भभूत लगाकर धुनी रमाना नहीं है राजनीति…

मौजूदा धर्मवादी राजनीति का विकल्प खोजने की बजाये पाॅलिटिक्स का अनुवाद ‘धर्मशास्त्र’ गढ़ रही कांग्रेस

अमित राजा

लगता है कांग्रेस का यू टर्न भारत की राजनीति में ऐतिहासिक माना जायेगा। बदली-बदली कांग्र्रेस अगर सत्ता में लौटती है तो मुमकिन है कि चुनावी जीत के लिए ‘उदार हिन्दुवाद’ उस राजनीतिक धारा के सिर पर सवार हो जाएगा, जिस धारा को अबतक हम ‘धर्म निरपेक्षतावाद’ के नाम से जानते हैं। कांग्रेस राहुल गांधी के नेतृत्व में बदल रही है। मंदिर-मंदिर राहुल। चंदन-तिलक लगाये जनेऊधारी राहुल। लगता है इस ट्रिक से राहुल गुजरात जीत लेंगे। इसलिए भाजपा बेेचैन है। भाजपाई राहुल के हिन्दू नहीं होने पर ही सवाल उठा रहे हैं। मगर, असल सवाल कुछ और ही है और उसका उठना भारत की राजनीति के लिए बहुत जरूरी भी है।

सवाल ये है कि भारत की राजनीतिक पार्टियों को क्या धर्म की बैसाखी चाहिए? अगर हां, तो ऐसे में खतरा है कि पूरी राजनीति ही लंगड़ी हो जाएगी। अगर इसी बैसाखी के जरिये भाजपा ने वर्ष 2014 के चुनावी रेस में जीत दर्ज की है तो कांग्रेस को सत्ता के लिए धैर्य से काम लेना चाहिए। जल्द सत्ता में लौटने की जगह उसे भाजपा की धर्मवादी राजनीति का विकल्प पेश करना चाहिए। ताकि धर्मवादी राजनीति का विकल्प लोकवादी राजनीति बन सके। मगर, ऐसा करने की बजाये राहुल गांधी चंदन तिलक, बैलपत्र और भभूत के साथ मंदिरों की परिक्रमा को ही राजनीति का रणनीतिक सूत्र मान बैठे हैं। ऐसा इसलिए माना जा रहा है कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने तीन महीने के दौरान इस बुधवार यानी 29 नवंबर तक 19वीं बार गुजरात के मंदिर में माथा टेका। बुधवार को सोमनाथ मंदिर पहुंचकर राहुल गांधी ने वहां जलाभिषेक किया। इस मौके पर उनके साथ राज्य कांग्रेस प्रभारी और राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी थे।

वैसे, मंदिरों की प्ररिक्रमा नितांत निजी और आस्था का प्रश्न है। सोमनाथ मंदिर के रजिस्टर में राहुल की गैर हिन्दू के तौर पर एंट्री करायी गयी। उनके साथ राज्य सभा सांसद और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल की भी एंट्री गैर हिन्दू के तौर पर हुई। इससे भाजपा को मसाला मिल गया तो कांग्रेस सफाई देने पर उतर आयी। राहुल के मंदिर-मंदिर जाने में रणनीतिक गंध पाकर बेचैन भाजपा ने राहुल के क्रिश्चन होने की बात उछाली तो कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने प्रेस कांफ्रेंस कर कहा कि राहुल गांधी ‘जनेऊधारी हिन्दू’ हैं। उन्होंने अपने पिता के अंतिम संस्कार में भी जनेऊ धारण किये हुुए थे।

दूसरी ओर इस विवाद में कूदे भाजपा नेता और राज्य सभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा कि उनके पास ऐसे कई सबूत हैं, जब राहुल गांधी ने खुद को क्रिश्चन करार दिया है। स्वामी ने कहा कि राहुल गांधी जन्म से ही गैर हिन्दू हैं। अगर आप हिन्दू नहीं हैं और खुद को जबरन हिन्दू कहते हैं तो यह फ्रॉड है। स्वामी के मुताबिक पढ़ाई के दौरान भी राहुल गांधी ने कई जगहों पर खुद को कैथोलिक क्रिश्चन के रूप में अपना धर्म दर्ज करवाया है। संत कोलंबा स्कूल में वे कैथोलिक क्रिश्चन के रूप में रजिस्टर्ड हैं। स्वामी ने कहा कि सेंट स्टीफन कॉलेज में भी राहुल का नाम एक कैथोलिक क्रिश्चन के रूप में दर्ज था। राहुल ने यहां एक साल ही पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने फ्लोरिडा के छोटे से सेंट लॉरेंस कॉलेज में दाखिला लिया। वहां भी उन्होंने खुद को क्रिश्चन कहा। स्वामी ने कहा कि राहुल गांधी ने कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में भी गैर हिन्दू होने के आधार पर ही दाखिला लिया था।

