दबाव के बीच चीन दिखा रहा आक्रामकता

शरत मणि

डोकलाम पर सड़क निर्माण को लेेकर भारत व चीन के बीच तनाव के हालात है। इस तनाव के बीच चीन की सरकारी मीडिया की आक्रामता दुनिया देख रही है। लेकिन चीन कुछ मामलों में दबाव में भी है। दरअसल, चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) की 90वीं वर्षगांठ मनायी जानी है। सैन्य क्षेत्र में कम्युनिस्ट पार्टी के दबदबे को फिर से दिखाने के लिए, उम्मीद है कि इस मौके पर विशाल समारोह होगा। लेकिन इस आयोजन में पीएलए की कुछ सैन्य टुकड़ियां हिस्सा नहीं ले पाएंगी, जो भारत के साथ तनाव के कारण सीमा पर हैं। साथ ही चीनी अधिकारी दबाव में हैं और उन्हें जल्द ही कुछ रास्ता निकालना होगा। वो कोई कार्रवाई करने से पहले डोभाल के दौरे को आजमा लेना चाहते हैं। बीते गुरुवार को चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा था कि भारत के साथ बातचीत के कूटनीतिक रास्ते खुले हुए हैं। चीन के सरकारी टीवी चैनल चाइना ग्लोबल टेलीविजन नेटवर्क के एंकर यांग रुई ने कहा है कि चीन के आम नागरिक पूछ रहे हैं कि चीनी सीमा में घुसने पर सरकार भारतीय सेना के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं कर रही है? लेकिन भारत के दवाब के खिलाफ नरम रुख दिखाना कम्युनिस्ट नेताओं के लिए बहुत मुश्किल है। जिस तरह भारत ने पाकिस्तान पर कथित सर्जिकल स्ट्राइक की थी, उसी तरह एक सीमित हमले की संभावनाओं पर भी चीनी प्रशासन विचार कर चुका है।
इसके पीछे विचार ये है कि डोकलाम पठार के 80 वर्ग किलोमीटर के इलाके को कब्जा कर लिया जाए और सीमा पर जमीनी हालात को अपने पक्ष में कर लिया जाए। यह जानकारी हू शीशांग जैसे चीन के सरकारी विशेषज्ञों के मीडिया साक्षात्कारों से मिली है। लेकिन चीन किसी सैन्य संघर्ष में क्यों नहीं उतरना चाहता? इसके कई कारण हैं। एक तो इसकी कोई गारंटी नहीं है कि वो जीत ही जाएगा क्योंकि इस इलाके में भारत ऊंचाई वाले इलाकेे पर काबिज है, जो पहाड़ के युद्ध में बहुत अहम बात होती है। जबकि यह सीमित हमला एक लंबी लड़ाई में खींच सकता है, जिससे घरेलू अर्थव्यवस्था के मंदी के दौर में राष्ट्रपति शी जिनपिंग बचना चाहते हैं। चीनी राजनयिक अन्य देशों के अधिकारियों से मिलकर डोकलाम पर अपना पक्ष रख रहे हैं और भारत को आक्रामक ठहरा रहे हैं। वो इस तथ्य को छिपाने की कोशिश कर रहे हैं कि डोकलाम भूटान में हैं। क्योंकि पश्चिमी देश, छोटे देशों पर बड़े देशों के हमले को नापसंद करते हैं। हालांकि चीनी राजनयिक पश्चिमी देशों को ये समझाने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र वाले देश ने ही असल में, दुनिया के दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश के इलाके में घुसपैठ की है।
अभी हाल ही में वॉशिंगटन में हुई वार्षिक अमरीकी-चीनी रणनीतिक आर्थिक वार्ता के दौरान चीनी वार्ताकारों को गंभीर झटका लगा है। दोनों पक्षों के बीच तब गतिरोध आ गया जब अमरीकी वार्ताकारों ने चीनी स्टील के डंपिंग को खत्म करने और चीनी सामानों के निर्यात के कारण पैदा हुए व्यापार घाटे को कम करने की मांग रख दी। असंतुलित व्यापार संबंध को लेकर चीन के खिलाफ भारत की भी यही शिकायत रही है। कम्युनिस्ट पार्टी के अंदर मौजूद आक्रामक धड़ा बीजिंग से डोकलाम में कब्जा करने या भारतीय सैनिकों को मार डालने के आदेश देने को कह रहा है। लेकिन सरकार इस तरह के आसान सुझावों को स्वीकार नहीं कर सकती क्योंकि भारत की जवाबी कार्रवाई में पीएलए के सैनिकों की मौत से झटका लगेगा और पीएलए के सालगिरह समारोह में विघ्न पड़ जाएगा। मुंबई में चीन के पूर्व काउंसल जनरल लियू योउफा ने एक स्थानीय टीवी चैनल से कहा है कि भारतीय सैनिक कब्जे या मौत को दावत दे रहे हैं क्योंकि उन्होंने चीनी इलाके में घुसपैठ की है।
उधर सुषमा स्वराज पहले ही कह चुकी हैं कि भारतीय सैनिक पीछे नहीं हटेंगे। जबकि ये चीन की पूर्व शर्त है। अपने अपने नागरिकों के सामने अपना सम्मान बचाने के लिए दोनों पक्षों को समाधान की कड़ी जरूरत है। भारत और चीन में बढ़ते तनाव के बीच कई ऐसे सवाल हैं जो भारत को चिंतित करने वाले हैं। अगर चीन और भारत के बीच युद्ध हुआ तो अमरीका और जापान किस हद तक भारत को मदद करेंगे? अगर अमरीका ने भारत का साथ दिया तो क्या दोनों देशों के बीच युद्ध का संभावित परिणाम मूल रूप से कुछ और होगा? इन सारे सवालों पर भारत ही नहीं बल्कि चीनी मीडिया में भी काफी माथापच्ची चल रही है। साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट ने लिखा है कि भारत सच को स्वीकार कर ले। चीन का विस्तार चैतरफा हो रहा है। चीन खुद का विस्तार रोड, रेल, आर्थिक शक्ति और तकनीकी विकास के माध्यम से कर रहा है। इसके साथ ही भारतीय उपमहाद्वीप में चीन बड़ी नौसैनिक शक्ति के रूप में उभर रहा है।
साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट ने लिखा है कि चीनी ताकत को ताइवान के मामले में अमरीकी कदम से भी महसूस किया जा सकता है। ट्रंप के आने के बावजूद भी अमरीका वन चाइना नीति के खिलाफ जाने की स्थिति में नहीं है। साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट ने लिखा है कि वर्ष 2008 के बाद से हिन्द महासागर में चीनी नौसैनिकों का प्रभाव लगातार बढ़ा है। हिन्द महासागर में पीपल्स लिबरेशन आर्मी की मौजूदगी बढ़ी है। रिपोर्ट के मुताबिक चीन के चैतरफा विस्तार से भारत खुद को घिरता महसूस कर रहा है। भारत इसे अपनी प्राचीन सभ्यता के प्रभावों पर चीन के अतिक्रमण के रूप में देख रहा है।

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