गुजरात पहुंचा कालाधन, होगी वोटरों के इमान की नीलामी

जनता की खुशहाली के लिए होने वाले खर्चों से हजारों गुणा अधिक हो रहे चुनाव पर खर्च

तुलसी दास

देश में भले ही कालेधन पर हाय-तौबा मची है, लेकिन गुजरात में इसी कालेधन के बूते कई पार्टियों की इज्जत टिकी है। अंग्रेजी न्यूज चैनल इंडिया टुडे के स्टिंग से इस बात का खुलासा हुआ है कि हवाला के जरिये कालेधन का इस्तेमाल राजनीतिक दल गुजरात चुनाव में कर रहे हैं। हीरा और जवाहरात कारोबारी जिस आंगड़िया सर्विस से परंपरागत तरीके से नकदी भुगतान लेते और देते रहे हैं, उसी आंगड़िया सर्विस का इस्तेमाल कर कालाधन चुनावी खर्च के लिए राजनीतिक पार्टियों तक पहुंच रहा है। अब इसी पैसे से मतदाताओं के इमान की नीलामी पांच साल के लिए कराये जाने की तैयारी है।

लोकतंत्र पर भारी चुनाव का खर्चतंत्र

जो हो, अब जो स्थितियां सामने हैं, वह भारतीय लोकतंत्र के लिए चिंताजनक हैं। चुनाव में खनकते पैसों की बाजीगरी से संसद व विधानसभाओं पर लोगों का भरोसा ही खतरे में पड़ सकता है। चुनाव के खर्चतंत्र से अशुभ हो रहे हालात को आंकड़े से समझा जा सकता है। श्रम व रोजगार मंत्रालय की 2016 की रिपोर्ट के अनुसार देश में 4,85,00,000 युवा बेरोजगार हैं। सिर्फ 2,96,50,000 लोगों के पास रोजगार है। 9,26,76,000 किसान परिवारों की आमदनी देश की औसत आमदनी के आधी से भी कम है। देश में 11,90,98.000 मजदूर परिवारों की आय किसानों की औसत आय के आधे से कम है। ऐसे में सवाल है कि किस चुनावी उम्मीद के साथ कैसा भारत या गुजरात बनाने की तैयारी है?

भूखे-नंगों के देश में इतना बड़ा चुनावी खर्च कैसे?

वर्ल्ड हंगर इंडेक्स के आंकड़ों के अनुसार दुनिया के सबसे ज्यादा भूखे लोगों के देश में चुनाव पर सबसे ज्यादा खर्च आखिर कैसे कर लिया जाता है। चुनाव आयोग के आंकड़े बताते हैं कि देश के पहले आम चुनाव वर्ष 1951-52 में 10 करोड़ 45 लाख रुपये खर्च हुए। उदारीकरण व आर्थिक सुधार के वक्त वर्ष 1991 के आम चुनाव में 3 अरब 59 करोड़ 10 लाख रुपये चुनाव पर खर्च हुए। जबकि वर्ष 2004 के चुनाव में 13 अरब 20 करोड़ 55 लाख रुपये खर्च किये गये। मगर, पिछले आम चुनाव वर्ष 2014 के चुनाव में 34 अरब 26 करोड़ 10 लाख रुपये खर्च हुए। मसलन, देश की अर्थव्यवस्था जितनी उछली, लोगों की आय में जितनी बढ़ोतरी हुई उससे हजारों गुणा ज्यादा की बढ़ोतरी देश में चुनावी लोकतंत्र के खर्चीले श्रृंगार यानी चुनाव खर्च में हो गयी।

सिर्फ गुजरात चुनाव में होंगे तीन अरब खर्च

गुजरात के साथ हिमाचल प्रदेश में भी चुनाव होने हैं। लेकिन, सिर्फ गुजरात की बात करें तो यहां चुनाव पर करीब तीन अरब रुपये खर्च होंगे। क्योंकि चुनाव प्रचार में हर एक उम्मीदवार को 28 लाख रुपये खर्च करने की इजाजत है। राज्य में 182 विधानसभा सीट है। हर सीट से चार उम्मीदवार भी जोड़ लें तो करीब दो अरब रुपये से अधिक कायदे से खर्च होंगे। मगर, अब तो एक मामूली उम्मीदवार भी कहने लगा है कि चुनाव लड़ने का मतलब है एक करोड़ रुपये खर्च। मतलब ये कि चुनाव में बाजी मारने के लिए उतरने वाले इससे कम खर्च नहीं करेंगे। इसलिए अब गुजरात चुनाव में राजनीतिक पार्टियों ने हवाला के जरिए कालेधन का इस्तेमाल करने का तरीका निकाल लिया है। चुनाव आयोग ने हर एक उम्मीदवार के लिए खर्च की सीमा 28 लाख रुपए तय कर रखी है, लेकिन पार्टियां आयोग के दिशानिर्देशों की धज्जियां उड़ाती दिख रही हैं।

 

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