इतना ही नहीं राहुल गांधी के सोमनाथ मंदिर में जलाभिषेक करने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी बिना किसी का नाम लिए तंज कसा है। दूसरी ओर भाजपा के कई नेता राहुल के हिन्दू होने पर सवाल उठा रहे हैं। आठ अक्टूबर को द्वारका मंदिर में पूजारियों ने राहुल को कश्मीरी पंडित बताकर जब पूर्जा-अर्चना के दौरान संकल्प कराया था तब भी कई भाजपा नेता बेचैन हो उठे थे। जो हो, मंदिर-मंदिर और हिन्दू-हिन्दू पर टिके पूरे गुजरात चुनाव में दोनों ही प्रमुख पार्टियां गैर जरूर सवाल उठा रही है। साथ ही दोनों पार्टियों के नेता संवाद में दरिद्र से दरिद्रतम होते दिख रहे हैं।

हालांकि अभी कांग्रेस जिस उदार हिन्दूवाद के रास्ते पर मजबूरी में खड़ी है उस मजबूरी को कांग्रेस की गलतियों ने ही पैदा भी किया है। अगर कांग्रेस घोर मुस्लिम तुष्टिरण के अतिवाद पर कभी खड़ी नहीं होती तो शायद उसके सामने उदार हिन्दूवाद को अपनाने की मजबूरी भी नहीं होती। दरअसल, कांग्रेस के दोहरे मापदंडों का लाभ उठाती हुई ही भाजपा सत्ता तक पहुंची है। एक समय था जब अहमदाबाद के अंडरवल्र्ड के बादशाह अब्दुल रशीद लतीफ का सोहराबुद्दीन ड्राइवर था। लतीफ के मारे जाने के बाद सोहराबुद्दीन ने लतीफ की जगह ले ली थी। लतीफ को गुजरात पुलिस ने 10 अक्तूबर 1996 को दिल्ली में गिरफ्तार किया था। वर्ष 1997 में गुजरात पुलिस की हिरासत से भागने के प्रयास में हुई मुंठभेड़ में लतीफ मारा गया था। उन दिनों गुजरात में कांग्रेस समर्थित राष्ट्रीय जनता पार्टी की सरकार थी। जिन पुलिसकर्मियों ने लतीफ को मारा था, उन पुलिसकर्मियों को तत्कालीन सरकार ने समारोह आयोजित कर सम्मानित किया था। कांग्रेस ने तब फर्जी मुंठभेड़ का आरोप नहीं लगाया। मगर, जब नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्रित्व काल में 26 नवंबर 2005 को माफिया डाॅन सोहराबुददीन ‘पुलिस मुंठभेड़’ में मारा गया तो देश भर में कांग्रेस व कई अन्य दलों और हस्तियों ने इस ‘फर्जी मुंठभेड़’ के खिलाफ हंगामा खड़ा कर दिया। नतीजतन बाद में इसका चुनावी लाभ भाजपा और नरेंद्र मोदी को मिला।

इसी तरह गोधरा रेलवे स्टेशन पर वर्ष 2002 में ट्रेन पर बाहर से पेट्रोल छिड़क कर आग लगा दी गयी थी, जिसमें 59 कार सेवकों की जलने से मौत हो गयी थी। मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल के रेल मंत्री ने यूसी बनर्जी कमेटी बनायी। कमेटी ने रपट दे दी कि यात्रियों के जरिये स्टोव पर खाना बनाने के दौरान डिब्बे के भीतर ही आग लग गयी थी। जबकि वर्ष 2011 में अदालत ने उस ट्रेन के डिब्बों पर बाहर से पेट्रोल छिड़क कर आग लगाने के आरोप में 31 लोगों को सजा सुनायी। सीबीआई ने इस केस की जांच की थी। वर्ष 2011 में केंद्र में मनमोहन सिंह की ही सरकार थी। भाजपा विरोधी दलों ने गुजरात के लोगों को समझाया कि आप ट्रेन जलने के मामले में तो बनर्जी कमेटी की रपट को मान लो। पर, उसके बाद हुए दंगे को लेकर नरेंद्र मोदी और उनके लोगों को जिम्मेदार मानो। बाद के दंगों के लिए कई भाजपा नेताओं को अदालत ने जरूर सजा दी। पर गोधरा ट्रेन दहन कांड के मामले में अधिकतर लोगों ने कांग्रेस की दलील को मानने से इनकार कर दिया।

कांग्रेस के ऐसे ही दोहरे मापदंड के कारण गुजरात और अन्य जगहों में कांग्रेस चुनाव हारती गयी। अब कांग्रेस में रणनीतिक बदलाव और पार्टी को उदार हिन्दूवाद की ओर जाते देखकर माना जा रहा है कि कांग्रेस ने एके एंटोनी समिति की रिपोर्ट को गंभीरता से लिया है। वर्ष 2014 के लोस चुनाव में पराजय के बाद खुद कांग्रेस ने हार कारणों की जांच का भार कांग्रेस नेता एके एंटोनी को सौंपी थी। एंटोनी रपट में कहा गया है कि एकतरफा और असंतुलित धर्म निरपेक्षता की नीति के कारण भी कांग्रेस की पराजय हुई। बहरहाल, अब गलतियों से सीखने के बाद कांग्रेस फिर से कुछ गलतियां कर रही है। ऐसी गलतियों से आशंका हैं कि भारत में पाॅलिटिक्स का अनुवाद धर्मशास्त्र हो जाएगा।

 

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