‘सति प्रथा’ बनाम ‘उसके विरोध की विरासत’

25 किमी के एक सिरे पर ‘सति प्रथा पूजन’ और दूसरे सिरे पर राजाराम मोहन राय की विरासत का केंद्र

अमित राजा

झारखंड के गिरिडीह जिले में सतिप्रथा के खात्मे का बड़ा केंद्र है तो वहीं पति की चिता पर कूद कर जान देने वाली महिला के पूजन का स्थल भी है। सति प्रथा के खिलाफ और विधवाओं के पुनर्विवाह के लिए राजा राम मोहन राय के चलाये गये रेनेसां कालीन (पुनजार्गरण कालीन) आंदोलन को संचालित करने वाले ब्रह्म समाज का दक्षिण बिहार (झारखंड) स्तरीय मुख्यालय इसी गिरिडीह में है। जिला मुख्यालय स्थित इस मुख्यालय से महज 25 किमी की दूरी पर पति की चिता पर कूद कर जान देने वाली महिला और उसके पति की स्मृति में बनाया हुआ मंदिर भी है। उस दौर में जब चांद के बाद मंगल ग्रह की यात्रा हो रही है, तब ब्रह्म समाज का मुख्यालय ब्रह्म समाजियों से वीरान है, लेकिन सति मंदिर साल के कई खास मौकों पर आबाद होता है। ऐसे में हम मौजूदा समाज के मानस को समझ सकते हैं। भले ही सति प्रथा आज व्यवहारिक तौर पर लागू न हो, मगर मानसिक तौर पर इसके समर्थन की धारा आज भी सति मंदिर में पूजन और विशेष अनुष्ठान के रूप में प्रवाहित हो रही है।

देवी-देवता नहीं, पूजे जाते हैं सति व उसके पति

गिरिडीह जिले के गांडेय प्रखंड के परमाडीह गांव में एक मंदिर है। मंदिर में देवी-देवता की नहीं, सति और उनके पति की पूजा होती है। आसपास के एक विशेष जाति-समाज की विवाहिता महिलाएं कोई भी शुभ काम करने के पहले इस मंदिर में पूजा जरूर करती हैं। साल में कई बार तो बड़े धार्मिक अनुष्ठान भी होते हैं। हालांकि गांव वाले इस मंदिर में पूजा को सति प्रथा से जोड़ कर नहीं देखते। सति के ससुराल वाले भी मंदिर में पूजा करते हैं, लेकिन उनका कहना है कि पूजा-पाठ सति परंपरा को बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि गांव के लोगों की आस्था व एक परंपरा के तहत की जाती है। पुरूष प्रधान समाज की मानसिकता कहें कि लोगों की मान्यता है कि इस मंदिर में पूजा करने वाली महिलाएं सुहागवती रहती हैं। मसलन, पति के पहले सुहागन मरने का आशीर्वाद यहां पूजा-अर्चना करने वाली विवाहिता महिलाएं मांगती हैं। जो हो, मंदिर से 25 किमी दूरी पर जिला मुख्यालय के मकतपुर अरगाघाट रोड स्थित ब्रह्म समाज के केंद्र में किसी अनुयायी को आते-जाते खुद इस केंद्र के मालिक और संचालक इंद्रनील सुदंर बनर्जी और उनके पिता नितेंद्र सुंदर बनर्जी ने किसी को नहीं देखा है।

दो नदी के समागम पर है मंदिर

मालूम हो कि गांडेय प्रखंड में भदवा बेलाटंाड़ गांव के दखनीडीह टोला में शारदा नाथ सिंह नामक व्यक्ति रहा करते थे। युवावस्था में ही उनकी शादी हो गई। शादी के बाद दोनों का दाम्पत्य जीवन खुशहाल था। दोनों के बीच प्रगाढ़ प्रेम था। शारदा नाथ सिंह की पत्नी देवकी देवी सावित्री व सत्यवान के प्रेम के किस्से से प्रभावित थीं। लेकिन वट सावित्री की पूजा के कुछ महीने बाद यानी वर्ष 1962 में शारदा नाथ सिंह की मौत हो गई। इसपर देवकी देवी ने भी सावित्री की तरह अपने पति को यमराज से वापस लाने के तप में जुट गई। उसने अपनी अंगुली को कपड़े से लपेट कर और उसमें घी लगाकर दीप बनाया। अपनी अगुंली जलाकर शुरु की गई उसकी ईश्वरीय साधना से भी उसके पति जीवित नहीं हुए। तब दौड़कर श्मशान घाट गई और अपने पति की चिता में कूद कर उसने जान दे दी। बाद में गांववालों ने देवकी को उठाकर अलग से चिता सजाई और उसका भी दाह संस्कार किया। इस घटना से सबक लेने और लोगों को अंधविश्वास के खिलाफ जागरूक करने की बजाए गांववालों ने शारदा नाथ सिंह और उनकी पत्नी देवकी देवी को भगवान ही बना दिया। साथ ही पिछरी और बिजली नदी के समागम पर उसका मंदिर बनवा दिया। मंदिर में शारदा नाथ सिंह व उनकी पत्नी देवकी देवी की पूजा होती है।

