आज 14 साल की हो गई फेसबुक की आभासी दुनिया ने असली दुनिया के लोगों को मोटा-मोटी इन 11 खांचों में बांट दिया है

शुभम उपाध्याय

आज फेसबुक का जन्मदिन है. चौदहवां. बीते कुछ सालों से आप हर साल इस दिन फेसबुक को बधाई देने वाले कई अच्छे और भावपूर्ण लेख पढ़ते रहे हैं. फेसबुक की जायज तारीफों को रंगीन पन्नों पर दीवाली के दिनों की तरह झालर-लट्टुओं से सजाने वाले वे सारे लेख आपको फेसबुक के बारे में वह सबकुछ ज्ञात करवा चुके हैं जो फेसबुक के बारे में अच्छा है, बहुत अच्छा है. इस तेरहवें साल में आप, 11 उन भिन्न-विभिन्न प्रकार के फेसबुक नुमाइंदों के बारे में पढ़िए जो फेसबुक को एक विचित्र जगह बना रहे हैं.

वैसे बारीकी करने पर इनके सैकड़ों प्रकार मिल जाएंगे और जिनकी वजह से ही इनदिनों सामान्य शांतिपसंद व्यक्ति फेसबुक पर अजनबी लोगों की फ्रेंड रिक्वेस्ट स्वीकार करने से डरता है. सोचता है काश, हर प्रोफाइल के साथ उस व्यक्ति का लोकल थाने का कैरेक्टर सर्टिफिकेट भी होता. लेकिन जब तक मार्क जकरबर्ग आपके लोकल थाने से संपर्क करके ऐसा साफ्टवेयर डेवलप करते हैं, आप यहां हजारों में से छांटे (छंटे!) हुए 11 ऐसे भिन्न-विभिन्न प्रकार के नुमाइंदों के बारे में विस्तार से पढ़िए और बिना अमेरिकी सहायता के ही अपना फेसबुक स्वच्छ रखिए.

जोंक

ट्विटर पर इन्हें ट्रोल (troll) कहते हैं. फेसबुक के पास इनके लिए अपना कोई शब्द नहीं है, इसलिए ट्रोल से ही ट्रोलिंग हो रही है, लेकिन जोंक ज्यादा वाजिब, ज्यादा सटीक है. कम सभ्य इस शब्द पर कुछ सुधीजनों को आपत्ति हो सकती है लेकिन जब इस प्रकार के नुमाइंदे आपसे फेसबुक पर चिपक जाते हैं तो वो क्रिया किसी जोंक के चिपकने की ही पीर लिए होती है. जौंक ज्यादातर राजनीतिक एजेंडे वाले ही होते हैं. कुछ पर्सनल एजेंडे वाले भी होते हैं, लेकिन राजनीतिक रूप से सक्रिय नुमाइंदों के सामने ये इतनी कम संख्या में हैं कि हमारे पास उनका जिक्र करने तक का स्पेस नहीं है. राजनीतिक रूप से सक्रिय जोंकों में तीन मुख्य उप-प्रकार हैं जिन्होंने फेसबुक पर हाहाकार मचा रखा है : संघी ट्रोल, कांग्रेसी ट्रोल और आप ट्रोल.

इसमें कुछ गलत नहीं है कि संघ के चाहने वाले फेसबुक-ट्विटर पर राजनीतिक प्रचार करें, लेकिन अराजक तत्वों की तरह व्यवहार तो न करें. वे इंटरनेट पर ऐसे व्यवहार करते हैं जैसे अभी-अभी मुगलों से कोई जंग लड़कर आ रहे हैं और चूंकि हार चुके हैं, अपनी हार का फ्रस्ट्रेशन इंटरनेट पर गप्प लगाकर और बातों को हांककर निकालना चाहते हैं. वे किसी की नहीं सुनते, और सभी को अपनी सुनाते हैं. आप उनसे दूर भागते हैं, वे आपके पास भागते-भागते आते हैं. दूसरों के विचारों को सुनना बहुत अच्छी बात है, और इसके लिए हम हमेशा तैयार हैं, लेकिन कानों में आकर तो मत चिल्लाओ, हमारे पास और भी कई काम हैं.

