भाजपा-शिवसेनाः ‘कमजोर 28 साल पुरानी दोस्ती की डोर!’

कैबिनेट फेरबदल में जगह नहीं मिलने से शिव सेना नेतृत्व नाराज, सत्ताधर्म-राजधर्म की राह पर अब भाजपा-शिवसेना का धर्म संकट

अमित राजा

कैबिनेट फेरबदल के बाद कई मंत्रियों को दोहरी जिम्मेदारी मगर शिवसेना से किसी को नहीं लिये जाने पर भाजपा के साथ उसका मतभेद और गहरा गया है। एक दिन पहले तो शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने कहा था कि कैबिनेट में फेरबदल की उन्हें कोई जानकारी नहीं नहीं है। जबकि मीडिया ने इस खबर को हफ्ते दिन पहले ही ब्रेक कर दिया था। मोदी सरकार पर इससे पहले कई बार चोट कर चुके शिवसेना नेतृत्व के बाद पार्टी प्रवक्ता ने कैबिनेट फेरबल को सरकार का नहीं भाजपा का बताकर दोनों सहयोगी दलों के बीच उभरे मतभेदों के और गहरे होने का संकेत दे दिया है।  

अब जो भी हो, लेकिन भाजपा-शिवसेना में आंतरिक अलगाव नया नहीं है। वर्ष 2014 में महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के वक्त से ही दोनों के सुर तल्ख रहे हैं। कैबिनेट फेरबदल के बाद शिवसेना से आये बयानों के बाद तो दोनों दलों के बीच संबंधों की डोर पूरी तरह उलझ गई है। इस उलझी हुुई डोर का सिरा खोजने के लिए कुछ तथ्यों को समझें तो उम्मीद की जा सकती है कि दोनों के बीच बातचीत के लिए आरएसएस यानी संघ फिर से आगे आएगा।  

दरअसल, भाजपा-शिवसेना की 28 साल की दोस्ती में दरार का खतरा तो वर्ष 2014 के महाराष्ट्र विस चुनाव में ही नजर आ रहा था। बाला साहेब ठाकरे की विरासत को लेकर शिवसेना समझौते के लिए तैयार नहीं थी। जबकि भाजपा नेताओं के बयान यही इशारा कर रहे थे कि उनकी सनक तब महाराष्ट्र में अपनी अकेली ताकत आजमा लेने की थी। दूसरी ओर आरएसएस राजधर्म निभा रहा था।

संघ अब भी नहीं चाहता कि किसी भी सूरत में शिवसेना से 28 साल पुरानी दोस्ती टूटे। संघ कई कारणों से शिवसेना को साथ रखने के पक्ष में है। मालूम हो कि मराठी मानूष के मुद्दे पर काम करने वाले संगठन शिवसेना ने वर्ष 1990 में महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में कदम रखा। तब मराठी अस्मिता पर काम करते हुए शिवसेना तात्कालिक कारणों से मराठियों के सपनों का प्रतिनिधित्व करती दिख रही थी। जबकि वर्ष 1990 का यह दौर ऐसा था जब राम जन्मभूमि आंदोलन ने भाजपा के संगठन को नई ताकत और नया सांगठनिक उभार दिया था।

राष्ट्रीय स्तर पर उभर रही भाजपा और क्षेत्रीय स्तर पर उभरी शिवसेना के बीच चुनावी गठबंधन हुआ। मगर, पहली बार चुनाव में उतरी शिवसेना को महाराष्ट्र में भाजपा के मुकाबले 80 सीटें अधिक मिलीं। वर्ष 1990 में शिवसेना ने 185 और भाजपा ने 105 अपने उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारे। इस गठबंधन ने 1995 में महाराष्ट्र की सत्ता हासिल कर ली। इसके बाद भी आगे के दो चुनावों में शिवसेना ने भाजपा से अधिक सीटें ली। वर्ष 2009 के चुनाव में गठबंधन के तहत भाजपा ने 114 और शिवसेना ने 169 सीटों पर अपनी ताकत आजमायी। मगर, भाजपा ने शिवसेना से दो सीटंे अधिक यानी 44 के मुकाबले 46 सीटें झटक ली।

माना गया कि अधिक सीटें झटकने की वजह से ही भाजपा 2014 के चुनाव में शिवसेना से कम सीट लेने के सवाल पर आंखें तरेरती रही। और तो और, इस बार के चुनाव के परिणाम ने तो शिवसेना के पैरों तले जमीन ही सरका दी। महाराष्ट्र में बड़ी ताकत रही शिवसेना के सामने वर्ष 2014 में भाजपा का मजबूत उभार शिवसेना को असहज कर गया। हालांकि शिवसेना ने अपनी पार्टी के मुखपत्र ‘सामना’ के कवर स्टोरी में शीर्षक बनाया था कि ‘दिल्ली तुम्हारी, महाराष्ट्र हमारा’। मगर, शिवसेना की ये चाहत भी पूरी नहीं हुई।

वर्ष 2014 के चुनाव में तो भाजपा ने शिवसेना से करीब दो गुणा अधिक सीटों पर जीत हासिल की। ऐसे में असहज हुई शिवसेना ने भाजपा के नेतृत्व में बनी सरकार में साथ रहकर भी कई मौके पर विपक्षी दल की तरह व्यवहार किया। जबकि सरकार के नेतृत्व के सवाल पर भाजपा ने एनसीपी यानी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी जैसी गलती नहीं की। एनसीपी की गलती के कारण ही महाराष्ट्र में एनसीपी से बड़ी पार्टी कांग्रेस बन गयी। एनसीपी को वर्ष 2004 के विस चुनाव में 71 सीटें मिलीं थीं। जबकि कांग्रेस को 69 सीटें हासिल हुई थीं। लेकिन, दोनों दलों के गठबंधन के बाद बनी सरकार का नेतृत्व कम सीटों के बाद भी कांग्रेस ने किया था। एनसीपी की इस गलती का परिणाम उसे वर्ष 2009 और 2014 के चुनाव में दिखा। वर्ष 2009 के चुनाव में एनसीपी की जीती हुई 62 सीटों के मुकाबले कांग्रेस ने उससे 20 अधिक यानी 82 सीटों पर जीत दर्ज कर ली। जबकि वर्ष 2014 के चुुनाव में कांग्रेस को 42 तो एनसीपी को 41 सीटों पर जीत मिली थी।  

जानकारों की मानें तो आरएसएस के शिवसेना प्रेम के कई कारण रहे हैं। मराठी मानस की बात करने वाले शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने वर्ष 1991 में अपनी पार्टी के मंच से विश्व हिन्दू परिषद का नारा ‘गर्व से कहो हम हिन्दू हैं’ दे दिया। आगे, वर्ष 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद शिवसेना ने भाजपा से भी दो कदम आगे बढ़कर बाबरी विध्वंस की जिम्मेवारी ले ली। अब ऐसे में माना जा रहा है कि भाजपा दो तरफा दबाव में शिवसेना से 28 साल पुराना रिश्ता नहीं तोड़ेगी। कैबिनेट फेेरबदल में जगह नहीं मिलने से नाराज शिवसेना को संघ के दबाव में मनाने की पहल होगी।

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