प्यास से मरणासन्न हूं छठी मईया… जीवनधारा दे दो

अंतहीन जुल्म से मौत के मुहाने पर खड़ी ‘डढ़वा नदी’ का सुनो आर्तनाद / छठ में गर्भ खोद कर व्रतियों के लिए पानी लाने से व्यथित है नदी / इस बार भी खुद अर्घ्य देकर भागीरथ भेजने की मन्नत मांग रही डढ़वा

अमित राजा / देवघर । अपनी अमृतधारा से कभी जीवन दायिनी रही डढ़वा नदी आज मरणासन्न है और अपने लिए जीवनधारा मांग रही है। इसके लिए डढ़वा इस बार छठी मईया के गीत टूटती-बिखरती सांसों से गायेगी और भगवान भास्कर को अर्घ्य देगी। लोगों के जुल्म से उसकी धारा मर चुकी है। बरसात में डढ़वा बौराती है तो बाकी महीने सूखे गड्ढ़ों में प्यासी पड़ी रहती है। गिनती के लिए उसकी सांसें बचीं हैं। मगर, उसकी तकलीफ इस बात से बढ़ जाती है कि इस बार उसके ही गर्भ को कई फिट खोदने से निकले पानी से उसे अर्घ्य देना होगा। दरअसल, डढ़वा में बाहर से लाकर पानी लाने की तैयारी थी, मगर कुछ फिट गड्ढे किये जाने से पानी निकला है। इसी पानी से छठव्रतियों को अर्घ्य देना है। लेकिन, डढ़वा की जीवन धारा वापस लाने के कोई उपाय नहीं किये गये हैं। प्रशासन की परेशानी ये है कि वह डढ़वा का गर्भ खोद कर पानी तो ले आया है, मगर डढ़वा के लिए कोई भागीरथ पैदा नहीं कर सका है।

बीमार छठव्रती बनी ‘देवघर की गंगा’

अपने किनारों पर कभी मनुष्य को जीवन देने वाली डढ़वा नदी देवघर की गंगा रही है। यहां छठ पर्व की तैयारी है। प्रकृति का महापर्व छठ के गीत गूंज रहे हैं। लेकिन, इस बीच डढ़वा का दर्द कराह बनकर बाहर आ रहा है। अतिक्रमण और दशकों से बालू निकाले जाने से डढ़वा आहत है। अब डढ़वा के खजाने से पानी के साथ बालू भी गायब हो चुका है। कहीं वह सरस्वती की तरह विलीन न हो जाए, इसके लिए उसने छठ पर्व पर एक व्रती का रूप धारण कर लिया है। अस्ताचलगामी सूर्य और उदयीमान सूर्य को डढ़वा भी अर्घ्य देगी। डढ़वा याचक के तौर पर सामने है और अपने लिए जीवन मांग रही है। अपनी अमृत धारा से हरियाली लाने वाली ‘डढ़वा’ ने जिन्हें बसाया, अब उनके लिए ईश्वर से सद्बुद्धि मांग रही है। सूर्य की दोनों पत्नियों उषा और प्रत्युषा से विनती कर रही है। उषा से सूर्योदय की पहली तो प्रत्युषा से सूर्यास्त की आखिरी किरण भगवान सूर्य को मिलती है। डढ़वा कहती है कि एक समय लोगों के जुल्म से तंग होकर गंगा पृथ्वी से गयी थी। भागीरथ ने तपस्या कर और शिव की जटाओं का आधार देकर गंगा को पृथ्वी पर लाया था। लेकिन, डढ़वा तो छोटी नदी है। अगर चली गई तो भागीरथ बनकर कौन आएगा।

नदियों के हमलावर कब जागेंगे

डढ़वा नदी मां सरस्वती, मां लक्ष्मी, मां काली और मां दुर्गा से भी प्रार्थना कर रही है कि वे अपने भक्तों को बुद्धी-विवेक दे। क्योंकि इनके भक्त इतने अंधभक्त हो जाते हैं कि मां की प्रतिमाओं का विसर्जन नदियों में कर कई नदी-नालों की मौत का कारण बन रहे हैं। जमुना जोर का पानी इन्हीं भक्तों ने दूषित किया। वरना, आज गंदे नाले में तब्दील जमुना जोर में कभी छठ पर्व मनाया जाता था। लोग जमुना जोर का पानी पीते थे। शिव गंगा को इन्हीं भक्तों ने गंदा किया। इन नदियों व तालाबों के अलावा अजय नदी में भी अब प्रतिमाएं विसर्जित की जाने लगी हैं।

नहीं सुधरे तो होंगे शापित

डढ़वा का आर्तनाद सुनकर भी लोग नहीं सुधरे तो यकीनन शापित होंगे। छठ व्रती का रूप धरी डढ़वा नदी कह रही है कि जो समाज कीमती प्राकृतिक खजाने यानी अपनी नदियों को खो देता है, वह समाज शापित होता है। आज जमुना जोर एक नाला है। मगर, कभी इसमें शुद्ध जल प्रवाहित होता था। लोग दाल गलाने और सहज पाचन के लिए जमुना जोर का पानी कलश व घैले में लेकर जाते थे। डढ़वा कहती है कि लोग अपनी नदियों से निर्दयता से साफ पानी लेते हैं और बदले में उन्हें मल और कचरे से भर देते हैं। डढ़वा को ताज्जुव होता है कि लोग मरणासन्न नदी में पूजा करते हैं, पर उनकी दुर्दशा को नजरंदाज कैसे कर जाते हैं। डढ़वा इस दुश्चिंता से और भी दुखी हो जाती है कि कहीं अजय नदी को भी बुरी नजर न लग जाये। वह सवाल उठाती है कि गंगा को निर्मल बनाने के लिए खर्च हो रहे हैं तो कुछ प्रयास डढ़वा की जीवन धारा वापस लाने के लिए क्यों नहीं हो रहे।

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