इनका मुकाबला करने के लिए कांग्रेस ने भी अपने ट्रोल्स फेसबुक पर उतारे. देर से ही सही. लेकिन बेचारे ये ट्रोल्स जबतक अस्तित्व में आकर अपना काम संभालते, उनकी सरकार ही बिना अस्तित्व हो गई. तीसरा प्रकार, सफेद नाव को उलटा करके सिर पर पहनने वाले, ‘आप’ ट्रोल, शुरू में समझदार लगते थे, लेकिन ये भी अब किसी की नहीं सुनते. सिर्फ अपनी सुनाते हैं. हालांकि बदतमीजी कम करते हैं, लेकिन तमीज की कमीज भी कम ही पहनते हैं. इनके लिए पृथ्वी के हर कण में भ्रष्टाचार है और उन्हीं की झाडू में हर कण की सफाई लायक सींकें हैं. ये अब बेहद जल्दी-जल्दी उस रेखा के पास आते जा रहे हैं जहां संघी ट्रोल्स खड़े हैं.

कंटीले क्रांतिकारी

ये ट्रोल होते-होते बचे हैं. क्योंकि एक तो ये मेनस्ट्रीम पॉलिटिक्स का हिस्सा नहीं बन पाते, दूसरे कभी-कभी काफी सयानी बातें भी कर जाते हैं. ये ज्यादातर वाम झुकाव वाले नुमाइंदे हैं, और जो उलटी तरफ नहीं झुके हैं, वे या तो पॉलिथिन का उपयोग न करने पर क्रांति करना चाहते हैं, या सड़क पर पीकने वालों की कंबल-कुटाई करके क्रांति पाना चाहते हैं. ये वह विचित्र प्रकार हैं जो हर हाल में बस क्रांति को लाना चाहते हैं. ये उन फेसबुकर्स को हिकारत से देखते हैं जो मॉल में नंगे आमिर के साथ खींची फोटो को उन्हें टैग करते हुए फेसबुक पर डालते हैं.

और जो मो. रफी के प्रेम गीतों के लिंक क्रांतिकारी गीतों से ज्यादा शेयर करते हैं. ये अपनी बहुआयामी पोस्टों में अनगिनत इशारे करके कहते भी हैं कि यह मंच, फेसबुक, मस्ती के लिए नहीं, क्रांति के लिए है और अगर आप मुद्दों की बात यहां नहीं उठा रहे हैं, उनपर तीखी बहसें नहीं कर रहे हैं, तो अपनी जिंदगी व्यर्थ कर रहे हैं. इनके लघुकथा बराबर बड़े-बड़े स्टेटस पोस्ट पर कमेंट सेक्शन में हफ्तों बहस चलती है और हर कमेंट इतनी चिंगारी पैदा कर देता है कि सब इकट्ठी कर लो तो ठंड में कम से कम एक बाल्टी पानी गर्म कर आसानी से नहाना हो जाए.

सुब्रमण्यम स्वामी

ये अकेले व्यक्ति फेसबुकर्स का एक पूरा का पूरा प्रकार हैं. न इनके पहले इन जैसा कोई था, न इनके बाद कोई होगा. इनके बारे में जब भी कुछ आलोचनात्मक लिखा जाता है, प्रत्येक शब्द डरा रहता है कि कहीं स्वामी जी ‘सू’ न कर दें (अंग्रेजी भाषा का वह शब्द जिसको अमेरिका में पब्लिकली बोलते ही फटाक से मुकद्दमा दर्ज हो जाता है). कारण यही है कि स्वामी जी में हर उस जीवित-अजीवित वस्तु पर मुकद्दमा करने की क्षमता है जिसे सूरज की किरणें छू सकती हैं. कहते हैं कि इनके पास हर जीवित व्यक्ति के बारे में खुफिया जानकारी है और इसीलिए इनको किसी पर भी मुकद्दमा कर सकने का वरदान प्राप्त है. और इसीलिए ही, इस लेख का साधारण लेखक स्वामी जी से पहले ही विन्रम निवेदन करना चाहता है कि अपना नाम विचित्र नुमाइंदों में पढ़कर वे इसे या तो एक साधारण लेख समझकर नजरअंदाज कर दें, या फिर इसे व्यंग्य समझकर माफ कर दें.

