‘अमर‘वादी दौर में लालू-नीतीश पर बकथोथरी

तुलसी दास

अमरवादी दौर भारतीय राजनीतिक इतिहास की सबसे आदर्श अवस्था है। जहां तमाम राजनीतक विचारधाराएं कुर्सी वंदना में पानी भरने जाती हैं, वहीं अमरवादी सियासी दौर शुरु होता है। मगर, इस दौर में नीतीश-लालू प्रकरण पर बकथोथरी अमरवाद के विस्तार में बड़ी रूकावट है। इस वाद के प्रणेता अमर सिंह की उत्कट स्पष्टवादिता और सच को उसी सच के रूप में स्वीकारने की उनकी असरदार क्षमता देश के भावी राजनेताओं की प्रेरणा बन सकती है। लेकिन, नीतीश-लालू के मूढ़ समर्थक बिल्लियां बनकर अमरवाद का रास्ता काटते हुए इसकी जड़ों में ही मट्ठा डालने पर अमादा हैं। तौबा-तौबा।
अमर सिंह यानी समाजवादी भी नहीं गांधीवादी भी नहीं। वे भगवाधारी भी नहीं हैं। उनके पोशाक से इमानदारी या सादगी की मजाल नहीं कि ताक-झांक कर ले। इसलिए तो वे कहीं जायें-कहीं आयें, किसी को ताज्जुब नहीं होता। लेकिन, नीतीश या लालू अमरवाद की अवस्था तक पहुंच ही नहीं पाये। हमेशा कुर्सी को अपना अंतिम लक्ष्य बताने मंे कतराते रहे। लालू ने जब चुनाव लड़ने की पात्रता खो दी तब अध्यात्मिक हो गये थे। कहने लगे थे सियासत तो माया है। लेकिन, महागठबंधन की माया में फंस गये। धर्मनिरपेक्षता की माया के साथ तमाम सियासी पैंतरों की माया को आजमाया। जोड़-तोड़ की माया चल पड़ी तो अध्यात्मिता को अलविदा कह दिया। वोट की माया भी उनके पक्ष में गयी। लगा परिवार और बेटों का भविष्य संवर गया है। मगर, पूरा घटनाक्रम ही माया।
खैर, नीतीश-लालू प्रकरण में लालू आज सोशल मीडिया पर खुद के धर्मनिरपेक्ष होने का आभास कराने वालों की सहानुभूति बटौर रहे हैं। जबकि नीतीश निशाने पर हैं। क्योंकि, नीतीश भूल गये थे कि महागठबंधन की सरकार के मुखिया बनने के बाद सरकार के कामकाज से उनके सुशासन बाबू की छवि धुमिल हुई थी। उन्हें गुमान था कि लोग उन्हें धर्मनिरपेक्षवादी से ज्यादा विकासवादी और सुशासनवादी के तौर पर देखेंगे। नीतीश ने भी सुन रखा था कि भारतीय स्मृति छोटी होती है। मगर, वे गच्चा खा गये। लोगों ने सवाल उठा दिया कि वर्ष 2009 की एक चुनावी सभा में नीतीश ने मोदी से हाथ नहीं मिलाकर क्या बताना चाहा था। बाद में एनडीए से भी अलग हो गये। मोदी के नाम पर। बिहार में आयी बाढ़ के वक्त गुजरात से भेजी गयी तत्कालीन मुख्यमंत्री मोदी की सहायता ठुकराकर वे धर्मनिरेक्षपेक्षता को सत्ता की सीढ़ी क्यों बना रहे थे। जो हो, नीतीश भी ठहरे लालू की तरह घाघ। सो, दिखा दिया कि सियासत में भ्रष्टाचार, परिवारवाद, लफुआवाद से वे समझौता नहीं कर सकते हैं। लोगों को जो कहना है कहे, सत्ता अब भी साथ है।
नीतीश का यू टर्न लोगों को ताज्जुब और गुस्से में भर रहा है। लालू के खिलाफ भी लोगों का यही भाव तब होगा, जब पाला बदलकर वे इमानदारी का पेटेंट हासिल कर चुकी आम आदमी पार्टी में चले जायें। अब नीतीश-लालू को अमर सिंह से सियासी दीक्षा लेनी चाहिए। क्योंकि, अमर सिंह कुछ भी कर लें ताज्जुब नहीं होगा। दरअसल, अमर सिंह विचारों की बात नहीं करते हैं। न सांप्रदायिकता पर हठ ठानते हैं न धर्मनिरपेक्षता को सियासत की कसौटी मानते हैं। वे सिर्फ रिश्ते, संबंध, मित्रता और सहयोग की बात करते हैं। जब वे सोनिया मैडम को इटली की महिला कहने लगे तब कहा कि वे मैडम का विरोध नहीं कर रहे थे, बल्कि मित्र मुलायम को प्रधानमंत्री का दावेदार बनाने के लिए ऐसा कुछ कहा था। मित्रता के लिए ही वे अजीत सिंह की पार्टी में गये। रिश्ते निभाने के लिए वापस सपा में आये। और अब, संबंधों के लिए भाजपा के करीब हैं।

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