‘ठाकुरेपन’ के साथ ‘पद्मावती’ को सियासत देे रही ‘पेन’

राजनेता और तथाकथित बुद्धिजीवी कर रहे है कलात्मक अभिव्यक्ति की ऐसी की तैसी

माना जा रहा था कि कलात्मक अभिव्यक्ति की राह बौद्धिक जमात आसान करेगी। मगर, विवाद में आयी फिल्म पद्मावती को लेकर बुद्धिजीवियों के चेहरे पर भी जातीय गौरव का धुंध छाने की वजह से सियासत को ताकत मिली है। मध्य प्रदेश और पंजाब की ओर से पद्मावती पर बैन लगाने की घोषणा के बाद मंगलवार को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि फिल्म के निर्देशक संजय लीला भंसाली और अभिनेत्री दीपिका पादुकोण भी दोषी हैं। योगी ने कहा कि भंसाली हों या और कोई किसी को कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं है। धमकी देने वाले दोषी हैं तो भंसाली भी कम दोषी नहीं हैं। कार्रवाई होती है तो दोनों पक्षों पर होनी चाहिये।

जो हो, पूरे मामले में वरिष्ठ पत्रकार नदीम अख्तर की बात असली जड़ पर पर हाथ रखती है। उनके मुताबिक जब पद्मावती के ठाकुरेपन पर एक राष्ट्रीय न्यूज चैनल की एंकर श्वेता सिंह का राजपूत गर्व जागृत हो सकता है और वह पत्रकार होने के बावजूद फिल्म का विरोध कर सकती हैं तो फिर देश के ठाकुर गृह मंत्री राजनाथ सिंह का खफा होना तो जरूरी हो जाता है। फिल्म को लेकर कई राज्यों में कोलाहल है। सिर काटकर, नाक काटकर ईनाम रखे जा रहे हैं। मगर, अपने ठाकुर केंद्रीय गृह मंत्री ने अभी तक कुछ कहा है क्या?

नदीम अख्तर कहते हैं कि शिवराज सिंह चैहान ने फिल्म रिलीज होने से पहले ही उस पर बैन लगा दिया है। राजस्थान में वसुंधरा राजे भी फिल्म का विरोध कर रही हैं। केंद्र सरकार चुप है। सबने मौनव्रत धारण कर लिया है। नदीम अख्तर के अनुसार जातिवाद इस देश की जड़ में है। आप पत्रकार बन जायें या तथाकथित बुद्धिजीवी, जाति से अंदरखाने वाला लगाव रहता ही रहता है। इसलिए बड़े पत्रकार राजदीप सरदेसाई इस बात पे फूले नहीं समाते कि सारस्वत ब्राह्मण मंत्री पद की शपथ ले रहे हैं और खुलेआम कह भी देते हैं। एंकर श्वेता सिंह ने इसी परंपरा को आगे बढ़ाया है। भारतीय मीडिया में जातिवाद की भयानक सड़ांध है। सबके अपने-अपने गुट हैं। लेकिन ऊपर से सब डेमोक्रेटिक और सभ्य बुद्धिजीवी-पत्रकार बने रहते हैं पर जैसे ही मौका मिलता है, उनका जाति प्रेम छलक जाता है।

 

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