फेंकबुकिए

इस प्रकार में से कई सुब्रमण्यम स्वामी की छांव में से निकले हैं और इसलिए फेंकने में बहुत सिद्धहस्थ हैं. ये नुमाइंदे पहले तो समेटने की औकात से ज्यादा फेंकते हैं और फिर उसे लपेटना भूलकर घर चले जाते हैं. रात-दिन राह से गुजरने वाला हर एक शख्स सड़क पर इनकी बिना लपेटी रह गई बातों में उलझता है, और जो उलझ के फंसता है फिर वो टैग कर पोस्ट को दूसरे की तरफ फेंकता है, दूसरा उसे लपक कर शेयर करते हुए सैकड़ों की तरफ उछाल देता है और इसी प्रकिया का पालन करते हुए वो पोस्ट, और उस जैसी दर्जनों पोस्ट, वायरल हो जाती हैं.

पेट्रोल देते वक्त पंप मालिकों की चालाकी, वेटिकन सिटी का शिव लिंग के रूप में बसा होना, सूरज से ओम की आवाज का निकलना, से लेकर प्लास्टिक के कपों में चाय नहीं पीनी चाहिए और प्लास्टिक के बर्तनों को माइक्रोवेव में नहीं रखना चाहिए क्योंकि प्लास्टिक से निकलने वाले रसायनों से 32 प्रकार के कैंसर होते हैं. कैंसर का घर पर ही घरेलू नुस्खों से इलाज हो जाने की विधियां बताते ये फेंकबुकिए आपके जीवन में शुरू में हास्य लाते हैं, और बाद में सरदर्द से जन्मे आंसू.

मार्कण्डेय काटजू

काटजू साहब भी अपने आप में एक संपूर्ण प्रकार हैं. ये हमारे समय के वो दुर्लभ फेसबुकर हैं जो हमें न्यायविदों की दुनिया में झांकने का मौका देते हैं. वो वाले ‘जज साहब’ जिन्हें हमने सिर्फ फिल्मों में देखा था या फिर तीस हजारी की पिछली बेंच पर बैठकर. वे रोज स्वयं चलकर हमारे घरों में फेसबुक के माध्यम से सुबह पांच बजे से प्रवेश करते हैं, यह एक अतुलनीय घटना है. ये अखबारों और टीवी चैनलों को रोज अपने कोटे से एक खबर मुफ्त देते हैं, और जब कोई उनसे पूछता है कि क्या आप कोर्ट में भी इसी तरह फैसले दे दिया करते थे जैसे फेसबुक पर देते हैं, तो काटजू साहब शायर होकर कहते हैं कि किसी फूल को पसंद करने का मतलब यह नहीं है कि मैं उसे तोड़ूंगा भी. वे उस नाटक के टाइटल के विलोम से भी गंभीर रूप से प्रभावित लगते हैं, ‘मां रिटायर होती है’, और इसलिए मानते हैं कि जज साहब कभी रिटायर नहीं होते. अदालत से हो भी जाएं, फेसबुक से नहीं होते.

आत्ममुग्ध

आत्ममुग्धता इस दशक की सबसे तेजी से फैलती बीमारी है. फेसबुक-ट्विटर और इंस्टाग्राम के इस दौर में किसी से कहना ‘अरे, राजेश खन्ना मत बन’, जैसे आत्ममुग्धता का ही मजाक उड़ाना है. सबके पास अपनी-अपनी आत्ममुग्धताएं हैं और वे सब अपनी इस आत्ममुग्ध पहचान से खुश हैं. उन्होंने इसे बीमारी मानने से साफ इंकार कर दिया है. आपका कोई पसंदीदा साहित्यकार, जिनकी जमीन से जुड़ी कहानियां आप हमेशा पढ़ते रहे हैं, और हाल फिलहाल में फेसबुक पर भी उनके श्रोता हुए हैं, असल जीवन में खुद कितना आत्ममुग्ध है ये आपको फेसबुक से ही पता चलता है.

यह आत्ममुग्धता किसी व्यक्ति विशेष की नहीं है, फेसबुक पर रहने वाले ढेरों साहित्यकार, अभिनेता, कलाकार, गायक, पत्रकार, समाजसेवी आज इसी बीमारी से पीड़ित हैं. इन मशहूर सेलिब्रिटीज को रोज अपनी न्यूज फीड में देख रहा आम आदमी भी अपने अंदर उसी आत्ममुग्धता की खोज में है. वो जीवन में कुछ हासिल बाद में करता है, पहले अपना फैन पेज बनाता है. हो सकता है वो अभी कॉलेज से भी न निकला हो, लेकिन अपनी फेसबुक प्रोफाइल के अलावा अपने फैन पेज के माध्यम से वो चाहता है कि दुनिया पहले उसकी फैन हो जाए. अपने दोस्तों और फॉलोअर्स की संख्या बताते हुए वह जितना खुश होता है, एक जमाने में बोर्ड एग्जाम में अस्सी प्रतिशत लाने वाला संभावनाशील नौजवान इतना खुश हुआ करता था. उसे वो हो जाना है, जो उसका आदर्श सेलिब्रिट्री है, और उसके लिए उसे सिर्फ फेसबुक पर बैठने की मेहनत भर करनी है, क्योंकि आत्ममुग्धता वाली प्रतिभा उसने अपने में विकसित कर ली है.

