संसद की अवमानना का आरोप और पार्टियों की भूमिका

शीतकालीन सत्र बुलाने में देरी पर आरोप-प्रत्यारोप के साये में कुछ सवाल

संसद का शीतकालीन सत्र बुलाने में की जा रही देरी पर कांग्रेस सवाल उठा रही है। इसके लिए सत्तारूढ़ भाजपा पर संसद की अवमानना के आरोप लगाये जा रहे हैं। कांग्रेस का कहना है कि गुजरात में चुनाव को देखते हुए भाजपा नहीं चाहती कि राफेल विमानों के सौदे पर कोई सवाल उठे। सो, संसद का शीतकालीन सत्र बुलाने में विलंब की जा रही है। जबकि भाजपा का कहना है कि कांग्रेस खुद अतीत में ऐसा कर चुकी है, इसलिए उसे ऐसा आरोप लगाने का हक नहीं है। हालांकि संसद की अवमानना के सवाल के साये में देखें तो कोई पार्टी पाक-साफ नहीं दिखेगी। वामदलों के अपवाद को छोड़ दें तो सभी पार्टियों के कई माननीयों की अनुपस्थिति राज्यसभा और लोकसभा के सदन में सत्र के दौरान रही है।

पिछले दशकों के रिकाॅर्ड पर नजर डालें तो साफ हो जायेगा कि कांग्रेस व भाजपा को संसद की गरिमा की कोई खास चिंता नहीं रही है। केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने राहुल गांधी की खिल्ली उड़ाते हुए कहा है कि पहले कांग्रेस अपने नेता का रिकॉर्ड देखे कि वे संसद में कितने दिन उपस्थित रहे हैं। मगर, रविशंकर प्रसाद इस मामले में अपनी पार्टी के सांसदों का रिकॉर्ड भूल गये से लगते हैं। बीते जुलाई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भाजपा सांसदों को संसद में मौजूद रहने का निर्देश दिया था। कहा था कि उनकी हाजिरी का पूरा हिसाब रखा जायेगा।

दरअसल, कोरम पूरा न होने के कारण राज्य सभा में सरकार एक विधेयक पेश ही नहीं कर पायी थी। सत्तारूढ़ दल के 56 सदस्यों में से 23 ही सदन में मौजूद थे। इससे तब भाजपा की बड़ी किरकिरी हुई थी। हालांकि खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संसद की गरिमा बहाल करने के लिए बहुत कुछ नहीं कर सके। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस मामले में एक आदर्श पेश किया था। नेहरू जब भी दिल्ली में होते तब हमेशा संसद में रहते थे और सांसदों के सवालों और भाषणों का जवाब देते थे। तब संसदीय बहसों का बौद्धिक स्तर भी ऊंचा हुआ करता था। मगर, पीएम नरेंद्र मोदी की संसद में मौजूदगी बहुत नहीं हो पाती। महत्वपूर्ण मुद्दों पर हुई चर्चा का जवाब भी कई बार वे खुद नहीं देते और सदनों की कार्यवाही सिर्फ इसलिए कई बार स्थगित हुई है। क्योंकि विपक्ष प्रधानमंत्री से जवाब देने की मांग पर हठ करता है और प्रधानमंत्री जवाब देने के लिए अपने किसी मंत्री को सामने करते हैं।

हालांकि तथ्यों पर गौर करें तो लोकतांत्रिक संस्थाओं की अनदेखी कर उन्हें कमजोर करने की प्रकिया कांग्रेस ने शुरू की थी। कांग्रेस जब ऐसा कर रही थी तब विपक्षी दल उसका विरोध करते थे। मगर, सत्ता में दूसरे दलों के आने के बाद उन्होंने भी इस प्रक्रिया को ही विस्तार दिया है। अब विरोध जताने पर कांग्रेस का मुंह उसकी सरकार के समय वाले हालात का हवाला देकर बंद कराया जा रहा है। बहरहाल, मौजूदा हालात ऐसे हैं कि चुनाव प्रचार में केंद्रीय मंत्री और प्रधानमंत्री व्यस्त हैं। सो, संसद का सत्र बुलाने में थोड़ी देर होना बड़ी बात नहीं है। लेकिन, सवाल जब उठ रहे हैं तो सत्तारूढ़ और विपक्षी पार्टियों को संसद की गरिमा पर सकारात्मक रूप से सोचना होगा।

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