जिस खेत से दहकां को मयस्सर नहीं रोजी

‘उस खेत के हर खोशा-ए-गंदुम को जला दोः’ इकबाल ने की थी अपील

9 नवंबर 1877 को पैदा हुए शायर अल्लामा इकबाल वर्ष 1938 में दुनिया को अलविदा कह गये। लेकिन, हम उनकी पंक्तियों के साथ आज भी हैं। उनकी शायरी ऐसी रही है कि खामोशी को चीखने का सलीका बता दे। इस हफ्ते ‘खबरों के उस पार’ रचना सीरीज में हम जिंदा दिल और इंकलाबी शायर इकबाल के साथ हैं। आईये उनकी रचनाओं से गुजरते हैं।

उठो मेरी दुनिया के गरीबों को जगा दो
काख-ए-उमरा के दर ओ दीवार हिला दो
गर्माओ गुलामों का लहू सोज-ए-यकीं से
कुन्जिश्क-ए-फरोमाया को शाहीं से लड़ा दो
सुल्तानी-ए-जम्हूर का आता है जमाना
जो नक्श-ए-कुहन तुम को नजर आए मिटा दो
जिस खेत से दहकां को मयस्सर नहीं रोजी
उस खेत के हर खोशा-ए-गंदुम को जला दो
क्यूं खालिक ओ मखलूक में हाइल रहें पर्दे
पीरान-ए-कलीसा को कलीसा से उठा दो

उनकी अधिकांश रचनाएं फारसी में हैं। ‘सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा’ इकबाल का मशहूर गीत है। वे मानते थे कि इस्लाम धर्म रूहानी आजादी की जद्दोजहद के जज्बे का अलमबरदार है और सभी प्रकार के धार्मिक अनुभवों का निचोड़ है। उनकी लिखी पंक्ति में गजब की जिद भी है, जिसे पढ़कर उन्हें सलाम करने को जी चाहेगा।

खुदी को कर बुलंद इतना, कि हर तकदीर से पहले
खुदा बंदे से खुद पूछे, बता तेरी रजा क्या है

सितारों से आगे जहां और भी हैं अभी इश्क के इम्तिहां और भी हैं
भरी बज्म में राज की बात कह दी बड़ा बेअदब हूं, सजा चाहता हूं

तेरे आजाद बंदों की न ये दुनिया, न वो दुनिया
यहां मरने की पाबंदी, वहां जीने की पाबंदी
नशा पिला के गिराना तो सब को आता है
मजा तो तब है कि गिरतों को थाम ले साकी

वतन की फिक्र कर नादां, मुसीबत आने वाली है
तेरी बरबादियों के चर्चे हैं आसमानों में
ना संभलोगे तो मिट जाओगे ए हिंदोस्तां वालों
तुम्हारी दास्तां भी न होगी दास्तानों में

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