नेताओं से कुर्बानी चाहने वाले इसकी कद्र क्यों नहीं करते?

राजनीति के दिग्गज रहे वाजपेयी, जाॅर्ज, जशवंत, एके राय, प्रियरंजन हैं बीमार और अकेला

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, पूर्व मंत्री जाॅर्ज फर्नांडिस, जशवंत सिंह, प्रिय रंजन दास मुंशी और मार्क्सवादी चिंतक एके राय अपने समय में राजनीति के स्तंभ रहे हैं। लेकिन, ये सभी नेता आज बीमार हैं और घनघोर अकेलापन झेल रहे हैं। राजनीति में शुचिता और इमानदारी चाहने वाले ये उम्मीद करते हैं कि राजनीति में सक्रिय मौजूदा नेता इन्हें अपना आदर्श मानें। मगर, इन पांच नेताओं की हालत देखकर ऐसी संभावनाएं कम हो रही हैं। ऐसे में सवाल ये भी उठता है कि जनता नेताओं से कुर्बानी तो चाहते हैं, मगर क्या नेताओं की इन कुर्बानियों का कद्र भी कहीं बाकी रह गया है।

बहरहाल, आज इन पांच नेताओं के रोजमर्रा के जीवन को देखने की जरूरत है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव में हार के बाद से ही सियासत से सन्यास की ओर बढ़े और धीरे-धीरे सन्यास ही ले लिया। कभी नेताओं और समर्थकों से आबाद रहने वाला उनका आवास आज वीरान रहता है। जबकि उनकी आंखें हर आहट पर अपनों को खोजती है। अभी श्री वाजपेयी चार डॉक्टरों की देखरेख में अपने घर पर ही रहने को मजबूर हैं। सुबह उन्हें एक्सरसाइज करवाया जाता हैं। फिर, डॉक्टरों की सलाह पर उन्हें नाश्ते में दूध, दलिया, ब्रेड और जूस दिया जाता है। अब उनकी हालत तो ऐसी है कि उनके कदम जमीन पर कभी-कभार ही पड़ते हैं। किसी सहारे के बगैर वे खड़े तक नहीं हो सकते। बातें इशारों में करते हैं।

उधर, जॉर्ज फर्नांडिस की हालत भी ऐसी ही या कहें तो वाजपेयी से भी खराब है। अल्जाइमर नामक बीमारी झेलने के बाद भी कभी यादशास्त लौटती है तो जाॅर्ज अपनों के बीच होना चाहते हैं। आंदोलन के दिनों से लेकर सत्ता में भागीदारी मिलने के बाद जिन हजारों लोगों को जाॅर्ज नाम से जानते थे, उन हजारों लोगों ने शायद जाॅर्ज को भुला दिया है। मगर याददाश्त जाते ही जॉर्ज शून्य में चले जाते हैं। अल्जाइमर छठे पड़ाव पर है। इसका सातवां पड़ाव जानलेवा होता है। डॉक्टरों के अनुसार अल्जाइमर पीड़ित को परिचितों के बीच रखना चाहिए। जिन्हें वह देखता रहा हो। लेकिन, जाॅर्ज के तन्हा जीवन का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि नितिन गडकरी अंतिम बड़े नेता थे, जिन्होंनेे जॉर्ज से भाजपा अध्यक्ष बनने के बाद मुलाकात की थी। तब जाॅर्ज इतने बीमार नहीं थे और अपने लाॅन में टहलते हुए उन्होंने गडकरी से मराठी में बात की थी। अभी हाल में धर्म गुरु दलाई लामा मिलने गये। मगर इस लंबे अंतराल में उन्हें अकेले ही रहना पड़ रहा है। अभी जॉर्ज लैला कबीर के दिल्ली स्थित आवास पर डाॅक्टरों के बीच ही हैं।

