पुरस्कार पर शोर-शराबा फूहड़ता की हद

उमा

पुरस्कार पर नाराजगी है तो निर्णय पर अपनी नाराजगी नेताओं की तरह नहीं व्यक्त करें। पिछले दिनों भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार को लेकर फेसबुक की गलियों में जो चीख-चिल्लाहट मची वह फूहड़ता की सारी हदें पार कर गयीं। रचनाशीलता ने यदि भाषा की मर्यादा भी नहीं रखी तो हम से बेहतर वो जिनके पास भाषा तो नहीं पर, तमीज तो है। यदि पुरस्कार के निर्णय पर नाराजगी है तो आप निर्णायक के काव्य विवेक, सरोकार, जीवन दृष्टि पर सवाल खड़े कर सकते हैं। चयनित कविता या अब तक की पुरस्कृत कविताओं के स्थापत्य और काव्यभाषा पर सवाल उठा सकते थे। पर, बजाय रचनात्मक स्तर पर प्रवृत्ति को तार तार करने के हम मुहल्ले के गुट की तरह ऐसे उलझ रहे हैं जैसे हमारे घर में सेंधमारी हुई है। बहस की इस भाषा और कथ्य को लेकर हम कैसा पाठक समाज बनायेंगे। रचनात्मकता को लेकर हमारी प्रतिबद्धता व्यावहारिक जीवन में नहीं दिखेगी, तो फिर दिखेगी कहां? बहस तो पहले भी होती रही है, उस वक्त मौजूद फ्रंट पर ऐसी अशालीनता तो कहीं नहीं कभी नहीं दिखी। याद कीजिए हिंदी के साहित्यिक समाज को लेकर निराला की असुविधाएं और सरोज स्मृति में इसका प्रतिफलन, प्रेमचंद और बाबू गुलाब राय की असहमतियां, निराला बनाम रामचंद्र शुक्ल, रामविलास शर्मा से नामवर सिंह की असहमतियां किन रूपों में व्यक्त हुई है। मेरा तो मानना यह भी है कि लक्ष्मीकांत वर्मा यदि नयी कविता के प्रतिमान नहीं लिखते तो क्रांतिकारी स्थापनाओं को लानेवाली नामवर सिंह की किताब कविता के नये प्रतिमान हमें शायद ही इस रूप में दिखती। सारी बहस विमर्श का वातावरण रचकर हिंदी पट्टी के लिए प्रेरक, उत्साहवर्धक, विचारोत्तेजक और प्रश्नाकुल दृश्य खड़ा करती थी। लेकिन हमारे इन तेवर और तमीज के कारण भी भाषा का अस्तित्व खतरे में पड़ता है। भारतीय लोकभाषा का सर्वेक्षण दिल दहला देनेवाला है। भारतीय लोक भाषा सर्वेक्षण की टीम ने देश की सभी भाषाओं का सर्वे करके कहा है कि भारत की 780 भाषाओं में से 400 के विलुप्त होने का खतरा है। दुनिया की 4,000 भाषाओं के अगले 50 वर्षों में विलुप्त होने का खतरा है। उनमें से 10 प्रतिशत भाषाएं भारत में बोली जाती हैं। सोचने की बात यह है कि हम जिन भाषाओं में अपने सरोकार, चिंता, क्षोभ, आक्रोश व्यक्त कर रहे हैं, क्या इससे हमारा पाठक वर्ग बनेगा या झल्लायेगा। छिछली-उथली भाषा से हम पाठक समाज को बिदकाकर पूरी भाषा को ही संकट में डाल रहे हैं। मजदूरी की बात करनेवाले कामगार, करों में राहत की मांग करनेवाले व्यवसायी और सेवाशर्तों की बात करनेवाले कर्मचारियों की भाषा जब अलग होगी, तो स्वाभाविक है कि पढ़ने लिखनेवालों की भाषा इन सबसे और अलग होगी। हम गौरवशाली हैं कि इस हमय हिंदी में एक साथ कई पीढि़यां रचनारत हैं, कई माध्यम में एक साथ दुनिया भर में सक्रिय है। एक सर्वथा भिन्न प्रकार की कंपोजिट डेमोक्रेसी बन रही है। हम सब मिलकर भाषा और समाज की इस प्रवृत्ति और स्वरूप को थोड़ा मानवीय बनाते हुए इस नव उदारवादी व्यवस्था से जूझने के लिए औजार बनाएं।

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