बेशर्म मीडिया मांगे जस्टिस सीकरी से माफीः मार्कंडेय काटजू

बेशर्म मीडिया मांगे जस्टिस सीकरी से माफीः मार्कंडेय काटजूभारतीय मीडिया में क्या जरा भी शर्म नहीं बाकी है? भारत की भिन्न प्रकार की संस्थाओं में कई भ्रष्ट लोग काबिज हैं। लेकिन, ऐसे भी कुछ हैं जो ईमानदार, मेहनती और योग्य हैं। मीडिया को चाहिए कि पहली श्रेणी के लोगों की आलोचना करे, उनकी करतूतें सबके सामने लाये। मगर, दूसरी श्रेणी के लोगों की सुरक्षा और प्रशंसा भी उसका दायित्व है। बावजूद इसके मीडिया ने जस्टिस सीकरी के साथ गलत किया। यह बात फेसबुक पर अंग्रेजी में किये एक पोस्ट में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज और भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू ने कही है।

काटजू ने लिखा है कि जस्टिस सीकरी एक ईमानदार, योग्य, असाधारण और परिश्रमी जज हैं। मैं खुद यह दावा कर सकता हूं। क्योंकि, जब वे दिल्ली हाई कोर्ट में थे तो मैं वहां मुख्य न्यायाधीश था और मैंने उन्हें करीब से जाना है। मगर, लगभग सड़े हुए और बेशर्म मीडिया ने उनकी प्रतिष्ठा खराब करने का प्रयास किया है।

उन्होंने लिखा है कि दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बतौर मुझे सिर्फ न्यायिक ही नहीं, बल्कि काफी प्रशासनिक कामकाज भी करना पड़ता था। सो, शाम को चार बजे अदालती काम निपट जाने के बाद भी मैं आठ बजे तक कोर्ट में रहता था। उनके समय में कौन-कौन हैं पता करने पर अक्सर मुझे बताया जाता कि जस्टिस सीकरी अब भी चैंबर में हैं और अपने फैसले तैयार कर रहे हैं। वे यह काम बेहद ध्यान से करते थे। मैं उनके चेंबर जाता था और कहता था कि इतना ज्यादा काम कर अपनी सेहत खराब न करें। उनकी साख और ईमानदारी बेदाग थी।

बकौल सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज काटजू मैंने कभी उनके खिलाफ कोई शिकायत नहीं सुनी। मगर, लगभग सारा मीडिया जस्टिस सीकरी के खून का प्यासा हो गया। मैं बताता हूं कि सच क्या है। पूरा मामला द प्रिंट.इन की एक रिपोर्ट के साथ शुरू हुआ, जिसमें कहा गया था कि केंद्र सरकार ने जस्टिस सीकरी का नाम कॉमनवेल्थ सेक्रेटेरिएट आर्बिट्रेशन ट्रिब्यूनल (सीएसएटी) के सदस्य के बतौर आगे किया है जिसके लिए उन्होंने सहमति दे ही है। यह रिपोर्ट सच थी,लेकिन एक लैटिन कहावत है कि आधा सच भी उतना ही बुरा हो सकता है जितना पूरा झूठ। वेबसाइट में छपी रिपोर्ट में भी ऐसा ही हुआ है, जिसमें तथ्यों को तोड़ा व मरोड़ा गया है।

1. कॉमनवेल्थ सेक्रेटेरिएट आर्बिट्रेशन ट्रिब्यूनल (सीएसएटी) राष्ट्रमंडल देशों के सदस्यों के आपसी विवादों की सुनवाई करती है। इस ट्रिब्यूनल के सदस्य तभी बैठते हैं जब उन्हें किसी सदस्य से शिकायत मिलती है। मसलन इसकी नियमित सुनवाई नहीं होती और इसके सदस्य भी स्थायी रूप से इंग्लैंड में नहीं रहते। वे तभी वहां जाते हैं जब ट्रिब्यूनल के सामने कोई मामला आता है और यह अक्सर साल में सिर्फ दो-तीन बार होता है। कॉमनवेल्थ सेक्रेटेरिएट आर्बिट्रेशन ट्रिब्यूनल (सीएसएटी) के सदस्यों को नियमित वेतन नहीं मिलता। ऐसे में इसे एक मलाईदार पद कहना, जैसा कि द प्रिंट.इन की रिपोर्ट में कहा गया है, तथ्यों को पूरी तरह से तोड़ना-मरोड़ना व फर्जी है। यह संबंधित पत्रकार की सनसनी पैदा करने और लोगों के सामने मसाला परोसने की घटिया कोशिश है जो इन दिनों ज्यादातर भारतीय पत्रकारों की आदत हो चली है।

2. सीएसएटी के लिए मुख्य न्यायाधीश ने उनकी सहमति से जस्टिस सीकरी का नाम आगे बढ़ाया था। यह दिसंबर 2018 के पहले हफ्ते की बात है। यानी आठ जनवरी के सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले से महीने भर पहले की जिसमें आलोक वर्मा को छुट्टी पर भेजने के फैसले को रद्द कर दिया गया था और कहा गया था कि एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति एक हफ्ते में इस मुद्दे पर फैसला करे। मुख्य न्यायाधीश ने इस फैसले के बाद ही जस्टिस सीकरी को उस समिति में भेजने का फैसला किया था।इसलिए सीबीआई से आलोक वर्मा को हटाने के समिति के फैसले को एक महीने पहले सीएसएटी के लिए जस्टिस सीकरी की सहमति से जोड़ना बेतुका है। जैसा कि द प्रिंट.इन ने अपनी रिपोर्ट में करने की कोशिश की है। यह क्षुद्र और झूठी खबर का एक और उदाहरण है, जिसे भारतीय मीडिया के बड़े हिस्से ने अपनी आदत में शुमार कर लिया है।

जस्टिस सीकरी ने जब सीएसएटी का सदस्य बनने की सहमति दी थी तो वे उच्चाधिकार प्राप्त समिति के सदस्य नहीं थे और न ही तब तक सुप्रीम कोर्ट का आठ जनवरी वाला फैसला आया था। ऐसे में यह आरोप कैसे लगाया जा सकता है, जैसा कि द प्रिंट.इन की खबर में आरोप है कि जस्टिस सीकरी का सीएसएटी के लिए नामांकन इसलिए हुआ क्योंकि उन्होंने आलोक वर्मा को सीबीआई से हटाने का फैसला किया था?

3. सीएसएटी के लिए दी गई अपनी सहमति जस्टिस सीकरी ने कल वापस ले ली है। अगर मीडिया में जरा सी भी शर्म बची है तो उसे जस्टिस सीकरी से माफी मांगनी चाहिए। जिनकी छवि मैली करने की उसने हर मुमकिन कोशिश की गयी है।

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