‘भात दे हरामजादे’ में कौन है हरामजादा?

जिसके पास थाली है, हर भूखा आदमी, उसके लिए सबसे बड़ी गाली है

 

नारायण सिंह

झारखंड के सिमडेगा में 10 साल की एक बच्ची ‘भात दे-भात दे’ कहते हुए भूख से मर गयी। मगर हरामजादे ने भात नहीं दिया। यह हरामजादा बांग्लादेश के एक कवि का पात्र है, जिसकी आत्मा सरकार की व्यवस्था में वास कर रही है। बहरहाल, बांग्लादेश के इस कवि की खोज भात के इस किल्लत के दौर में वरिष्ठ लेखक और समालोचक नारायण सिंह ने की है। आईये नारायण सिंह को पढ़ें…।

बांग्लादेश के कवि रफीक आजाद की एक कविता का शीर्षक है ‘भात दे हरामजादे।’ रफीक की मूल बांग्ला कविता का हिंदी अनुवाद 1990 में ज्ञानरंजन की पत्रिका ‘पहल’ के 39वें अंक में प्रकाशित हुआ था। ‘पहल’ के उस खास अंक में पैंतालीस बांग्लादेशीय कवियों की 103 कविताओं के साथ वहां के साहित्यकार बदरुद्दीन उमर के पांच महत्वपूर्ण लेख शामिल हैं। उस पूरे बांग्लादेशीय कविता-अंक के अनुवादक थे धनबाद के ही रहने वाले अमिताभ चक्रवर्ती। अगर विषयांतर न माना जाये तो अपने साथी अमिताभ के बारे में दो लाइनें। कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो के डेढ़ सौ साल पूरे होने के अवसर पर अमिताभ चक्रवर्ती ने एक विचारोत्तेजक आलेख लिखा था, जिसे ज्ञानरंजन ने पहल 61 के साथ विशेष पुस्तिका (लगभग 50 पृष्ठ) के रूप में जारी किया था। अमिताभ चक्रवर्ती एक होनहार कवि, चिंतक और कुशल अनुवादक थे। साहित्य-जगत को उनसे बेशुमार आशाएं थीं, पर वे मात्र सैंतालीस वर्ष की आयु में सितंबर, 2000 में दुनिया छोड़ गए।

रफीक आजाद की यह कविता मुझे तब से बेतरह याद आ रही थी, जब से झारखंड की एक बच्ची भूख की बीमारी (कलक्टर ने जिसे मलेरिया का दूसरा नाम दे रखा है) से भात मांगते हुए मृत्यु का ग्रास बनी थी। कविता मिलने में थोड़ी सी देर हुई, क्योंकि ‘पहल’ का वह अंक गर्द व गुबार में लिपटा किसी आलमारी में बंद था, जिसे आज दीपावली के दिन मैंने खोज निकाला।

भात-भात चिल्लाते हुए मरने वाली झारखंड की उस बच्ची और अमिताभ चक्रवर्ती की स्मृति में समर्पित है यह ‘भात दे हरामजादे’ नाम की अद्भुत कविता…

भात दे हरामजादे

बहुत भूखा हूं
पेट के भीतर लगी है आग,
शरीर की समस्त क्रियायों से ऊपर
अनुभूत हो रही है हर क्षण सर्वग्रासी भूख
अनावृष्टि जिस तरह

चैत के खेतों में
फैलाती है तपन
उसी तरह भूख की ज्वाला से
जल रही है देह

दोनों शाम
दो मुट्ठी मिले भात तो
और मांग नहीं है,
लोग तो बहुत कुछ
मांग रहे हैं
बाड़ी, गाड़ी, पैसा
किसी को चाहिए यश,
मेरी मांग बहुत छोटी है

जल रहा है पेट
मुझे भात चाहिए
ठंडा हो या गरम
महीन हो या मोटा
राशन का लाल चावल
वह भी चलेगा

थाल भरकर चाहिए
दोनों शाम दो मुट्ठी मिले तो
छोड़ सकता हूं अन्य सभी मांगें
अतिरिक्त लोभ नहीं है
यौन क्षुधा भी नहीं है
नहीं चाहिए
नाभि के नीचे की साड़ी
साड़ी में लिपटी गुड़िया

जिसे चाहिए उसे दे दो
याद रखो
मुझे उसकी जरूरत नहीं है
नहीं मिटा सकते यदि
मेरी यह छोटी मांग, तो
तुम्हारे संपूर्ण राज्य में
मचा दूंगा उथल-पुथल

भूखों के लिए नहीं होते
हित-अहित, न्याय-अन्याय
सामने जो कुछ मिलेगा
निगलता चला जाऊंगा निर्विचार

कुछ भी नहीं छोड़ूंगा शेष
यदि तुम भी मिल गए सामने
राक्षसी मेरी भूख के लिए
बन जाओगे उपादेय आहार

सर्वग्रासी हो उठे यदि
सामान्य भूख, तो
प्रैणाम भयावह होते हैं
याद रखना
दृश्य से द्रष्टा तक की
धारावाहिकता को खाने के बाद
क्रमशः खाऊंगा
पेड़-पौधे, नदी-नाले
गांव-कस्बे, फुटपाथ-रास्ते

पथचारी, नितंब-प्रधान नारी
झंडे के साथ खाद्यमंत्री
मंत्री की गाड़ी
मेरी भूख की ज्वाला से
कोई नहीं बचेगा,

भात दे हरमजादे
नहीं तो खा जाऊंगा
तेरा मानचित्र

-रफीक आजाद (जन्म- 1941, गुणी, टंगाइल, बांग्लादेश)

उप शीर्षक- ‘जिसके पास थाली है, हर भूखा आदमी, उसके लिए सबसे बड़ी गाली है’ धूमिल की एक कविता की पंक्ति है।

 

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4 thoughts on “‘भात दे हरामजादे’ में कौन है हरामजादा?

  1. महोदय , इस न्यूज़ बेबसाइट से मैं जुड़े रहना चाहता हूं ।

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