‘चुंबन से शराब तक’, झारखंड की नशेड़ी सियासत

लोकतंत्र के मंदिर यानी विधानसभा परिसर में मयखाना खोलने की मांग के बाद चुंबन की राजनीति

रांची। आदिवासी स्वशासन, शुद्धता और संघर्ष का प्रतीक बिरसा मुंडा के उलगुलान का स्थल झारखंड में राजनीति का केंद्र शराब और चुंबन हो गया है। जी हां, झारखंड विधानसभा परिसर में शराबखाना खोलने की मांग के बाद चुंबन पर उलगुलान यानी बगावत होता दिख रहा है। शराब का सियासी प्याला धोेया भी नहीं गया था कि सूबे के पाकुड़ जिले के डुमरिया मेले में आयोजित चुंबन प्रतियोगिता पर अब सियासत उफान पर है। दो झामुमो विधायकों का पुतला फूंके जाने के बाद बयान बहादुरी नुमायां हो रही है।

इस मसले पर सत्तारूढ़ भाजपा और विरोधी दल झामुमो आमने सामने है। चुंबन प्रतियोगिता के मामले को विधानसभा के शीतकालीन सत्र में उठाने की तैयारी भाजपा कर रही है। क्योंकि, चुंबन प्रतियोगिता में झामुमो के दो विधायक स्टीफन मरांडी और साइमन मरांडी अतिथि के बतौर मौजूद थे। हालांकि झामुमो का कहना है कि भाजपा के पास जनहित के मुद्दों की कमी है। सो, ऐसे गैरजरूरी मामले उठाकर जनता का ध्यान मुख्य मुद्दों से भटकाने की कोशिश हो रही है। कुछ आदिवासी बुद्धिजीवियों ने भी भाजपा के इस विरोध को बेमतलब बताया है। जबकि आदिवासियों के सरना धर्म पर काम करने वाली केंद्रीय सरना समिति ने भाजपा को इस मामले में समर्थन दिया है।

मालूम हो कि पाकुड़ के लिट्टीपाड़ा प्रखंड के तालपहाड़ी गांव में नौ दिसंबर को सिदो-कान्हू मेले के दौरान ’दुलार-चो‘ नाम की प्रतियोगिता हुई थी। इसमें अधिक समय तक चुंबन लेने वाले तीन जोड़ों को पुरस्कृत किया गया था। प्रतियोगिता में झामुमो के दो विधायक स्टीफन मरांडी और साइमन मरांडी मौजूद थे। अतिथि के बतौर दोनों नेताओं ने विभिन्न प्रतियोगिताओं के विजेताओं को पुरस्कार दिया। उल्लेखनीय है कि मेले के लिए छपे आमंत्रण पत्र में ’दुलार-चो‘ प्रतियोगिता यानी प्यार का चुम्मा प्रतियोगिता का जिक्र था। मेला स्थल झामुमो विधायक साइमन मरांडी का पैतृक गांव है। श्री मरांडी के अनुसार ग्राम प्रधान और गांव वालों ने इसका आयोजन किया था, इसलिए वे इस मेले में गये थे। आमंत्रण पत्र में चुंबन प्रतियोगिता का जिक्र था इसलिए विरोध करना था तो प्रतियोगिता के आयोजन के पहले से ही विरोध करना चाहिए था।

दूसरी ओर भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष हेमलाल मुर्मू ने प्रतियोगिता के आयोजन के लिए झामुमो विधायक साइमन मरांडी और स्टीफन मरांडी को जिम्मेदार ठहराया है। कहा कि भाजपा इस मुद्दे को विधानसभा के शीतकालीन सत्र में उठायेगी। क्योंकि झामुमो विधायकों ने आदिवासी संस्कृति के खिलफ काम किया है। वे संथाल परगना को रोम बनाने पर तुले हैं। दोनों विधायकों का लोग विरोध कर रहे हैं, इसलिए उनके पुतले फूंके जा रहे हैं। इसमें भाजपा राजनीति नहीं कर रही है। जबकि केंद्रीय सरना समिति के कार्यकारी अध्यक्ष बबलू मुंडा ने कहा कि यह आदिवासी संस्कृति के विनाश की कोशिश है। इसके विरोध में समिति क्रिसमस की पूर्व संध्या पर रांची में विरोध जुलूस निकालेगी। आदिवासी धर्मगुरु बंधन तिग्गा ने भी ऐसी प्रतियोगिता को अनुचित बताया है। कहा कि आदिवासी समाज में सरहुल, करमा जैसे त्योहार मनाये जाते हैं। इसमें लड़के-लड़की एक साथ नाचते हैं। मगर, सार्वजनिक तौर पर चुंबन प्रदर्शन करने की इजाजत सरना समाज नहीं देता है। फिलहाल मामला गर्म होते देख पाकुड़ के उपायुक्त ने इस मामले की जांच के लिए एक टीम गठित कर दी है।

मालूम हो कि प्रतियोगिता में खुलेआम विवाहित जोड़ों ने घंटों तक एक दूसरे को चुंबन लिया और इसमें काफी देर तक चुम्मन लेने वाले विवाहित जोड़े को पुरस्कृत भी किया गया। इस चुंबन प्रतियोगिता में 18 जोड़ों ने हिस्सा लिया था। प्रतियोगिता में भाग लेने वाले प्रतियोगी सैंकड़ों लोगों की मौजूदगी में निसंकोच अपनी पत्नी को घंटों तक चूमते रहे।

चुंबन के इतिहास के बारे में जानें

चुंबन की शुरुआत कहां से हुई यह पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता। लेकिन टेक्सास के मशहूर मानवशास्त्री वॉन ब्रायंट ने चुंबन या किस पर लंबा शोध किया और पाया कि ऐसी किसी क्रिया के सबसे पहले लिखित प्रमाण 3,500 साल पुराने वेद, पुराणों और संस्कृत पाण्डुलिपियों में मिलते हैं। महाकाव्य महाभारत में होठों से होठों पर स्नेहमयी कोमल चुंबन का जिक्र मिलता है। भारत में इस पर शोध करने वाले लोगों का कहना है कि 326 ईसा पूर्व जब सिकंदर महान ने उत्तरी भारत के पंजाब प्रांत के कुछ हिस्सों पर कब्जा किया तब वहां से ही वह किसिंग को दुनिया के बाकी हिस्सों में ले गया।

अमेरिकी मानवशास्त्री वॉन ब्रायंट के अनुसार किस यानी चुंबन शब्द की उत्पत्ति भी प्राचीन भारत में ही हुई होगी। प्राचीन काल में किसिंग को बूसा या “बोसा” भी कहा गया। जिससे इसका प्राचीन लैटिन नाम बासियम बना। इसका आधुनिक जर्मन नाम कुस और अंग्रेजी नाम “किस” है। विश्व को कामसूत्र देने वाले देश में आज भी सार्वजनिक जगहों पर युगल जोड़ों का हाथ में हाथ डालकर चलते दिखना आम नहीं है। वर्ष 1980 में पद्मिनी कोल्हापुरे के ब्रिटेन के प्रिंस चार्ल्स को पश्चिमी अंदाज में अभिवादन करने के दौरान किस किया था, जिससे उनकी खूब आलोचना हुई। वर्ष 1993 में अभिनेत्री शबाना आजमी के नेल्सन मंडेला को किस करने पर भी ऐसी ही प्रतिक्रिया दिखी थी।

 

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