शुरूआत से खतरे में रही है अभिव्यक्ति की आजादी

कलात्मक अभिव्यक्ति चाहने वालों को मिली सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से राहत

पद्मावती फिल्म पर हंगामा जारी है। उधर, अभिव्यक्ति की आजादी पर सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का एक अन्य मामले की सुनवाई के दौरान यह फैसला कि कलात्मक अभिव्यक्ति को संरक्षण देना उसका कर्तव्य है, कलात्मक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता चाहने वालों के लिए राहत है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले में ये भी कहा गया है कि इस क्षेत्र में साधारणतः अदालतों को दखल नहीं देना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का काम संविधान का संरक्षण और उसकी व्याख्या है। किसी फिल्म को अगर सेंसर बोर्ड ने प्रदर्शन के लिए प्रमाणपत्र दे दिया है तो फिर अदालतों को उसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। संस्थाओं की स्वायत्तता और उनकी गरिमा की रक्षा की दिशा में यह टिप्पणी महत्वपूर्ण है।

हालांकि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खतरा हमेशा दिखा है। मकबूल फिदा हुसैन से लेकर तस्लीमा नसरीन तक ने इसे झेला है। साहित्य, चित्रकला, सिनेमा और वैचारिक विमर्श पर कट्टरपंथी अंकुश लगाना चाहते हैं। इसके लिए वे धमकी और हिंसा का भी सहारा लेते रहे हैं। सरकारें भी अक्सर इनके दबाव के आगे झुक जाती हैं।

मालूम हो कि गोवा में 20 नवंबर से अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव शुरू होने वाला है। मगर, इसके शुरू होने से पहले ही अंतरराष्ट्रीय निर्णायक मंडल के तीन सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया है। क्योंकि, निर्णायक मंडल की चुनी गई तीन फिल्मों के प्रदर्शन पर सूचना प्रसारण मंत्रालय ने रोक लगा दी है। इसलिए कि हिंदुत्ववादी तत्व उन्हें अश्लील बता कर उनका विरोध कर रहे थे। दूसरी ओर फिल्म निदेशक संजय लीला भंसाली की पहली दिसंबर को रिलीज होने जा रही फिल्म ‘पद्मावती’ को लेकर देश भर में बवाल मचा हुआ है। फिल्म की नायिका दीपिका पादुकोण की सुरक्षा बढ़ाई जा रही है। उनकी नाक काटने से लेकर उनके खिलाफ अन्य किस्म की हिंसा की धमकियां दी गयी हैं।

उल्लेखनीय है कि फिल्म पद्मावती को सेंसर बोर्ड के सदस्यों के अलावा अभी तक किसी ने भी नहीं देखी है और बोर्ड ने इसे प्रदर्शन के लिए प्रमाणपत्र दे दिया है। लेकिन, कुछ राजपूत संगठन और हिन्दू जागरण मंच के साथ संघ फिल्म के खिलाफ प्रचार में लगा है। फिल्म देखे बिना उनका आरोप है कि सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के स्वप्न में उसके और पद्मावती के बीच प्रेमदृश्य दिखा कर भंसाली ने राजपूती आन-बान का अपमान किया है। जबकि ये साबित हो चुका है कि पद्मिनी/पद्मावती सोलहवीं सदी के सूफी कवि मलिक मुहम्मद जायसी रचित काल्पनिक पात्र है। हालांकि इधर सूत्र बता रहे हैं कि सेंसर बोर्ड ने पद्मावती फिल्म को तकनीकी कारणों से वापस लौटा दिया है। ऐसे में रिलीज कुछ दिन टल सकती है।

You May Also Like

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *