तो, दे दो चोरी कर भूख मिटाने की इजाजत

वरना, मी लाॅर्ड! मेरे हिस्से का खाना लूटने वालों से वसूलों मेरी मौत का हर्जाना

अमित राजा

संतोषी और बैजनाथ की भूख मिट नहीं सकी। दोनों की देह पर कई दिनों तक भूख ऐसे हावी होती गई कि आत्मा को ही बिस्थापित होना पड़ा। दो अकाल मृत्यु। अब इंसाफ के लिए भटकती दोनों बिस्थापित आत्माएं पूछ रही हैं- ‘क्या जब प्रजातांत्रिक व्यवस्था में कोई भूखा सो रहा हो, तब कैसे मान लिया जाये कि लोकतंत्र जाग रहा है? ऐसे में क्या भूख से मौत लोकतंत्र के वजूद पर ही सवाल नहीं उठाती?’

दोनों भटकती बेचैन आत्माएं सिर्फ सत्ता पक्ष से ही नाराज नहीं है। विपक्ष को भी सवालों के घेरे में ला रही है। कह रही है कि लोकतंत्र का एक खंभा विधायिका सिर्फ सत्ता के नशे में चूर शासकदल पर टिकेगा तो भरभराकर गिर जाएगा। इसे विपक्ष का भी सहारा चाहिए। मगर, अंग्रेजों की सरकार से लेकर आजाद भारत की सरकार तक में कभी भी सत्ताधारियों ने भूख से हुई मौत को कबूल नहीं किया है। जबकि विपक्ष भी भूख से मौत को साबित करने में नाकाम रहा है। क्या सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच भूख को कातिल ठहराये जाने के खिलाफ कोई गोपनीय संधि है?

दोनों आत्माएं लोकतंत्र के दूसरे खंभे कार्यपालिका को भी कठघरे में ला रही है। भूख से मरी 10 साल की बच्ची संतोषी का सवाल बाल कल्याण विभाग और 40 वर्षीय बैजनाथ का सवाल समाज कल्याण महकमे से है। दोनों बेचैन आत्माएं दोनों विभागों से उन हरामजादोें की खोज करने को कह रही है, जिसका जिक्र बांग्लादेशी कवि रफीक आजाद की कविता ’भात दे हरामजादे‘ में किया गया है।

मीडिया पर तो दोनों आत्माओं की खास नाराजगी है। वह दुत्कारते हुए मीडिया से पूछ रही है कि भूख से मौत को कबतक बेचोगे? मौत से पहले क्या भूख तुम्हारे लिए खबर नहीं बनेगी? अगर भूख खबर बन गयी होती तो आत्माएं संतोषी और बैजनाथ की देह में वास करती। उसे बिस्थापित नहीं होना पड़ता।

इंडोनेशिया के जज मरजुकी के एक फैसले से से दोनों आत्माएं प्रभावित हैं और भारत में भी न्यायपालिका को उम्मीदों से देख रही है। दरअसल, मरजुकी वर्ष 2011 में एक बूढ़ी औरत के चोरी के मामले की सुनवाई कर रहे थे। बूढ़ी औरत ने अपना गुनाह कबूल कर लिया था कि उसने एक बगीचे से कुछ फल चुराई थी। उसने गिड़गड़ाते हुए जज से प्रार्थना की थी कि ’मैं बहुत गरीब हूं, मेरा बेटा बीमार है। मेरा पोता बहुत भूखा था। इसलिए मजबूरन चोरी कर बैठी।‘ बहस के दौरान बाग का मैनेजर बोला, ‘जज साहब, इसे कड़ी सजा दें, ताकि दूसरों को नसीहत मिले।’ जज ने सारे पेपर जांचने के बाद बूढ़ी औरत को कहा- ’मुझे बहुत दुःख है, पर मैं कानून से नहीं हट सकता। इसलिए, तुम्हें कानून के तहद सजा जरूर मिलेगी। कानून में तुम्हारे इस अपराध की सजा है एक सौ डॉलर और ये जुर्माना ना देने पर ढाई साल की जेल।’
बूढ़ी औरत रोने लगी। क्योंकि, वो जुर्माना नहीं भर सकती थी। फिर, जज साहब ने अपने सर से टोप उतारा और उसमें 11 डॉलर डाल कर बोले-’सच्चे न्याय के लिए, जो लोग इस अदालत में हाजिर हैं वो हर एक, साढ़े पांच डॉलर जुर्माने के तौर पर दें। शहर के नागरिक के रूप में सबका जुर्म है कि क्यों एक मासूम बच्चा भूखा रहा और इस बूढ़ी गरीब औरत को चोरी तक करने पर मजबूर होना पड़ा। कोर्ट के रजिस्ट्रार को हिदायत है कि वो सब उपस्थित लोगों से ये जुर्माना ले लें।‘ बाग के मैनेजर से मिला कर सबसे 350 डॉलर की रकम इकठ्ठी हुई। जिससे जुर्माने की रकम काटने के बाद बचे 250 डॉलर उस बूढ़ी औरत को दे दिए गए।

अब ऐसी न्यायपालिका देख दोनों आत्माएं पूूरे लोकतंत्र से ही कुछ उम्मीदें लगा बैठी हैं। उसे इंसाफ का भरोसा है। लेकिन, लगातार कई दिनों से संतोषी और बैजनाथ की देह से बिस्थापित दोनों आत्माएं लोकतंत्र से गुस्से में कुछ कह रही हैं। उससे लोकवादी होने की अपील की जा रही है। साथ ही कह रही है कि अगर भूखों का पेट तुम्हारी व्यवस्था नहीं भर सकती तो चोरी करके खाने की ही इजाजत दे दो। वरना, मेरे हिस्से का खाना लूटने वाले एक-एक आदमी से मेरी मौत का हर्जाना वसूलो। हां, इस काम के लिए सरकारी बाबुओं को कह दो कि कोई कोताही नहीं चलेगी।

You May Also Like

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *