फिर खुलेगा बंद बोफोर्स केस, चुनावों पर डालेगा असर!

निजी जासूस माइकल हर्शमैन ने पाकिस्तान से जोड़ा केस का कनैक्शन

वर्ष 1989 में हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने वाला बोफोर्स तोप खरीद घोटाले से संबंधित बंद केस सुप्रीम कोर्ट में एक बार फिर खुलेगा। ऐसे संकेत मिलने के साथ ही सियासी गलियारों में इसके राजनीतिक असर का आकलन किया जाने लगा है। इसी महीने निजी जासूस माइकल हर्शमैन ने मामले सेे संबंधित कुछ नये और सनसनीखेज खुलासा हैं। साथ ही उन्होंने बोफोर्स घोटाले का पाकिस्तान से भी कनैक्शन बताया है।

मालूम हो कि इस केस को वर्ष 2005 में बंद कर देने का निर्णय दिल्ली हाई कोर्ट ने दिया था। तत्कालीन सरकार ने सीबीआई को अपील की अनुमति नहीं दी थी। याचिकाकर्ता अजय अग्रवाल ने सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली हाई कोर्ट के उस निर्णय को चुनौती दी है। सुप्रीम कोर्ट जल्द ही उस मामले की सुनवाई करेगा। इस बीच यदि केस आगे बढ़ा तो यह सवाल भी उठेगा कि किसे बचाने के लिए केस बंद किया गया था। लोग पूछेंगे कि वर्ष 2005 में केंद्र सरकार ने जांचकत्र्ता सीबीआई के हाथ क्यों बांध दिए थे?

वर्ष 2010 में भारत सरकार के ही आयकर न्यायाधिकरण ने कहा था कि बोफोर्स के दलाल ‘क्वात्रोच्चि और बिन चड्ढा को बोफोर्स तोप खरीद की दलाली के 41 करोड़ रुपए मिले थे। ऐसी आय पर भारत में उन पर टैक्स की देनदारी बनती है।’ ऐसे में सवाल उठता है कि तब सरकार ने उनसे टैक्स क्यों नहीं वसूला था। बोफोर्स एक अच्छी तोप है, पर इससे भी बेहतर तोप फ्रांस की सोफ्मा खरीद के लिए तब उपलब्ध थी। क्या सोफ्मा को छोड़कर बोफर्स की खरीद इसलिए हुई क्योंकि सोफ्मा कंपनी दलाली नहीं देती थी? सीबीआई ने स्विस बैंक की लंदन शाखा में बोफोर्स की दलाली के पैसे का पता लगा लिया था। वह क्वात्रोचि के खाते में था।

जानकारी के अनुसार उस खाते को गैर कांग्रेसी शासन काल में सीबीआई ने जब्त करवा दिया था। मगर, बाद में मनमोहन सिंह सरकार के एक अफसर ने लंदन जाकर उस खाते को खुलवा दिया? न सिर्फ क्वात्रोचि को भारत से भाग जाने दिया गया, बल्कि उसने लंदन बैंक से अपने खाते से वे पैसे भी निकाल लिए। पहले भी बोफोर्स केस का असर चुनावों पर पड़ा था। ऐसे में माना जा रहा है इस केस के खुलने और कुछ खुलासे होने से होने वाले चुनावों में पर भी इसका असर पड़ेगा।

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