पद्मावती कल्पना, साहित्यिक रचना या है ऐतिहासिक किरदार?

राजा रतनसेन और पद्मावती के प्रेम का आख्यान भर है जायसी की रचना पद्मावत

पद्मावती के किरदार के होने और न होने पर इन दिनों संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावती के कारण खूब बहस है। कुछ लोग इसे राजपूत मर्यादा से जोड़ रहे हैं तो कुछ पद्मावती के किरदार को काल्पनिक बताते हैं। फिल्म का विरोध हो रहा है। धमकियां दी जा रही हैं। जबकि कुछ इतिहासकार पद्मावती को केवल एक साहित्यिक किरदार मानते हैं। जबकि कुछ इतिहासकारों का मानना है कि साहित्य इतिहास से बिल्कुल अलग नहीं होता। हालांकि बुधवार को फिल्म निर्माता संजय लीला भंसाली ने फिल्म पर सफाई दी है और कहा है कि इसमें मर्यादाओं का पूरा ख्याल रखा गया है।

इस मसले पर दिल्ली विवि के प्रोफेसर रजीउद्दीन अकील कहते हैं कि वर्ष 1540 में जब शेरशाह का जमाना था, तभी मलिक मुहम्मद जायसी ने पद्मावत की रचना की थी। उधर शेरशाह उत्तर भारत में अफगानों का एक बड़ा साम्राज्य स्थापित कर रहे थे। बाबर के बाद हुमायूं को खदेड़ते हुए वे ईरान की सीमा तक पहुंचा दिये। साथ ही अपने साम्राज्य को स्थापित किया। प्रो अकील बताते हैं कि जायसी चिश्ती सूफी थे। हिन्दुस्तान के लोगों को चिश्तियों ने जोड़ा था। उन्होंने ऐसी जुबान में बोलना और लिखना शुरू किया, जिसे आम लोग समझ सकें। जायसी ने ठेठ अवधि भाषा में पद्मावत लिखी थी। अवधि भाषा उस जमाने के हिन्दू और मुसलमान समझते थे।

पद्मावत में राजा रतनसेन और पद्मावती के प्रेम प्रसंग को जायसी ने सूफियाना तरीके से लिखा था। अकील बताते हैं कि खुदा के लिए सब कुछ न्योछावर कर देना सूफियों का सलीका है। पद्मावत में प्रेम कहानी इसी अंदाज में चलती है। अलाउद्दीन खिलजी ने 1303 ई में चित्तौड़ को जीता और जायसी ने पद्मावत में खिलजी को खलनायक की तरह दिखाया। जायसी ने इसमें अलाउद्दीन खिलजी के साम्राज्य को दुनिया के रूप में दिखाया। वहीं रतनसेन और पद्मावती का प्रेम सूफीवाद की आत्मा है और खुदा के लिए समर्पित है। दोनों एक दूसरे में मिलकर खत्म होते हैं।

प्रो अकील के अनुसार पद्मावत सूफिवाद के लिए प्रेमाख्यान है। इन प्रेमाख्यानों में एक चंदायन है, जिसे मुल्ला दाऊद ने लिखा था। फिर मधुमालती और मृगावती जैसे आख्यान भी लिखे गये। इन सभी में पद्मावत की हैसियत अधिक है। माना जाता है कि कहानी का जिक्र वाचिक परंपरा में रहा होगा। भारतीय परंपराओं में जो कहानियां वजूद में थीं उन्हें सूफियों ने अपने तरीके और अपनी जरूरत के हिसाब से लिखा। माना यह भी जाता है कि पद्मावती किसी एक मुकम्मल ऐतिहासिक किरदार के बतौर नहीं है। कहीं ऐसा जिक्र नहीं मिलता है कि अलाउद्दीन ने चितौड़ पर आक्रमण किया और पद्मावती बचने की कोशिश कर रही थी। पद्मावती की कहानी जायसी शुरू करते हैं, लेकिन का प्रवाह आगे भी जारी रहा है।

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