धन का जीवन से अंतर्संबंध

अमित राजा

भारतीय त्योहारों में जीवन की कला छिपी है। कई संदेश हैं। और, दर्शन भी। मगर, हम ‘मैं और मेरा’ के पीछे भाग रहे हैं। जबकि हमारा अस्तित्व ‘मैं और मेरा’ से जुदा चीजों के आसरे है। दिवाली से भी हमें यही संदेश मिलता है। लेकिन, हम कुछ ऐसे भागे जा रहे हैं- जैसे अमृत की तलाश में हों। जबकि हमको मालूम है कि दुनिया नश्वर यानी नाशवान है। कुछ मिलाकर हम इंद्र के चरित्र को जी रहे हैं। वही इंद्र जो स्वर्ग के सिंघासन पर डरे और सहमे हुए हैं। कोई तप करता है तो इंद्र को नींद नहीं आती। इंद्र लक्ष्मी के पीछे भाग रहे हैं। धन-दौलत और बढ़ाने में लगे हैं। दूसरी ओर लक्ष्मी विष्णु के पीछे भाग रहीं हैं। क्योंकि बैकुंठवासी विष्णु में लक्ष्मी यानी धन को आकर्षित करने का गुण है।
पौराणिक कथाओं के आईने में आज के भारतीय समाज को देखने वाले मशहूर लेखक डॉ देवदत्त पटनायक को पढ़ें तो ये बात सामने आती है कि भारत में शुरु से धन और समृद्धि की पूजा होती रही है। कुबेर, लक्ष्मी सब यहीं पूजे जाते हैं। भारत तो कभी सोने की चिड़िया था। यहां दूध की नदी बहती थी। 10वीं सदी के पहले तक यहां के कारोबारी शिल्पकला, गृह सज्जा के सामान, मसालों, मेवों और दूध की सामग्री दूर-दूर के देशों में निर्यात करते थे। मगर, विष्णु की बजाये इंद्र का चरित्र अपनाने की वजह से स्थितियां बदलती गयीं। धन को आकर्षित करने की बजाये धन के पीछे भागने के कारण भारत के ग्रोथ से भारतीयों का ग्रोथ नहीं हो सका। हमने धन का पीछा करने के कारण देवी-देवताओं की पूजा भी उनके मूल रूप में नहीं की। धन की देवी लक्ष्मी हैं। हम सिर्फ लक्ष्मी की पूजा में ही रत हो गये। मगर, अपने यहां अकेली लक्ष्मी की पूजा कभी नहीं हुई। क्योंकि मान्यता है कि लक्ष्मी अकेली घर पर आयी तो उनकी बहन अलक्ष्मी भी पधारेंगी। अलक्ष्मी कलह लायेंगी। सो, लक्ष्मी की पूजा गणेष या विष्णु के साथ ही की जाती है। किसी मंदिर में भी लक्ष्मी अकेली आपको नहीं दिखेंगी। पर, अकेली लक्ष्मी की पूजा के कारण हममें ‘मैं और मेरा’ की भावना ने घर बनाया। आज के राजनेता भी यही कर रहे हैं। पौराणिक कथाओं में प्रतापी राजा वही होते थे, जो गौ दान बड़े पैमाने पर करते थे। तब गौ का मतलब रोजगार होता था। पहले के राजा भूदान करते थे। भूमि का मतलब था रोजगार। लेकिन, आज के नेता ‘मैं और मेरा’ को बड़ा बना रहे हैं। उन्होंने भू और गौदान करना छोड़ गायों और जमीन को अपने यहां जमा कर ‘मैं और मेरा’ को ही बड़ा करना जारी रखा है।

सरस्वती बना दी गयीं ‘विद्या लक्ष्मी’
अकेली लक्ष्मी की पूजा के खतरों ने देवी-देवताओं के स्वरूप को भी बिगाड़ दिया है। आज सरस्वती की पूजा कोई नहीं कर रहा। मोहल्लों में होने वाली सरस्वती पूजा के आयोजन में गैर छात्रों को देखा जा सकता है। जबकि छात्र सरस्वती की पूजा की बजाये विद्या लक्ष्मी की पूजा कर रहे हैं। सरस्वती की पूजा मानसिक ग्रोथ लाती है। मगर, इसकी जरुरत लोगों को नहीं है। यही वजह है कि कुछ एनबीएफसी कंपनियों ने एजुकेनल लोन का नाम ‘विद्या लक्ष्मी ऋण योजना’ रखा है। अभिभावक इस लोन के जरिये बच्चों को बेहतर शिक्षा लक्ष्मी यानी धन के लिए दिला रहे हैं। जबकि नारायण यानी विष्णु या कृष्ण ने महाभारत काल में ही कौरबों को बड़ा संदेश दे दिया था। जब कौरब और पांडवों में युद्ध संभावी हो गया तो कौरब दल सहयोग के लिए कृष्ण के पास पहुंचा। कृष्ण ने पूछा-एक तरफ मैं नारायण हूं और दूसरी तरफ मेरी नारायणी सेना-आपको मदद में क्या चाहिए। कौरबों ने नारायणी सेना मांग ली। जब मदद को पांडव पहुंचे तो उनसे भी कृष्ण ने यहीं सवाल किया। पाडंवों ने कहा कि उन्हें नारायण चाहिए। मगर, हुआ ये कि नारायणी सेना कौरबों के पास नहीं पहुंची, क्योंकि जाहिर है जिधर नारायण होंगे, नारायणी सेना भी वहीं जायेगी।
यज्ञ का मतलब है कारोबार
आधुनिक समय में पुराण की प्रासंगिकता विषय पर 400 से अधिक लेख और 40 किताबें लिखने वाले डॉ देवदत्त पटनायक की मानें तो यज्ञ हमेशा आर्थिक कारणों से हुआ है। पशुपालन, खेती या दूसरे आमदनी वाले स्रोतों को वे यज्ञ बताते हैं। उनके मुताबिक यज्ञ कारोबार है तो यजमान निवेशक और स्वाहा इंवेस्टमेंट है। जबकि तथास्तु कारोबार से मिलने वाली आमदनी है। लेकिन, आज के यज्ञ का स्वरूप बदल गया है और आज का यज्ञ कहीं न कहीं ‘नन प्रोड्क्टिव एक्टिविटी’ है।

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