सज रही इंसानों की मंडी, गुलामों की हो रही खरीदारी

17 शताब्दी में फली-फुली दास प्रथा 21वीं सदी में लौटी, एक विज्ञापन से हुआ खुलासा

मवेशियों और कल पुर्जों की तरह अफ्रीकी महिला-पुरुष और बच्चे मंडियों में बिक रहे हैं। शारीरिक डील डौल से इनकी कीमत तय हो रही है। न्यूनतम कीमत 400 डाॅलर तय हो रही है। इन दिनों अच्छे भविष्य का सपना लेकर अफ्रीका से यूरोप के लिए निकले कुछ महिला, पुरूष और बच्चों को लीबिया में रोक कर गुलाम बनाया जा रहा है। दरअसल, यहां इसानों की मंडी सज रही है। खरीदार भी यहां आते हैं।

एक अमेरिकी न्यूज चैनल सीएनएन के वीडियो में यह दिखाया भी गया कि युवा लड़के औसत दाम में बड़ी जल्दी बिक जाते हैं। नीलामी करने वाले एक व्यक्ति ने अपने विज्ञापन में पश्चिमी अफ्रीका के एक ग्रुप का हवाला दिया है। इस विज्ञापन में कहा गया कि खेत पर काम करने के लिए मजबूत लड़कों की जरूरत है। जो हो, इस विज्ञापन को देख कहा जा सकता है कि 16-17वीं शताब्दी में पूरी तरह उफान पर रही दास प्रथा भले ही आगे चलकर बंद हो गयी, मगर 21वीं सदी में वापस आने लगी है।

पूरे मामले में कहा जा सकता है कि इंसानी अधिकारों के लिए लड़ने वाले ग्रुप और सरकारें खामोश हैं। गुलाम बने ज्यादातर युवा नाइजर, घाना और नाइजीरिया से आये हैं। यूरोप पहुंचने के लिए उन्हें खतरनाक रास्ता लेना होगा। उन्हें लगता है कि अगर उन्होंने भू-मध्यसागर पार कर लिया तो बेहतर जिंदगी मिलेगी। अफ्रीका की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था नाइजीरिया है। दुनिया भर के तेल उत्पादकों की सूची में नाइजीरिया 13वें स्थान पर है। रोजाना यहां 20 लाख बैरल तेल निकाला जाता है। दूसरे देश यानी नाइजर में भले ही तेल का उत्पादन कम हो, लेकिन वह भी अपने नागरिकों की देखभाल कर सकता है। तेल से समृद्ध देश घाना भी खामोश है। इन तीन देशों ने भी अब तक अपने नागरिकों को गुलाम की तरह बेचे जाने के खिलाफ कुछ नहीं किया है।

लीबिया में दास बनाकर रखे गये लोगों को कैसे वापस लाया जाएगा, इस बारे में कोई प्लान नहीं बनाया गया है। वर्ष 2015 में यूरोपीय संघ ने लीबिया को सीमा सुरक्षा और नियंत्रण को बेहतर करने के लिए फंड दिया था। ताकि अफ्रीका के लोगों को अपना देश छोड़ने से रोका जा सके। ऑपरेशन सोफिया से यूरोप की तरफ जाने वाले लोगों की संख्या में 20 फीसदी की कमी आयी। यूरोपीय संघ के कदमों से अफ्रीकी लोग भले ही भूमध्यसागर पार कर इटली न पहुंच पायें, लेकिन लीबिया में वे गुलाम जरूर बन रहे हैं। दास प्रथा या गुलामों का सौदा मानवता के खिलाफ अपराध है। मगर ये अपराध बदस्तुर जारी है।

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