चक्रवातीय तूफान जानलेवा, मगर उसके नाम हसीन क्यों?

बंगाल, उड़ीसा व पूर्वोत्तर भारत में ‘ओखी’ होते हैं लड़कियों के नाम और दक्षिण में चक्रवातीय तूफान ‘ओखी’ मचा रही तबाही

देश के किसी हिस्से में ‘ओखी’ नाम भले ही हसीन हो, मगर दक्षिण भारत के तमिलनाडु और केरल में चक्रवाती तूफान ‘ओखी’ जानलेवा साबित हुई है। अबतक इससे 14 लोगों की मौत हो चुकी है। जबकि 70 से अधिक घरों को भारी नुकसान हुआ है। करीब 1300 लोगों को राहत शिविरों में जाना पड़ा है। दर्जनों मछुआओं का कोई पता नहीं चल रहा है। कई पेड़ गिरे और यातायात भी बाधित हुआ है। ऐसे में लोगों के जेहन में ये सवाल उठ सकता है कि आखिर सभी चक्रवातीय तूफानों के नाम इतने हसीन क्यों होते हैं। कुछ नाम तो प्रेमिकाओं वाले होते हैं।

उल्लेखनीय है कि हिंद महासागर में नाम रखने की प्रक्रिया में भारत, बांग्लादेश, मालदीव, म्यांमार, ओमान, पाकिस्तान, श्रीलंका और थाईलैंड शामिल है। वैसे, डब्ल्यूएमओ इस प्रक्रिया पर भी नजर रखता है जो 2000 में शुरू हुई थी। जबकि अटलांटिक में तूफान के नामों में अंग्रेजी, स्पेनी और फ्रेंच नाम होते हैं। एक पुरुष नाम के बाद एक स्त्री नाम का चयन किया जाता है। तथ्यों के अनुसार दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अमेरिकी नाविकों ने अपनी बीवियों और प्रेमिकाओं के नाम पर तूफान का नाम रखने की मांग की। जंग के बाद कई दशकों तक अमेरिकी मौसम विशेषज्ञों ने तूफानों के नाम महिलाओं के नामों पर ही रखे। लेकिन सत्तर के दशक में लिंगभेदी कह कर इसकी आलोचना की गयी।

उष्णकटिबंधीय तूफानों के लिए आम बोलचाल के नाम अल्फाबेट के आधार पर निकाले जाते हैं। अमेरिका का नेशनल हरिकेन सेंटर हर साल के लिए 21 नाम तूफानों के लिए निकालता है। हर साल के लिए नामों का चयन सात साल पहले कर लिया जाता है। वर्ष 2022 के लिए जून से नवंबर में आने वाले बड़े तूफानों में पहला तूफान होगा एलेक्स और इक्कीसवां होगा वाल्टर। मौसम खत्म होने से पहले ही शब्द खत्म हो जाने पर ग्रीक अक्षरों का इस्तेमाल किया जाता है। उनकी शुरुआत अल्फा से होती है।

मालूम हो कि बड़े तूफानों के नाम रखना एक गंभीर काम है। लिहाजा, संयुक्त राष्ट्र के वर्ल्ड मेटेयोरोलॉजिकल ऑर्गनाइजेशन के पास इसमें वीटो अधिकार है। अप्रैल 2015 में डब्ल्यूएमओ के एक एक्सपर्ट पैनल ने पूर्वोतर पैसिफिक की सूची से आईसिस नाम को हटा दिया था। वैसे तो यह नाम तो मिस्र के एक देवता का है, लेकिन इस्लामिक स्टेट के नाम से मेल खाता था जो आतंकवादी गतिविधियों का श्रेय लेने के लिए इसका इस्तेमाल करता है। अटलांटिक बेसिन में तूफानों के नाम रखने की शुरूआत 1950 के दशक में हुई। ताकि चेतावनी के संदेश आसान बनाये जा सकें। नामों को याद रखना नंबर और तकनीकी शब्दों की तुलना में कहीं आसान था।

पश्चिमोत्तर प्रशांत के इलाके में उष्णकटिबंधीय तूफानों को टाइफून कहा जाता है। वहां भी 14 देशों से मिली जानकारी के आधार पर कुछ साल पहले इनका नाम रखने की शुरुआत की गयी है। सभी देश हर साल 10 नाम सुझाते हैं। इनमें पौराणिक किरदारों के साथ खगोलीय चिन्ह्, जानवर, पेड़ पौधे या फिर कुछ और चीज होते हैं। बाद में टोक्यो में मौजूद डब्ल्यूएमओ की टाइफून कमेटी इसकी समीक्षा करती है। एक बार स्वीकार कर लेने के बाद भी देश चाहे तो राष्ट्रीय मौसम की रिपोर्टिंग से बाहर निकल सकते हैं। कोई गलतफहमी ना हो इसके लिए तूफानों के नंबर भी डाले जाते हैं।

 

You May Also Like

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *