नाम में क्या रक्खा है, ‘पप्पू’ हो या ‘डायन’

किसी नाम पर चुनाव आयोग के ऐतराज पर एक विवेचना

योगेश किसलय

कांग्रेस नेता राहुल गांधी के लिए प्रतीत होने वाले नाम पप्पू पर चुनाव आयोग के ऐतराज पर लोगों का नजरिया अलग-अलग है। लेकिन वरिष्ठ पत्रकार योगेश किसलय इसे अलग नजर से देखते हैं। सैक्सपीय की बात  ‘नाम में क्या रक्खा है ’- को वे आगे लाकर अपनी बात करते हैं। पढ़ें उनकी यह विवेचना….

चुनाव आयोग का निर्देश समझ के परे है। आयोग ने पप्पू शब्द का इस्तेमाल करने से मनाही कर दी है। कई साल पहले ‘पीपली लाइव’ फिल्म का एक गाना- ‘महंगाई डायन खाए जात है’ बहुत लोकप्रिय हुए था। लेकिन, कुछ महिला संगठनों ने इस गाने पर रोक लगाने की मांग की थी। उनका तर्क था कि इस गाने से महिलाओं के प्रति गलत संदेश जाता है और डायन शब्द का इस्तेमाल गैरजरूरी है। मैंने उस समय भी इसका विरोध किया था कि शब्द का कोई दोष नहीं होता है। यह शब्द किसी संदर्भ की व्याख्या करता है।

आज चमार शब्द का इस्तेमाल करने से लोग डरते हैं कि यह शब्द असंवैधानिक है। प्रसंगवश बताता हूं कि ऋषि अष्टावक्र एक बार राजा जनक की विद्वत्सभा में पहुंचे तो अष्टावक्र की चाल देखकर सभी विद्वान हंसने लगे। अष्टावक्र का शरीर आठ जगहों से टेढ़ा था इसलिए उनकी चाल भी अजीब रही होगी। इसे देखकर सभी विद्वानों को हंसी आ गई। उनकी हंसी देखकर अष्टावक्र भी हंसने लगे। उनकी हंसी ने विद्वानों सहित राजा जनक को अचरज में डाल दिया। जनक ने अष्टावक्र से हंसने का वजह पूछा तो अष्टावक्र ने कहा- मैं तो यहां यह सोचकर आया था कि यह विद्वानों की सभा है। लेकिन, यहां तो सभी चमार बैठे हैं। उनकी समझ मेरे विचारों से अधिक मेरी काया पर है। वे मेरा चमड़ा देख रहे हैं ना कि मेरे विचार। यह सुनकर राजा जनक अष्टावक्र के पैरों में गिर गए।

अष्टावक्र ने चमार शब्द का प्रयोग ऐसे किया कि सारी कहानी साफ हो गई। लेकिन, इसी शब्द का प्रयोग संसद में स्वर्गीय सांसद कल्पनाथ राय ने किया तो उन्हें संसद में माफी मांगनी पड़ी। क्योंकि, संसद के हिसाब से चमार शब्द असंवैधानिक था। आज कोई अष्टावक्र सभा में चमार शब्द बोले तो उसे जेल हो जाए, लेकिन इसमें इस शब्द का कोई दोष नहीं। पप्पू शब्द केवल व्यंग्य या मजाक का विशेषण नहीं, बल्कि काफी सफर तय करके स्थापित एक संज्ञा है। इसका इस्तेमाल करने से रोक नहीं लगाया जा सकता। फिर तो फेंकू और भक्त जैसे शब्दों का भी इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। शब्दों के साथ क्यों राजनीति की जा रही है? कुछ ऐसे भी शब्द हैं, जिसका प्रयोग सार्वजनिक रूप से नहीं किया जाता, लेकिन व्यक्तिगत जिंदगी में उसका उपयोग होता है और होना भी चाहिए।

अब जैसे साला शब्द का प्रयोग गाली, रिश्तेदारी और संबोधन के लिए किया जाता है। कई बार तो इस शब्द का उपयोग किए बिना वाक्य का सही भाव भी साफ नहीं होता है। कई फिल्मों के नाम भी इस शब्द से हुए हैं। क्या इस शब्द को प्रतिबंधित किया जाना चाहिए? चुनाव आयोग को भाषा की समझ नहीं है तो भाषाविद इस शब्द से महरूम क्यों हो? पप्पू शब्द ना तो असंवैधानिक है और न ही सार्वजनिक प्रयोग में निषेधात्मक। किसी शब्द को लेकर चुनाव आयोग इतना संवेदनशील क्यों है यह समझ से परे है। अगर राहुल गांधी इसका निशाना बने हैं तो राहुल दोषी हैं न कि पप्पू शब्द।

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