तुम कत्ल करो हो कि करामात करो हो

उर्दू शायरी में हम जिन्हें भुला नहीं सकते, वह नाम है- कलीम आजिज। वे आज न तो हमारे बीच हैं और न शायरी के साथ। लेकिन, उनकी शायरी उनके लिए जीवन के बाद की गतिविधि ही साबित हुई है। आपातकाल के वक्त इंदिरा गांधी के लिए कलीम साहब ने कहा था- ‘रखना है कहीं पांव तो रखो हो कहीं पांव/चलना जरा आया तो इतराए चलो हो/दामन पे कोई छींट न खंजर पे कोई दाग/तुम कत्ल करो हो कि करामात करो हो।’

जो हो, कलीम साहब ने मीर की रवायत को बनाए रखा। आज वे हमारे बीच नहीं हैं, मगर उनकी पंक्तियों से हम उन्हें समझ सकते हैं। ‘खबरों के उस पार’ रचना सीरीज की शुरूआत हम उन्हीं की बेमिसाल रचना से कर रहे हैं।

इस नाज से, अंदाज से तुम हाये चलो हो
रोज एक गजल हमसे कहलवाये चलो हो
रखना है कहीं पांव तो रक्खो हो कहीं पांव
चलना जरा आ जाये तो इतराये चलो हो
दीवान-ए-गुल कैदी-ए-जंजीर है और तुम
क्या ठाठ से गुलशन की हवा खाये चलो हो
मय में कोई खामी है न सागर में कोई खोट
पीना नहीं आये है तो छलकाये चलो हो

हम कुछ नहीं कहते हैं, कोई कुछ नहीं कहता
तुम क्या हो तुम्हीं सबसे कहलवाये चलो हो
जुल्फों की तो फितरत है लेकिन मेरे प्यारे
जुल्फों से भी ज्यादा बलखाये चलो हो
वो शोख सितमगर तो सितम ढाये चले हो
तुम हो के कलीम अपनी गजल गाये चलो हो

दिन एक सितम, एक सितम रात करो हो
वो दोस्त हो, दुश्मन को भी जो मात करो हो
मेरे ही लहू पर गुजर औकात करो हो
मुझसे ही अमीरों की तरह बात करो हो
हम खाकनशीं तुम सुखन आरा ए सरे बाम
पास आके मिलो दूर से क्या बात करो हो
हमको जो मिला है वो तुम्हीं से तो मिला है
हम और भुला दें तुम्हें क्या बात करो हो

दामन पे कोई छींट न खंजर पे कोई दाग
तुम कत्ल करो हो कि करामात करो हो
यूं तो कभी मुँह फेर के देखो भी नहीं हो
जब वक्त पड़े है तो मुदारात करो हो
बकने भी दो आजिज को जो बोले है बके है
दीवाना है, दीवाने से क्या बात करो हो

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