पूर्व मंत्री जसवंत सिंह कोमा में हैं। सात अगस्त 2014 से दिल्ली में सेना के रिसर्च एंड रेफरल अस्पताल में वे हैं। घर पर गिरने के बाद जसवंत सिंह को सिर में गंभीर चोट लगी थी। डाक्टरों की कोशिश के बाद भी कोई सुधार नहीं हुआ। उनके मस्तिष्क में जमा रक्त का थक्का उन्हें कोमा में ले गया। मालूम हो कि वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान ही बीजेपी ने उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया था। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में वित्त, रक्षा और विदेश तीन तीन अहम मंत्रालय के मंत्री रह चुके जसवंत सिंह दार्जिलिंग से सांसद थे। दार्जिलिंग छोड़कर वह राजस्थान के बाड़मेर से चुनाव लड़ना चाहते थे। मगर, बीजेपी ने उन्हें टिकट नहीं दिया तो बाड़मेर से निर्दलीय ही चुनाव लड़े और हार गए। फिलहाल, जशवंत धीमी मौत जी रहे हैं।

ताम-झाम और सुख-सुविधा वाली राजनीति में कुर्बानियों के लिए जाने जाने वाले सियासी संत एके राय भी बीमार हैं। तीन बार सांसद और तीन बार विधायक रह चुके एके राय त्याग का दूसरा नाम हैं। ठंड हो गर्मी चटाई पर ही सोते रहे। अपने आवास या दफ्तर पर सिलिंग फेन तक नहीं लगाया। भात और आलू का चोखा खाते रहे, लेकिन कभी सांसद-विधायक को मिलने वाला पेंशन नहीं लिया। शादी नहीं की। मगर, जिन लोगों ने उनकी कुर्बानियों पर वाह-वाह किया वे आज उन्हें भूल चुके हैं। आज धनबाद के डिगवाडीह में नुनुडीह मोहल्ले में वे अपनी पार्टी मार्क्सवादी समन्वय समिति के कैडर एस गोराई के साथ रह रहे हैं। गोराई के साथ कुछ और लोग हैं जो मानसिक, शारीरिक और आर्थिक सहयोग कर 84 वर्षीय कामरेड राय को स्वस्थ बनाने की लगातार कोशिश कर रहे हैं। लेकिन, इन दिनों उस झामुमो के कोई बड़े नेता उनकी खैरियत पूछने भी नहीं गये, जिस झामुमो की स्थापना एके राय ने की थी। अभी हाल में वरिष्ठ पत्रकार प्राणजाॅय गुहा ठाकुरता कामरेड राय से मिलने गये और उनके इलाज में सहयोग के लिए गोराई को कुछ आर्थिक सहयोग दिया।

इसी तरह प्रियरंजन दास मुंशी वर्ष 2008 से लगातार बीमार हैं। दिल्ली के अपोलो अस्पताल में हैं। यूपीए सरकार में वे सूचना प्रसारण मंत्री थे और वर्ष 2008 में उन्हें दिल का दौरा पड़ा। उनकी दिमाग की कुछ नसें काम करना बंद कर चुकी थीं। वे कोमा में हैं। अस्पताल प्रबंधन ने दासमुंशी परिवार को यह विकल्प दिया था कि अगर वे चाहें तो उन्हें घर ले जा सकते हैं और प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों के जरिए वहां उनकी देखरेख की जा सकती है। लेकिन दासमुंशी परिवार ने उन्हें अस्पताल में ही रखने का फैसला किया। अपोलो अस्पताल महंगा है। केंद्र में कांग्रेस के बाद भाजपा की सरकार आयी तो संदेह था कि दासमुंशी के इलाज के लिए सरकारी पैसा रोका जा सकता है। लेकिन, तब के केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने साफ कर दिया था कि सरकार का ऐसा कोई इरादा नहीं है और दासमुंशी की चिकित्सा सरकारी पैसे से जारी रहेगी। हर्षवर्धन ने कहा था कि दासमुंशी ने समाज के लिए काफी काम किया है और अब यह समाज की बारी है कि वह उनके लिए कुछ करे।

 

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One thought on “नेताओं से कुर्बानी चाहने वाले इसकी कद्र क्यों नहीं करते?

  1. अमित बाबु आप कैसे कहते हैं कि इन नेताओं की कद्र नहीं हो रही.इनकी देखभाल और सेवा तो इतने अच्छे ढंग से हो हो रही है जो शायद हम लोगों को पारिवारिक जीवनमें नसीब नहीं होगा.अब तेल लगाते नहलाते फोटो तो share नहीं न किया जा सकता है.

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