छोड़त-पकड़त, पकड़त-छोड़त

यह अनोखा समूह उन लोगों का है जो फेसबुक पर आते हैं, कुछ अरसा बिताते हैं, फिर अपना अकाउंट डीएक्टिवेट कर चले जाते हैं. आपको लगता है कि वे हमेशा के लिए फेसबुक छोड़ गए हैं, लेकिन वे फिर एक महीने बाद लौट आते हैं. अपना पुराना एकाउंट एक्टीवेट करते हैं और नए सिरे से एक बार फिर फेसबुक पर सक्रिय हो जाते हैं. आपकी फेसबुक यारी शुरूआती झिझक के बाद उनसे फिर बढ़ जाती है लेकिन कुछ दिन बाद आप उन्हें फिर डीएक्टीवेटिड पाते हैं. आप उनपर मन ही मन हंसते हैं और उन्हें हमेशा के लिए भूल जाते हैं. लेकिन कुछ अरसे बाद वे फिर अपने आप को एक्टीवेट करते हैं और इस बार आप उन्हें मनोचिकित्सक के पास जाने की सलाह देते हैं. वे फेसबुक चैट पर मुस्कुराने वाली स्माइली आपको भेजते हैं, और फिर कोई आध्यात्म से ओत-प्रोत या क्रांति की लाल आग से सराबोर पोस्ट डालते हैं. ये आखिरी बार नहीं है जब वे वापस लौटे हैं, ये फिर फेसबुक को छोड़ेंगे और फिर कुछ वक्त बाद उसे पकड़ेंगे. ये न फेसबुक को पूरी तरह छोड़त हैं, न पूरी तरह पकड़त हैं. इस तरह के विचित्र नुमाइंदों में आम इंसान भी हैं और मशहूर पत्रकार निर्देशक भी.

कुछ, शेयर करत कुछ

ये विचित्र प्रकार असल जिंदगी में करता कुछ है, फेसबुक पर पोस्ट करता कुछ और ही है. अपने यार-दोस्त फेसबुकर्स के बीच कूल बने रहने के लिए. अंग्रेजी भाषा के पास इनके लिए एक सटीक शब्द है : हिपोक्रेट. इसमें वे लड़कियां शामिल हैं जो पूरी धूमधाम से फिल्मी अंदाज में लाखों रुपयों की खर्चीली अरेंज्ड शादी करने का अपना सपना पूरा करती हैं, शादी के उस पूरे सिस्टम, जो अपने कई रिवाजों में शर्मनाक है, को अपनी सहूलियत के लिए आत्मसात करती हैं. कुछ अरसे बाद फेसबुक पर शादी के उस पूरे सिस्टम की आलोचना करता लेख शेयर करते हुए अपने को रूढ़िवादी समाज का विरोधी दर्शाती हैं. थोड़े दिन बाद वे पितृसत्ता का विरोध करते हुए फेसबुक पर बहस करती हैं और फिर चुपचाप, फेसबुक दोस्तों से छिपाकर, अपने पति की लंबी आयु के लिए खुद की इच्छा से करवाचौथ रखती हैं.

इस विचित्र प्रकार में वे लड़के भी शामिल हैं जो फेसबुक पर दहेज विरोधी होते हैं और शादी के बाद उनके घर आई स्पोर्ट्स यूटिलिटी व्हीकल दहेज के पैसों की ही होती है. वे फेसबुक पर नारीवादी होते हैं लेकिन घर पर दफ्तर से लौटी पत्नी के हाथों की बनी रोटियां ही खाते हैं. इनमें वे लोग भी हैं जो अपनी राजनीतिक विचारधाराएं फेसबुक के लिए अलग रखते हैं, और घर के लिए अलग. वे लोग भी, जो समाज में व्याप्त असमानताओं पर फेसबुक पर खूब लिखते हैं, लेकिन जब सामने पुलिसवाला पन्नी बीनने वाले बच्चे को मारता है तो गाड़ी आगे बढ़ा देते हैं, और घर आकर मार्मिक और मारक भाषा की मदद से फैक्ट में फिक्शन मिलाकर फेसबुक-कथा रचते हैं. शायद, इस प्रकार के नुमाइंदों में थोड़े-थोड़े हम सब होते हैं.

