बदलती कांग्रेस अब राष्ट्रवाद और धर्म पर सतर्क

वर्ष 2014 के चुनाव में भीषण हार के बाद आंतरिक रिपोर्ट पर कांग्रेस में आया रणनीतिक परिवर्तन

देश की सत्ता पर सबसे अधिक समय तक काबिज रहने का अनुभव रखने वाली कांग्रेस इन दिनों रणनीतिक तौर पर बदलाव के मोड़ पर है। इसका संकेत किसी भी मुद्दे पर कांग्रेस के अधिकारिक बयानों से मिल रहे हैं। माना जा रहा है कि वर्ष 2014 के आम चुनाव में कांग्रेस को मिली अबतक की सबसे बड़ी हार के कारणों को ढूंढने में लगी पार्टी को मिले जवाब से ही कांग्रेस की रणनीति बदली है। कांग्रेस को मिली हार पर जारी एके एंटोनी समिति की रिपोर्ट पर भी लगातार कांग्रेस नेतृत्व मंथन कर रहा है। साथ ही धर्म और राष्ट्रवाद के मसले पर कांग्रेस ज्यादा ही सतर्क है। 

राजनीतिक प्रेक्षकों का कहना है कि कांग्रेस अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के रास्ते से उदार धर्मनिरपेक्षवाद के रास्ते पर है। जानकार उदार धर्मनिरपेक्षवाद का मतलब सभी धर्मों का बराबर सम्मान बताते हैं। ऊपर से राष्ट्रवाद और धर्मनिरपेक्षता में एक नीतिगत सामंजस्य बैठाना भी कांग्रेस की कोशिश है। जानकार कुछ उदाहरण भी देते हैं। उनका कहना है कि रोहिंग्या मुसलमानों को बसाने की मांग पर दिल्ली के जंतर-मंतर या देश के दूसरे हिस्से में मुस्लिमों के आयोजित प्रदर्शनों में वामपंथी दल, राजद, तृणमूल कांग्रेस, बसपा जैसी पार्टियों ने हिस्सा जरूर लिया, मगर कांग्रेस के लोग उसमें नहीं दिखे।

इसी तरह तीन तलाक पर अदालती फैसले को लेकर कांग्रेस का जो अधिकारिक बयान आया, वह बड़ा संयमित था। कर्नल पुरोहित को मिली जमानत का भी कांग्रेसियों ने स्वागत किया। अब इलाहाबाद हाई कोर्ट की ओर से मदरसों में राष्ट्रगान को जरूरी किये जाने का भी कांग्रेस प्रवक्ता ने स्वागत कर दिया है। इसे कांग्रेस में नीतिगत बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है। कांग्रेसी सभी धर्मों का सम्मान करते हुए मंदिर, मस्जिद, मजार पहुंचते रहे हैं। लेकिन, हाल में गुजरात दौरे की शुरूआत राहुल गांधी ने द्वारिकाधीश मंदिर में पूजा-अर्चना कर की। इसी तरह चामुंडा मंदिर भी गये।

राजनीतिक जानकार और वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर का कहना है कि कांग्रेस के दोहरे मापदंडों का लाभ भाजपा उठाती रही है। सोहराबुद्दीन, अहमदाबाद के अंडरवल्र्ड के बादशाह अब्दुल रशीद लतीफ का ड्राइवर था। लतीफ के मारे जाने के बाद सोहराबुददीन ने लतीफ की जगह ले ली थी। लतीफ को गुजरात पुलिस ने 10 अक्तूबर 1996 को दिल्ली में गिरफ्तार किया था। 1997 में गुजरात पुलिस की ‘हिरासत से भागने के प्रयास में हुई मुंठभेड़ में’ लतीफ मारा गया था। उन दिनों गुजरात में कांग्रेस समर्थित राष्ट्रीय जनता पार्टी की सरकार थी।

जिन पुलिसकर्मियों ने लतीफ को मारा था, उन पुलिसकर्मियों को तत्कालीन सरकार ने समारोहपूर्वक सम्मानित किया था। कांग्रेस ने तब फर्जी मुंठभेड का आरोप नहीं लगाया। पर जब नरेंद्र मोदी के मुख्य मंत्रित्व काल में 26 नवंबर 2005 को सोहराबुददीन ‘पुलिस मुंठभेड़’ में मारा गया तो देश भर में कांग्रेस व कई अन्य दलों और हस्तियों ने इस ‘फर्जी मुंठभेड़’ के खिलाफ हंगामा खड़ा कर दिया। नतीजतन बाद में इसका चुनावी लाभ भाजपा और नरेंद्र मोदी को मिला।

श्री किशोर के मुताबिक गोधरा रेलवे स्टेशन पर वर्ष 2002 में ट्रेन पर बाहर से पेट्रोल छिड़क कर आग लगा दी गयी थी, जिसमें 59 कार सेवक जल मरे थे। मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल के रेल मंत्री ने यूसी बनर्जी कमेटी बनाई। उसने रपट दे दी कि यात्रियों द्वारा स्टोव पर खाना बनाने के क्रम में डिब्बे के भीतर ही आग लग गयी थी। जबकि 2011 में अदालत ने उस ट्रेन के डिब्बों पर बाहर से पेट्रोल छिड़क कर आग लगाने के आरोप में 11 लोगों को फांसी और 20 लोगों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। सीबीआई ने इस केस की जांच की थी।

याद रहे कि वर्ष 2011 में केंद्र में मनमोहन सिंह की ही सरकार थी। भाजपा विरोधी दलों ने गुजरात के लोगों को समझाया कि आप ट्रेन जलने के मामले में तो बनर्जी कमेटी की रपट को मान लो। पर, उसके बाद हुए दंगे को लेकर नरेंद्र मोदी और उनके लोगों को जिम्मेदार मानो। बाद के दंगों के लिए कई भाजपा नेताओं को अदालत ने जरूर सजा दी। पर गोधरा ट्रेन दहन कांड के मामले में अधिकतर लोगों ने कांग्रेस की दलील को मानने से इनकार कर दिया। कांग्रेस के ऐसे ही दोहरे मापदंड के कारण गुजरात तथा अन्य जगहों में कांग्रेस चुनाव हारती गयी।

सांप्रदायिक मामलों को लेकर कांग्रेस नेतृत्व को सुरेंद्र किशोर एके एंटोनी समिति की रपट को पढ़ने और उसे अमल में आने की पहले ही अपील कर चुके हैं। अब कांग्रेस में रणनीतिक बदलाव को देखकर माना जा रहा है कि कांग्रेस ने एके एंटोनी समिति की रिपोर्ट को गंभीरता से लिया है। वर्ष 2014 के लोस चुनाव में पराजय के बाद खुद कांग्रेस ने कारणों की जांच का भार कांग्रेस के सबसे ईमानदार नेता एंटोनी को सौंपी थी। एंटोनी रपट में कहा गया है कि एकतरफा और असंतुलित धर्म निरपेक्षता की नीति चलाने के कारण भी कांग्रेस की पराजय हुई।

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