ताकत से कहीं ज्यादा कमजोरी है तीसरे मोर्चे में

लोकसभा चुनाव के मद्देनजर सपा और बसपा के गठबंधन के बाद तीसरे मोर्चे पर बातें होने लगी है। इस बार भी तीसरा मोर्चा को लेकर जोर-आजमाइश होगी। वैसे हर बार चुनाव से पहले तीसरे मोर्चे की हवा चलती है। लेकिन, गैर कांग्रेस और गैर भाजपा पार्टियां 1996 के लोकसभा चुनाव से लगातार करीब 50 फीसदी वोट पा रही हैं, मगर इनकी सीटें काफी कम रही हैं। तीसरे मोर्चे की पार्टियों की तीसरी बड़ी कमजोरी है कि राष्ट्रीय परिदृश्य पर भाजपा और कांग्रेस की हैसियत में कमी नहीं हो रही।

उल्लेखनीय है कि भाजपा ने वर्ष 2014 के चुनाव में कई रिकॉर्ड बनाये। जबकि कांग्रेस महज 44 सीट ही जीत पायी। हालांकि कांग्रेस 224 सीटों पर दूसरे नंबर पर थी। कांग्रेस को मिला वोट उसके ठीक नीचे की 5 बड़ी पार्टियों (सपा, बसपा, सीपीएम, टीएमसी और एआइएडीएमके) के कुल वोट से ज्यादा था। ऐसे में कांग्रेस का प्रदर्शन काफी खराब होने के बाद भी उसके वापसी की संभावना जारी रही। अब 2019 लोकसभा चुनाव भी नजदीक है और एक बार फिर मायावती, अखिलेश यादव, केसीआर, ममता बनर्जी जैसे नेताओं के नाम पर थर्ड फ्रंट की चर्चा है।

वर्ष 1996 में थर्ड फ्रंट अपने स्वर्ण युग में था। तब भी थर्डफ्रंट पिछलग्गू ही था। अब मजबूत जमीन के बिना ही वर्ष 2019 के अखाड़े में कैसे उतरेंगे, बड़ा सवाल बना हुआ है। वर्ष 1996 के उस दौर को जानना जरूरी है जब देश में जनता दल, टीडीपी, डीएमके जैसी पार्टियों वाले यूनाइटेड फ्रंट की तूती बोलती थी। तब लोकसभा में सबसे ज्यादा 161 सीटें जीतने वाली भाजपा की सरकार 13 दिन चली थी। कांग्रेस ने 140 सीट पाकर दूसरी सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद सरकार बनाने की कोशिश भी नहीं की। गुजराल का पीएम बनना भी किसी हैरानी से कम नहीं था। इस तीसरे मोर्चे को कांग्रेस का समर्थन था और कांग्रेस के कारण ही देवगौड़ा पीएम की कुर्सी पर ज्यादा दिन तक नहीं रह सके।

वर्ष 1997 में यूनाइटेड फ्रंट ने इंद्र कुमार गुजराल को प्रधानमंत्री बनाया। गुजराल भी कांग्रेस की मदद पीएम बने। उनका पीएम बनना भी किसी हैरानी से कम नहीं था। बाद में तो तीसरा मोर्चा एक नशा-सा बन गया। अब फिर से लोकसभा चुनाव होने वाले हैं तो ऐसे ही किसी तीसरे मोर्चे को जिंदा करने की बात हो रही है। इस बार तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव अगुवाई कर रहे हैं और उन्हें पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से समर्थन मिला है। अब इस रेस में उत्तर प्रदेश के दोनों पूर्व मुख्यमंत्री मायावती और अखिलेश यादव का दाखिल होना भी चर्चे में है।

हालांकि तीसरे मोर्चे की सबसे बड़ी कमजोरी ये है कि इसमें शामिल कई दलों की हालत एक से अधिक राज्यों में बेहतर नहीं है। ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल तक में सीमित हैं। अखिलेश और मायावती उत्तर प्रदेश में एक दूसरे से ही लड़ते आये हैं, हालांकि इस बार साथ आये हैं। केसीआर तेलंगाना से बाहर नहीं हैं। वामपंथी पार्टियों की हालत दो दशक पहले बहुत अच्छी थी। वाम दलों का अस्तित्व एक से ज्यादा राज्यों में हुआ करता था, लेकिन अब स्थितियां वाम दलों के लिए चुनौतीपूर्ण हैं।

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