दान-पात्र फेसबुक

वे विचित्र प्रकार के नुमाइंदे जो हमेशा कुछ न कुछ मांगते रहते हैं. पहले वे केवल हमारा सपोर्ट मांगते थे फेसबुक पर. अब आत्मीय भाषा में पैसा, वक्त, फ्री में फ्रीलांसिंग मांगते हैं. इनमें वे लोग भी हैं जो खुद हर काम के पैसे लेते हैं लेकिन आपसे फ्री में काम चाहते हैं क्योंकि आप युवा हैं, समाज को बदलना चाहते हैं. और चूंकि विदेशों से एक शब्द हमने ग्रहण किया है, इंटर्न, जिसके बाद उस युवा को जिसे आप इंटर्न कहते हैं, पैसे देने की जरूरत नहीं पड़ती, इसलिए वे अपने प्रोजेक्ट के विकास के लिए ऐसे इंटर्नों की तलाश में फेसबुक पर आते हैं और अपने कार्यों की तारीफ से इसे रंगते हैं. फेसबुक के दान-पात्र हो जाने का ट्रेंड जब शुरू हुआ था, तब कुछ ईमानदार लोग थे जो सच में मदद चाहते थे.

अब फेसबुक पर मांगना एक बिजनेस-मॉडल बन गया है जिसमें प्रतिभाओं का शोषण रोज हो रहा है. कोई कुछ कहता नहीं है क्योंकि मांगने का सलीका काव्यात्मक, उम्मीदों भरा होता है. और वो वाली कविता जो उम्मीदों की बात करती हो, किसे पसंद नहीं आती.

चेक-इन, चेक-आउट

वे अनोखे नुमाइंदे जो फेसबुक का उपयोग दुनिया जगत को यह बताने के लिए करते हैं कि वे कहां दाखिल हुए और कहां से बाहर निकल आए. एयरपोर्ट होटल, मोटल, पोर्टल इत्यादि. कुछ सयानों की प्रोफाइल में आपको उनके चेक-इन चेक-आउट डिटेल्स के अलावा कुछ मिलता ही नहीं है. जिनके में मिलता है, उन्हीं चेक-इन चेक-आउट की डिटेल्ड व्याख्या मिलती है, और फिल्टर चढ़ी तस्वीरें, जिन्हें वे यात्रा-वृतांत कहलवाना चाहते हैं. जाहिर है ऐसी घुमक्कड़ी उन्हें राहुल सांकृत्यायन नहीं बनाती, बल्कि शो-ऑफ करने वाला वह बुत बना देती है जो दुनिया के ओर-छोर घूमने के बाद भी विचार के लेवल पर कम विचारणीय होता है.

सीरियल लाइकर्स

वे लोग जो फेसबुक पर आते हैं और धड़ाधड़ दूसरों की पोस्ट और तस्वीरें लाइक करना शुरू कर देते हैं. इनमें से कुछ खास तरह के लड़के जब फेसबुक पर प्रकट होते हैं आपको समझ आ जाता है कि वे ऑनलाइन हैं, क्योंकि सीधे हाथ की तरफ जो लाइव टिकर चलता है, वह बता देता है कि भले आदमी ने अपनी प्रोफाइल में मौजूद लड़कियों की तस्वीरें और पोस्ट तूफानी गति से लाइक करना शुरू कर दी हैं. वे लाइक करने के प्रति इतने समर्पित होते हैं कि उन पोस्टों को भी आगे बढ़-बढ़कर लाइक करते हैं जिसमें किसी के गुजर जाने की दुखद सूचना दी गई होती है. वे तब और खास हो जाते हैं जब अपनी ही पोस्ट को सबसे पहले लाइक करते हैं.

आप भी खत्म हो चुके इस आर्टिकल को फेसबुक पर जरूर लाइक कीजिएगा, और खुद का लेख खुद लाइक करके खुद ही फेसबुक का विचित्र नुमाइंदा होने से लेखक को बचाइएगा.

सत्याग्रह.स्क्रॉल से साभार