चुनाव में जामताड़ा से भाकपा के एस बेसरा विधायक चुने गये। जबकि वर्ष 1980 में जामताड़ा से भाकपा के अरूण कुमार बोस और पाकुड़ से माकपा के अब्दुल हकीम की जीत हुई। देवघर से पहला विधानसभा चुनाव फॉरवर्ड ब्लॉक (मार्क्सवादी) के भेवनेश्वर पांडेय ने जीता था। वर्ष 1982 के चुनाव में देवघर से भाकपा के रविकांत झा दूसरे नंबर थे। इसी तरह देवघर से सुरेश पासवान वर्ष 1990 में भाकपा के टिकट पर दूसरे नंबर पर थे। बाद में वे लालू प्रसाद यादव के जनता दल में शामिल हो गये। वर्ष 1995 में महेशपुर से माकपा के ज्योतिन सोरेन जीते और पौड़ेयाहाट से भाकपा के संजय कुमार दूसरे नंबर पर थे। पौड़ेयाहाट से 1990 में भी भाकपा दूसरे नंबर पर थी। 1967 और 1972 में महागामा से भाकपा दूसरे नंबर पर थी। 1972 में लिट्टीपाड़ा से भाकपा के कालीदास मरांडी दूसरे नंबर थे।

क्या रहे वामदलों के कमजोर पड़ने के कारण

भाकपा (माले) नेता और एक्टू झारखंड राज्य कमेटी के सदस्य अरूण सहाय बड़ी साफगोई से संताल परगना में वामदलों के कमजोर पड़ने की बात करते हैं। उन्होंने कहा कि राजनीति में जातीय उभार और धार्मिक ध्रुवीकरण का असर वामदलों के संगठन पर पड़ा। वामदल हमेशा इंकलाबी एजेंडे पर काम करता रहा। वंचित जमात के संघर्षों की अगुवाई की। मगर, झारखंड में क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति और 90 के दशक में सांप्रदायिक शक्तियों के खिलाफ लालू प्रसाद यादव के साथ मोर्चाबंदी का वामदलों को नुकसान हुआ। भागलपुर दंगे का सबसे मुखर विरोध भाकपा ने किया। मगर, लालू प्रयाद यादव के साथ इन संघर्षों में मोर्चाबंदी थी। जिसका श्रेय लालू ने लिया और अल्पसंख्यक वोट लालू के पाले में चला गया। मोर्चाबंदी में साथ-साथ रहते रहते कई लोग जनता दल (अब राजद, जदयू) में शामिल हो गये। झारखंड आंदोलन को लेकर जो मोर्चाबंदी झामुमो के साथ हुई उसका भी नुकसान हुआ। अरूण सहाय की माने तो अब भी वामदलों के साथ चुनौतियां हैं। इससे बचने के लिए वामदलों को दलित, आदिवासी या अल्पसंख्यक मसले पर बेमेल मोर्चाबंदी से बचना चाहिए।

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