ऐसे हुई सति मंदिर की स्थापना

पति की चिता में कूद कर जान दे देने वाली देवकी देवी को गांव वालों ने सति का दर्जा दे दिया। जिस स्थल पर उसने जान दी, वह स्थल पिछरी और बिजली नदी के समागम पर है। यहां गांव वालों ने बैठक कर लोगों से सहयोग जुटाया और मंदिर की स्थापना कर दी। जिस वर्ष मंदिर की स्थापना हुई, उस समय फसलों की पैदावार अच्छी नहीं हुई थी। वावजूद इसके गांव वालों ने जरूरत के कामों को दरकिनार कर पैसे जुटाए और मंदिर बना दिया। मंदिर के निर्माण के बाद प्रतीक के तौर पर दो पत्थर मंदिर में स्थापित किए गए। इसमें एक को शारदा नाथ सिंह और दूसरे पत्थर को देवकी देवी का प्रतीक रूप दिया गया।

आठ साल पहले हुआ था यज्ञ

वैसे तो इस मंदिर में सालों भर धार्मिक अनुष्ठान और पूजा होती है, लेकिन आठ साल पहले मंदिर स्थल पर सति महायज्ञ का आयोजन किया गया था। इस यज्ञ में आसपास के दर्जनों गांवों से लोग आए थे। पास के एक गांव घासीरायडीह के सहदेव चैधरी नामक एक व्यक्ति ने यज्ञ के आयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

ब्रह्म समाज की नहीं चल रही कोई गतिविधि

दूसरी ओर ब्रह्म समाज केंद्र में कोई सामाजिक गतिविधि संचालित नहीं हो रही है। जिस भवन में ब्रह्म समाज का झारखंड स्तरीय मुख्यालय स्थापित हुआ था, उसे इंद्रनील सुंदर बनर्जी के दादा नवेंदु शेखर बनर्जी ने बनवाया था। इंद्रनील बनर्जी के मुताबिक इस भवन को उनके दादाजी ने समाज के जिम्मे वर्ष 1832 को किया था। तब ब्रह्मो विद्यालय भी यहां चलता था। इंद्रनील के दादाजी के बाद इसे उनके पिता डाॅ नितेंदु सुंदर बनर्जी ने इस विद्यालय को अपने और समाज के खर्चे पर चलाया। मगर बाद में ये विद्यालय बंद हो गया। इंद्रनील बताते हैं कि जिस जिले में ब्रह्म समाज ने सति प्रथा की खिलाफत की, वहां सति मंदिर के प्रति आस्था को लेकर वे कुछ नहीं कहेंगे। क्योंकि तर्क हमेशा आस्था से पराजित होता है। मगर वे चाहेंगे कि आज के दौर में अंधविश्वास की ओर रूख करने के बजाए लोग प्रगतिशीलता की ओर आगे बढ़े तो राजा राम मोहन राय जैसे समाज सुधारकों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित की जा सकती है।

पूजा से मिलेगा अंधविश्वास को बढ़ावा

इधर अंबेदकर सामाजिक संस्थान, गिरिडीह के सचिव रामदेव विश्वबंधु ने कहा है कि महिलाओं की मुक्ति का आंदोलन शुरु से महसूस किया जाता रहा है। सति प्रथा का खात्मा लंबे अभियान व प्रयास से हुआ। लेकिन, मंदिर में सति की पूजा से इस प्रथा को फिर से बढ़ावा मिल सकता है।

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