जातिवादी फिल्म ‘दशक्रिया’ का हो रहा जातीय विरोध

घोर फासीवादी ही करते हैं समाज में टूट डालने और जातीय विद्वेश फैलाने की कोशिश

नारायण गोस्वामी

ब्राह्मणों को लालची बताना और अंतिम संस्कार के रस्म को कुछ हिन्दू जातियों के जीवनयापन का माध्यम बताकर उन्हें जलील करना घोर फासीवादी कृत्य है। ऐसा ही फासीवादी कृत्य अबतक कई अवॉर्ड जीत चुकी मराठी फिल्म ‘दशक्रिया’ बनाने वालों ने किया है। इसका विरोध करते हुए महाराष्ट्र के पुणे में दक्षिणपंथी संगठन ने फिल्म पर बैन लगाने की मांग की है। दक्षिणपंथी इन संगठनों के विरोध को प्रगतिशील संगठनों का भी सपोर्ट मिलना चाहिए। मगर, ऐसा नहीं हो रहा है। दक्षिणपंथी संगठन का आरोप है कि फिल्म में ब्राह्मणों को लालची दिखाया गया है।

फिल्म में कुप्रथाओं का विरोध होना चाहिए। लेकिन, ब्राह्मण या उन दूसरी जातियों का मजाक नहीं उड़ाना चाहिए जो इन कुप्रथाओं से ही जीवन यापन करती हैं। फिल्म का विरोध करने वालों ने दावा किया है कि फिल्म में ब्राह्मण और कुछ हिन्दू जातियों के बीच नफरत फैलाया गया है। बिना मंजूरी के उसे रिलीज करने को लेकर फिल्म के डायरेक्टर को चेतावनी जारी की गयी है। दक्षिणपंथी संगठनों के अनुसार फिल्म में ब्राह्मणों और उन हिन्दू जातियों को लालची दिखाया गया है, जो जीवनयापन के लिए शवों का अंतिम संस्कार कराते हैं।

पुणे में अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा के अध्यक्ष आनंद दवे ने बताया है कि उन्होंने शहर में फिल्म की रिलीज पर रोक लगाने के लिए पुलिस को शिकायत दी है। उन्होंने इसके साथ ही थियेटर के मालिकों को भी फिल्म न लगाने का सुझाव दिया है। दवे के अनुसार फिल्म के प्रोमो में यह कहकर ब्राह्मणों का अपमान किया गया है कि वह मोक्ष से जुड़े अनुष्ठानों का कारोबार करते हैं। यही कारण है कि फिल्म हिंदू परंपराओं और हिंदू धर्म को बदनाम करती है। सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (सीबीएफसी) फिल्म को पास कर चुकी है, मगर इसे पास करने के पहले उपन्यास पढ़ना चाहिए था, जिसमें हिंदू धर्म को बदनाम किया गया है।

दूसरी ओर हिंदू जनजागृति समिति के दीपक अगवाने ने बताया कि अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब ये नहीं कि हिन्दू धर्म व उनकी जातियों पर हमला हो। हालांकि फिल्म के निर्देशक संदीप पाटिल ने कहा है कि दो मिनट के प्रोमो के आधार पर फिल्म की आलोचना नहीं होनी चाहिए। बहरहाल, सच जो भी हो मगर, प्रगतिशीलता के नाम पर फासीवादी आचरण सही नहीं है। आज, ऐसी फिल्मों का समर्थन खुद को नास्तिक और रामायण को कपोल कल्पना बताने वाले और रावण या महिषासुर की पूजा करने वाले फासीवादी लोग ही ज्यादा करते हैं। अंबेदकरवाद के करीब रहे लेखक बाबा भांड ने वर्ष 1994 में जो उपन्यास लिखी थी, उसी पर विवादित फिल्म ‘दशक्रिया’ बनी है। अंबेदकरवादियों को सोचना चाहिए कि किसी कुप्रथा का विरोध करते हुए वे हिन्दू जातियों को नीचा दिखाते हैं तो ऐसी जातियों में कुछ महादलित भी हैं, जिनकी भावना इस फिल्म से आहत हो सकती है।

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