किताबों के प्रतिबंधित होने के मूल में राजनीति

हमें लेखक के पक्ष में खड़े होने की है जरूरत

नारायण सिंह

इन दिनों हाँसदा सोवेंद्र शेखर का कहानी संग्रह ‘The Adivasi Will not Dance’ चरचा में है। आरोप लगाया जा रहा है कि संग्रह की एक कहानी ‘November Is the Month of Migrations’ में संथाली महिलाओं का अश्लील और अपमानजनक चित्रण किया गया है। सबसे पहले, 2015 में पुस्तक प्रकाशित होते ही, जामिया मिल्लिया इस्लामिया में अंगरेजी की सहायक प्रोफेसर Ivy Imogene Hansdak ने यह आरोप लगाते हुए साहित्य अकादमी द्वारा लेखक को उनकी पहली किताब ‘द मिस्टीरियस एलमेंट ऑफ रूपी बास्की’ पर दिए गए ‘युवा साहित्यकार पुरस्कार’ को वापस लेने की अपील की थी। पाकुड़ में लेखक की उस कहानी के विरोध में संथालों के एक जुलूस में सोवेंद्र शेखर के पुतले का दहन भी हुआ। अभी हाल में झारखंड विधानसभा में विपक्ष के नेता हेमंत सोरेन ने किताब पर प्रतिबंध की मांग की तो मुख्यमंत्री रघुबर दास का काम आसान हो गया, क्योंकि ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में छपे एक लेख में सोवेंद शेखर ने सरकार की डोमिसाइल नीति का विरोध किया था। मुख्यमंत्री ने न केवल पुस्तक पर प्रतिबंध लगा दिया बल्कि उन पर अनुशासनिक कार्रवाई करने का भी निर्णय ले लिया। इस मुद्दे पर जहाँ कुछ लेखक इस पुस्तक के प्रतिबंध के पक्ष में हैं, वहीं दूसरा पक्ष एक-दो कहानियों को अश्लील मानने के बावज़ूद, प्रतिबंध के खिलाफ है। लेखकों का एक तीसरा पक्ष भी है, जो हिंदी में कृष्ण बलदेव वैद, मनोहरश्याम जोशी जैसे हिंदी लेखकों और अलेक्सांद्र कुप्रिन द्वारा वेश्याओं पर लिखे गए प्रसिद्ध रूसी उपन्यास ‘The Pit’ (जिसका अंगरेजी में‘Yama The Pit’ और हिंदी में ‘गाड़ी वालों का कटरा’ नाम से अनुवाद छपा) का उदाहरण देते हुए कहता है कि पुस्तक प्रतिबंधित करने के पीछे अश्लीलता मात्र एक बहाना है और मूल कारण राजनीति है।
हाँसदा के इस संग्रह में दो बेहतरीन कहानियां हैं. ‘दे ईट मीट’ और ‘द आदिवासी विल नॉट डांस’. संग्रह की शीर्षक कहानी तो एक खतरनाक कहानी भी है। लेकिन इन दोनों कहानियों की उत्कृष्टता से Merely a Whore और November is the month of Migration नामक कहानियों की निकृष्टता और बीभत्सता में कोई कमी होने की संभावना नहीं दिखाई देती। ‘नवंबर इज द मंथ ऑफ माइग्रेशन’ में एक संथाल महिला की कहानी है, जो भूख से मजबूर होकर एक सिपाही के कहने से पचास रुपए और दो पकौड़ों के बदले अपना शरीर सौंप देती है। मेरा मानना है कि कहानी का कथ्य अश्लील नही, उसका ट्रीटमेंट, उसके बयान का ढंग अश्लील है। इसमें शरीर सौंपना ही काफी होता। पर कहानी में देह सौंपने के बाद होने वाली रतिक्रिया का भद्दा विवरण है।
‘मियर्लि अ हॉर’ तो एक महाबीभत्स कहानी है। इसमें पुरुष और स्त्री के खुफिया से भी खुफिया अंगों के विवरण के साथ रतिक्रिया का ऐसा विशद विवरण है जो कृष्ण बलदेव वैद, मनोहर श्याम जोशी, गाड़ीवालों का कटरा, लोलिता, मुझे चांद चाहिए आदि जैसे उपन्यासों को तो छोड़ दीजिए। शायद साहित्य में उसका दूसरा कोई उदाहरण मिलना दुर्लभ है। बेहतर तो यह होता कि उस कहानी को सार्वजनिक रूप से फेसबुक के पाठकों के समक्ष रख दिया जाता ताकि वे फैसला करते। पर वह कहानी ऐसी नहीं कि ऐसा किया जा सके। मुझे आश्चर्य होता है कि ‘द आदिवासी विल नॉट डांस’ जैसी कहानियां लिखने वाला लेखक ‘मीयर्लि अ हॉर’ जैसी कहानी कैसे लिख सकता है! और अगर लिख भी दिया तो इस संग्रह में शामिल करने की क्या मज़बूरी थी?

