गरीब सवर्णों को आरक्षण के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका

यूथ फॉर इक्वलिटी नाम के एक संगठन ने सामान्य वर्ग को आर्थिक आधार पर 10 फीसदी आरक्षण देने के लिए संसद में पारित 124वें संविधान संशोधन को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। संगठन ने अपनी याचिका में कहा है कि यह संशोधन संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। यूथ फॉर इक्वलिटी ने याचिका में इस मुद्दे पर तत्काल सुनवाई की मांग की है और आर्थिक आधार पर नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण देने संबंधी इस संशोधन पर स्टे लगाने की मांग की है। माना जा रहा है कि सर्वोच्च न्यायालय में इस पर अगले हफ़्ते सुनवाई हो सकती है।

यूथ फॉर इक्वलिटी ने कहा है कि यह संविधान संशोधन पूरी तरह से उस संवैधानिक मानदंडों के खिलाफ है जिसके तहत इंदिरा साहनी केस में नौ जजों ने कहा था कि आरक्षण का एकमात्र आधार आर्थिक हालत नहीं हो सकती है। इस तरह यह संशोधन कमजोर है और इसे निरस्त किया जाना चाहिए। संगठन के अध्यक्ष डॉ. कौशलकांत मिश्रा ने कहा है कि आर्थिक रूप कमज़ोर सामान्य वर्ग को आरक्षण की जरूरत है। लेकिन यह संशोधन वर्तमान आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा के अलावा 10 फीसदी है, इसका विरोध है। सामान्य वर्ग को दिया जाने वाला 10 फीसदी कोटा सीमा के भीतर ही होना चाहिए।

संगठन ने यह भी कहा है कि धीरे धीरे जाति आधारित आरक्षण को खत्म कर आर्थिक आधार पर आरक्षण दिये जाने की जरूरत है। मालूम हो कि लोकसभा के बाद राज्य सभा में भी यह विधेयक पास हो गया है। राज्यसभा में इस बिल में संशोधन के तमाम प्रस्ताव गिरे और ये बिल उसी रूप में पारित हुआ है, जिस रूप में सरकार ने इसे पेश किया था। उल्लेखनीय है कि पहले भी कई बार प्राइवेट मेंबर बिल लाकर अनारक्षित वर्ग के लिए आरक्षण संबंधी सुविधाएं देने की मांग हुई थी। नरसिंह राव सरकार ने वर्ष 1992 में एक प्रावधान किया था, पर संविधान संशोधन नहीं होने से इसे सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त किया था।

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