केरल की राजनीतिक हिंसा को सियासी साये में समझें

फिर केरल में हिंसा, सीपीएम जुलूस में विस्फोट के बाद संघ के कैडर पर जानलेवा हमला

साठ सालों से राजनीतिक हिंसा झेल रहा केरल अब भी अशांत है। कन्नूर जिले में आरएसएस के एक कैडर पर रविवार को जानलेवा हमला हुआ। इसे सीपीएम के जुलूस पर आठ अक्टूबर को बम फेंककर किये गये हमले के प्रतिशोध के बतौर देखा जा रहा है। लेकिन, न तो इसे जारी राजनीतिक हिंसा का अंत मान सकते हैं और न शुरूआत। इस हिंसा को मध्यकाल ही माना जाएगा। इस राजनीतिक हिंसा को अंत तक पहुंचाने के लिए इसे सियासी साये में समझना होगा।

इस हिंसा का कारण सीपीएम की ओर से जारी भाजपा भगाओ अभियान नहीं है। इस हिंसा की वजह केरल में बीजेपी की जनरक्षा यात्रा भी नहीं। क्योंकि, यह हिंसा केरल में 60 साल पुरानी है। तब केरल में इएमएस नम्बुदरीपाद की सत्ता थी तो केंद्र में नेहरू की। आजादी के बाद पहली बार किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा तो वह केरल ही था। यहां वर्ष 1959 में राष्ट्रपति शासन लगाया गया। केरल को लेकर यह कांग्रेस का सियासी दांव था। जबकि अब केंद्र में मोदी की सरकार है तो केरल में विजयन की।

इस पूरे 60 साल में भाजपा केरल में जम नहीं सकी। हालांकि संघ परिवार की सबसे ज्यादा करीब पांच हजार शाखा केरल में ही है। मालूम हो कि 60 साल पहले चर्च के अधीन चलने वाले स्कूल काॅलेजों पर नकेल कसने का सवाल था। तब नंबूदरीपाद चाहते थे कि निजी स्कूलों में वेतन बेहतर हो और काम का वातावरण अच्छा हो। इसी मसले पर वर्ष 1957 में शिक्षा विधेयक लाया गया। इसका कैथोलिक चर्च ने विरोध कर दिया। क्यांेकि उसके स्कूल-काॅलेजों की तादाद ज्यादा थी। उधर नायर समुदाय के चैरिटेबल स्कूल-काॅलेज थे तो उसने भी विरोध किया। उस वक्त कांग्रेस नायर समुदाय के लीडर मनंत पदमनाभा पिल्लई के साथ थी।

उस वक्त हड़ताल, प्रदर्शन, दंगे से होते हुए आंदोलन इतना हिसंक हो गया कि पुलिस ने 248 जगहों पर लाठीचार्ज किया और तीन जगहों पर गोली चला दी। इसने आंदोलन को और भड़का दिया। नंबूदरीपाद को पसंद करने वाले नेहरु भी तब कांग्रेस के दवाब में आ गये। फिर भारत में पहली बार चुनी हुई सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन 31 जुलाई 1959 को लगाया गया। इसके बाद कांग्रेस यूडीएफ गठबंधन सत्ता में आयी। बाद में वामपंथियों-कांग्रेसियों में सत्ता स्थानांतरित होती रही। जबकि इन दिनों संघ अपने विस्तार के लिए सांस्कृतिक अभियानों के साथ राजनीतिक तरीकों को इस्तेमाल कर रहा है। जनरक्षा यात्रा को इसी की एक कड़ी के तौर पर देखा जा रहा है।

जो हो, रविवार को जानलेवा हमले में घायल संघ के कैडर को अस्पताल में भर्ती कराया गया है। इधर, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी भी रविवार को केरल में थे। यहां उन्होंने सीपीएम के सफाए की भविष्यवाणी की। कहा कि केरल में सीपीएम का सफाया होगा। ये पूरी पार्टी समाप्त हो जाएगी। मालूम हो कि आठ अक्टूबर को सीपीआई-एम के जुलूस पर बम फेंककर हमला किया गया था। जिसके बाद केरल पुलिस ने भाजपा के दफ्तरों पर छापेमारी की। एक जगह तलवार व तीन स्टील बम मिले थे।

बहरहाल, हाल के वर्षों की हिंसा में मारे जाने वालों में एक तरफ भाजपा और संघ के स्वयंसेवकों के नाम हैं तो दूसरी तरफ सीपीएम कैडरों के नाम। कन्नुर में सीपीएम के 30 कैडर तो संघ के 31 स्वयंसेवकों की हिंसा में मौत हुई है। जबकि वर्ष 2001 से 2016 तक कुल 172 राजनीतिक हत्यायें हो चुकी हैं। जिसमें बीजेपी-संघ के स्वयसेवकों की संख्या 65 है तो सीपीएम क 85 कैडर मारे गये हैं। इसके अलावा कांग्रेस के 11 और आईयूएमएल के भी 11 कार्यकत्ताओं की मौत हुई है। हालांकि एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार राजनीतिक हिंसा के मामले में देश में पहले स्थान पर उत्तर प्रदेश है। जबकि केरल टाॅप 10 में भी शामिल नहीं है।

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