लेखक पेशे से एक डॉक्टर हैं। डॉक्टरी एक अहर्निश सेवा मानी जाती है। जहाँ तक मुझे मालूम है, सरकारी अफसरॉं की नियुक्ति के समय उन्हें सेवा-शर्तों में शामिल एक अंडरटेकिंग देनी पड़ती है, जिसकी शब्दावली केंद्र और राज्यों में भले अलग-अलग हो, पर भावार्थ समान रूप से एक होता है, जो कुछ-कुछ यूं होता है, “कोई सरकारी सेवक सिवाय उस दशा के, जबकि उसने सरकार की पूर्ण स्वीकृति प्राप्त कर ली हो, प्रत्यक्षत: या अप्रत्यक्षत: किसी व्यापार या कारोबार में नहीं लगेगा और न ही कोई नौकरी करेगा।
“किंतु प्रतिबंध यह है कि कोई सरकारी सेवक इस प्रकार की स्वीकृति प्राप्त किए बिना कोई सामाजिक या धर्मार्थ प्रकार का अवैतनिक कार्य या कोई साहित्यिक,कलात्मक या वैज्ञानिक प्रकार का आकस्मिक कार्य कर सकता है, लेकिन शर्त यह है कि इस कार्य के द्वारा उसके सरकारी कर्तव्यों में कोई अड़चन नहीं पड़ती हो तथा वह ऐसा कार्य हाथ में लेने से एक महीने के भीतर ही अपने विभागाध्यक्ष को और यदि वह स्वयं विभागाध्यक्ष हो तो सरकार को सूचना दे दे, किंतु यदि सरकार उसे इस प्रकार का कोई आदेश न दे, तो वह ऐसा कार्य हाथ में नहीं लेगा और यदि उसने हाथ में ले लिया है तो बंद कर देगा…..”
जाहिर है, सरकारी सेवक को यह तय करना पड़ेगा कि या तो वह केवल निर्बाध लिखे कि अधिकारी के रूप में केवल नौकरी करे। यदि वह ऐसा नहीं करता तो यह सरकार की मर्जी के ऊपर निर्भर करता है कि कार्रवाई करे या नहीं. Y. P Singh नाम के एक आइपीएस अधिकारी का एक उपन्यास 2003 में छपा था ‘Carnage by Angels’. उसके तुरत बाद उन्हें दवाब के कारण अपनी नौकरी छोड़नी पड़ी थी और 2011 तक उनकी ग्रेच्युटी वगैरह रुका पड़ा था जो कोर्ट के आदेश से विमुक्त हो सका। श्रीलाल शुक्ल जब ‘राग दरबारी’ लिख रहे थे तो उन्हें भी काफी परेशानी उठानी पड़ी थी। अत: यदि कोई सरकारी अफसर सिस्टम के विरुद्ध कोई लेखन करता है, तो उसे संभावित दुष्परिणामों के लिए तैयार रहना चाहिए। यदि लेखक की किताब में ये दोनों विवादित कहानियां शामिल नहीं रहतीं तो शायद उनका ऐसा जनविरोध नहीं होता जैसा हो रहा है। किसी भी किताब या कला के प्रतिबंधित होने के पीछे मूलत: राजनीति ही होती है। ‘ऐन एरिया ऑफ डार्कनेस’, ‘सैटानिक वर्सेस’, ‘लज्जा’, ‘द हिंदूज :ऐन आल्टरनेटिव हिस्ट्री’, ‘’अंडरस्टैंडिंग इस्लाम’, ‘जिन्ना: इंडिया-पार्टिशन इंडेपेंडेंस’ आदि जैसी किताबें हों या मक़बूल फिदा हुसैन के चित्र हों, इन सब के प्रतिबंध के पीछे वोट बैंक या राजनीति रही है।
हम जानते हैं कि सोवेंद्र शेखर के खिलाफ जो हो रहा है, गलत हो रहा है और ऐसा नहीं होना चाहिए, विशेषकर उनके विरुद्ध चल रहा एक प्रकार का सलवाजुडूम। हमें डॉक्टर साहब के समर्थन में खड़े रहना चाहिए और हम खड़े हैं। पर हम अगर उनकी उपर्युक्त दो कहानियों में मौजूद बीभत्स अश्लीलता को अश्लील या पोर्न नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे!

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