डोकलाम पर चीन भी पशोपेश में

सुभाष गोगुंल

भारत व भूटान की सीमा पर विवादित भू-खंड डोकलाम भारत और चीन के सैनिक 150 मीटर की दूरी पर एक-दूसरे के सामने खड़े हैं। साथ ही चीन की फौज युद्धाभ्यास कर रही है और चीन के सरकारी प्रवक्ता और मीडिया खुद धौंस जमा रहा है। हालांकि अब तक भारत के बार-बार रखे गए बातचीत के प्रस्ताव को चीन ने अनसुना किया है। चीन लगातार इस शर्त पर जोर दे रहा है कि बातचीत से पहले भारत अपनी फौज हटाये। चीन ने निश्चित रूप से यह उम्मीद नहीं की थी कि डोकलाम में भारत भूटान के पक्ष में खड़ा हो जाएगा। चीनी सेना को पिछली लड़ाई का अनुभव वियतनाम के साथ 1979 का है जिसमें दोनों ही देशों ने अपनी-अपनी जीत का दावा किया था और चीन ने अपनी फौज वापस बुला ली थी। चीन का आरोप था कि वियतनाम ने कंबोडिया पर कब्जा किया है। इसी सवाल पर चीन ने वियतनाम पर हमला किया था, लेकिन वियतनाम की फौज कंबोडिया में 1989 तक जमी रही। ऐसे में चीनी शासन वियतनाम के अनुभव को देखते हुए संभवतः पूरे मामले में सोच-विचार कर रहा है।
वर्ष 1962 में भी चीन ने युद्ध में भारत पर जीत का दावा किया था और बाद में चीन ने अपनी फौज वापस बुला ली थी। भारत की फौज ने अब तक की अपनी आखिरी जंग 1999 में लड़ी है जिसमें उसे निर्याणक जीत हासिल हुई है और आज भारत की फौज अमरीकियों को अधिक ऊंचाई वाले युद्ध क्षेत्र सियाचिन ग्लेशियर में युद्धाभ्यास करवाती है। इसलिए बहुत संभव है कि भारत और चीन दोनों ही देश सर्दियों से पहले गतिरोध समाप्त कर लेंगे। विदेश नीति पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सक्रियता और अमरीका और उसके सहयोगियों को लेकर भारत की बढ़ती नजदीकी भी चीनी नेताओं का विचारणीय प्रश्न है।
मालूम हो कि पिछले तीन सालों में भारत के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में भी इजाफा हुआ है और यह 25 अरब अमरीकी डॉलर तक पहुंच चुका है, जबकि चीन दो सालों से अपने पुराने आर्थिक ग्रोथ को बरकरार नहीं रख सका हैं। इतना ही नहीं चीन की कम्युनिस्ट पार्टी में नेतृत्व परिवर्तन को लेकर अभी से घमासान है। इस साल अक्टूबर या नवंबर में सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी का 19वां अधिवेशन संभावित है। अधिवेशन में राष्ट्रपति शी जिनपिंग अपने पांच साल के काम का लेखा-जोखा पेश करेंगे और पार्टी महासचिव के तौर पर दूसरे कार्यकाल के लिए अपनी दावेदारी पेश करेंगे। साथ ही अपनी 19वीं पोलित ब्यूरो की स्टैंडिंग कमेटी में उन नामों को शामिल किय जाना है जो 2023 के बाद पार्टी का नेतृत्व, चीन का मार्गदर्शन और शी जिनपिंग की विरासत को आगे बढ़ाएंगे। पिछले हफ्ते करिश्माई नेता सुन चंगसाए जो चुंगछिंग नगरपालिका के पार्टी सचिव थे, उन्हें अचानक बर्खास्त कर दिया गया। वे पोलित ब्यूरो के सदस्य और पूर्व प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ के करीबी भी थे। उन्हें 2023 के बाद का प्रधानमंत्री का दावेदार भी समझा जा रहा था। उनकी बर्खास्तगी पार्टी के अंदर उनके समर्थकों को हरकत में ला सकता है। जो हो चीन को पहले इस बात का यकीन नहीं था कि भारतीय फौज भूटान के लिए सामने आएगी या फिर कम से कम चीन की फौज के सामने इतनी देर तक खड़ी होने की हिम्मत करेगी।
बहरहाल, दक्षिण चीन सागर में अपने विस्तारवादी रुख के कारण चीन की फौज का मनोबल बढ़ा हुआ है। चीन की इस महत्वकांक्षा और मजबूरी के बीच अब भारत को कोई ऐसी तरकीब निकालनी होगी जो चीन को इस उलझन से बाहर निकाले और भारत को अपने सुरक्षा हितों से भी समझौता ना करना पड़े। चीन को निश्चित तौर पर अपने रुख में बदलाव लाने में अभी लंबा समय लगेगा। वो इस मुकाम पर अभी नहीं रुक सकते हैं। भारत तो केवल भूटान की संप्रभुता को बचाने के लिए उसकी सहमति के साथ चीन का सामना कर रहा है। क्योंकि इस साल 16 जून को चीन की सेना ने डोकलाम में सड़क बनाने की कोशिश की थी। इसे भूटान अपनी जमीन मानता है।

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