मायावती को अपनी छतरी में लाने की जुगत में भाजपा

अखिल भारतीय दलित महागठबंधन बनाने को भाजपा ने चले कई दांव/चंद्रशेखर रावण की रिहायी का फैसला दिल्ली से हुआ और लखनऊ ने आगे बढ़ाया/भीम आर्मी के चीफ को रिहा करने के पीछे मानी जा रही गहरी रणनीति/ मायावती ने पेट्रोलियम पदार्थों की बढ़ी कीमतों पर भाजपा के साथ कांग्रेस को क्यों कोसा?

नई दिल्ली/संवाददाता। दलित राजनीति का स्थापित चेहरा मायावती और उभरता नया चेहरा चंद्रशेखर रावण एनडीए का हिस्सा हो जायें तो आश्चर्य नहीं होगा। रावण की रिहायी का फैसला दिल्ली से चला और लखनऊ ने उसे अमली तौर पर लागू किया। रिहायी के पीछे भाजपा की रणनीति अखिल भारतीय दलित महागठबंधन बनाने की रही है। उधर बसपा सुप्रीमो मायावती ने पिछले दिनों नरेंद्र मोदी के साथ राहुल गांधी को भी निशाने पर लेकर सबको चौंका दिया। मायावती ने कहा कि पेट्रोल-डीजल की बढ़ी कीमतों के मामले में कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार ने जिस जनविरोधी नीति की शुरुआत की थी, भाजपा नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने उसी को आगे बढ़ाया है। हालांकि मायावती अभी कोई पत्ता नहीं खोल रही हैं।

दलित नेताओं को साथ लाने की भाजपा ने सजायी बिसात

दरअसल, भाजपा का शीर्ष नेतृत्व एक ऐसे महागठबंधन के लिए सियासी बिसात पर मोहरे सजा रहा है, जिसमें देश के सभी बड़े दलित नेता भाजपा की छतरी के नीचे हों। उल्लेखनीय है कि बीते ढाई सालों में मोदी सरकार और भाजपा ने बाबा साहेब अंबेडकर को अपना बताने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सरकार ने स्मारक से लेकर सड़क, संग्रहालय, जन्मोत्सव तक सारे इंतजाम किये। हालांकि अब भी दलितों के लिए भाजपा पहली पसंद नहीं बन सकी है। लिहाजा, लोकसभा चुनाव के मुतल्लिक भाजपा अब ऐसे दोस्त की तलाश में है जो अपनी पार्टी के वोट उसके पाले में डाल सके।

उप्र में माया का वोट बैंक और सियासी हालात

आरएसएस के एक सीनियर प्रचारक मानते हैं कि उत्तर प्रदेश में मायावती एक ऐसी नेता हैं जिनका अपना एक वोट बैंक है। ये वोट बैंक माया जिधर जाएंगी उधर ही चलेगा। राहुल गांधी, अखिलेश यादव और मायावती के महागठबंधन की चर्चा है। लेकिन, अगर मोदी और मायावती साथ आये तो उत्तर भारत की राजनीति में बड़ा परिवर्तन होगा। बाकी क्षेत्रों में भी इसका इसका असर होगा। उधर, नाम नहीं छापने की शर्त पर कुछ बसपा नेता कहते हैं कि बहनजी एक करीबी नेता से भाजपा का शीर्ष नेतृत्व कई बार मिल चुका है। पहले बहनजी कांग्रेस से बात कर रहीं थीं, लेकिन कांग्रेस ने उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया। मायावती ने उत्तर प्रदेश में गठबंधन के बदले मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी सीटें मांगी थी। मगर, कांग्रेस इन तीन राज्यों में अपनी ताकत कमजोर नहीं करना चाहती। सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस हाईकमान ने एक बार तो बसपा के एक नेता को कांग्रेस के प्रदेश स्तरीय नेताओं से बात करने का सुझाव दे दिया। जबकि मायावती को लगा जब फैसला राहुल गांधी को करना है तो कांग्रेस के प्रदेश नेताओं से बात क्यों करें। इसके उलट जानकार बताते हैं कि मायावती एनडीए में आती हैं तो भाजपा उन्हें राष्ट्रीय नेता का दर्जा देगी। मायावती के पास प्रस्ताव भेजा जा रहा है कि पूरे देश में बसपा के चुनाव चिन्ह से करीब 40 उम्मीदवारों को भाजपा का समर्थन होगा।

कैसा होगा भाजपा के सपनों का दलित गठबंधन

मायावती के पास अभी लोकसभा में एक भी सांसद नहीं है, जबकि उन्हें भाजपा अगर सीधे 40 सीट का ऑफर दे रही है तो मामला काबिलेगौर है। भाजपा के अंदरखाने खबर है कि पार्टी नेतृत्व एक अखिल भारतीय दलित महागठबंधन बनना चाहता है। इसमें उप्र से मायावती और भीम आर्मी के चंद्रशेखर ‘रावण’ हो सकते हैं। बिहार से रामविलास पासवान पहले से एनडीए में हैं। महाराष्ट्र से रामदास अठावले मोदी सरकार में मंत्री हैं और दलित चिंतक उदित राज साथ हैं। ऐसे में तीन बड़े राज्यों में भाजपा एक बड़ा दलित गठबंधन बना सकती है, जिसका असर छोटे-छोटे राज्यों तक पहुंच सकता है।

रिहायी के बाद क्या होगी रावण की रणनीति

उप्र पुलिस का कहना है कि रिहायी चंद्रशेखर रावण की मां की अपील पर हुई है। जबकि, उनकी मां ने सरकार से बहुत पहले अपील की थी, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत जेल में बंद रावण को छोड़ने का फैसला अचानक दिल्ली से हुआ। लखनऊ ने इसे लागू किया। सूत्रों के अनुसार वाम दलों के नेताओं से रावण नाराज थे और अगला लोकसभा चुनाव भीम आर्मी से लड़ना चाहते थे। लेकिन भीम आर्मी अभी इतनी ताकतवर नहीं है कि मायावती के उप्र में उन्हें टक्कर दे सकें। सो, उन्हें एक बड़े नेता का सहारा चाहिए। सूत्रों के मुताबिक भाजपा अब इस रणनीति पर काम करेगी कि अगर मायावती व चंद्रशेखर दोनों साथ आये तो अच्छा, वरना भीम आर्मी हर सीट पर अपना उम्मीदवार उतारेगी और हर जगह बहनजी का वोट काटेगी।

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