सिर्फ अहसास है, रूह से महसूस करो…

अमित राजा


प्यार को किसी रिश्ते का नाम नहीं देने की अपील करता एक गीत- ‘सिर्फ अहसास है रूह से महसूस करो, प्यार को प्यार ही रहने दो रिश्तों का नाम न दो…’ वैलेंटाइन डे पर मौजूं हो जाता है। क्योंकि भारत में विवादास्पद हो चुके प्रेम दिवस मसलन वैलेंटाइन डे के खिलाफ एक खास धारा के लोग नफरत पैदा करने की कोशिश में हैं तो दूसरी ओर बाजार वैलेंटाइन डे के स्वागत में बिछ गया है। प्रेम के प्रतीक संत वेलेंटाइन ने भी नहीं सोचा होगा कि कभी प्रेम को स्वदेशी और विदेशी खांचे में बांटा जाएगा या प्रेम का ऐसा व्यवसायिकरण होगा। जो हो, अब वैलेंटाइन डे के बहाने प्रेम की समग्र व्याख्या जरूरी समझी जाने लगी है।

सूफीवाद ने प्रेम को आध्यात्मिक ऊंचाइयां प्रदान की है। यह प्रेम को आध्यात्म और ध्यान से जोड़ता है। बसंतोत्सव हमारे देश में प्रेमोत्सव के रूप में मनाया जाता है और बसंत ऋतु में ही संत वेलेंटाइन की याद में वैलेंटाइन डे मनाया जाता है। लेकिन वैलेंटाइन डे के विरोध और पक्ष में देश की दो अलग-अलग ताकतें काम कर रही हैं। वैलेंटाइन डे का प्रचार-प्रसार कर एक ओर बाजार अपना हित साधता है, तो इसका विरोध कर कुछ सियासी पार्टियां और उसकी सहयोगी इकाईयां अपनी राजनीति चमकाने में लगी है। वैलेंटाइन डे को खुशामदीद करने के लिए एक से एक ग्रिटिंग्स बाजार में उतारे जाते हैं, इस दिन एक-एक गुलाब 50 से सौ रुपये में बिकता है। ऐसे में कह सकते हैं कि तथाकथित प्रेम समर्थक बाजार और प्रेम विरोधी राजनीतिक संगठनों के इस टकराव में दोनों का परस्पर हित सधता है। जबकि नुकसान केवल संत वेलेंटाइन के अनुयायियों का होता है।

प्रेम का अर्थ कहीं-कहीं भले ही बेचैनी हो, मगर कुल मिलाकर इसका मतलब समर्पण होता है। वैसे, संपूर्ण प्रेम में तो न समर्पण बचता है न प्रेम का आग्रह। सूफीवाद में प्रेम की अलग ही परिभाषा है, मगर बहुत तल्ख और अकाट्य। सूफी नृत्य में तरंगों का महामिलन होता है, तब व्यक्ति केवल व्यक्ति नहीं रहता। फकीरों के जीवन में आध्यात्म की ऊंचाई का मूल आधार ही प्रेम है। सूफीवाद और इश्क घुल मिलकर खुद को खुद के पास लाता है। यह खुद से रिश्ता बनाने का अवसर देता है। प्रेम में और गहरे जाने पर और कई नये अर्थ मिलते हैं। वह गलत हैं, जो कहते हैं कि प्रेम के रिश्ते में कोई लोकतंत्र नहीं होता, केवल तानाशाही होती है। सच यह है कि ऐसी बात वहां होती है, जहां दो पक्ष या पार्टियां हों। प्रेम में तो एक ही पार्टी है। क्योंकि संपूर्ण समर्पण एकलय कर देता है। एक स्त्री से पुरूष का प्रेम, प्रेम के गहरे अर्थों में सिर्फ पुरकता या संपूर्ण होने की खोज का हिस्सा है। स्त्रियां सेक्स नहीं, संपूर्ण संस्कृति की रचना का बिंब होती हैं। इस तरह प्रेम में भावनाएं और नॉस्टेल्जिया, मासूमियत और सौंदर्य, असहायता और उत्तेजनात्मकता, अध्यात्म और यथार्थ, साहित्य और सत्य, कला और किस्मत की बिडंबनाएं, अतीत की स्मृतियां और दिल की टूटन-तमाम विरोधाभास आकार लेते हैं। जीवन को अनूठे ढंग से जीना नहीं, जीवन में अनूठापन खोजना ही ऐसे प्रेम की सच्ची शुरूआत है।

प्रेम करना नहीं, उसे जीना यानी महसूस करना चाहिए। इससे हरेक काम आसान हो जाएगा। अनंत प्रेम के इस अंदाज का मतलब दुनियावी सच्चाइयों में अपने कर्त्तव्यों से दूर होना नहीं, बल्कि उसके और करीब जाना है। कोई रिश्ता, कोई भावना प्रेम से अछूती नहीं होती। रिश्ते अगर जटिलताओं में जाते हैं, तो उसका आधार भी प्रेम ही है। एक शख्स की आदत दूसरे से मेल नहीं खाती फिर भी वे एक-दूसरे के करीब आते हैं। रिश्तों पर, मन पर, जीवन पर प्रेम गहरा असर छोड़ता है। बात बहुत ऊंची लगती है, पर है साधारण। साधारण है, मगर ऊंची लगती है। इसलिए इश्क गरीबों से अमीरों तक के लिए एक ही तरह बहता रहा है। सच्चाई को पाने का रास्ता सिर्फ हृदय का रास्ता है। सभी इसी रास्ते से जाना चाहते हैं। लोग साइंसदां हो गये हैं। मनोविश्लेषण करते हैं। तमाम थ्योरियां आती हैं। प्रेम के आधार खोजे जाते हैं। सर्वे कराये जाते हैं। खुशी, जिंदगी तमाम लफ्जों का सार इश्क में है। बगैर इश्क के रिश्ते नहीं बनते और इश्क से ही रिश्तों की कैमिस्ट्री बदल जाती है। प्रेम को गुत्थी मानने वाले इसे सुलझाने में लगे हैं। मगर गुत्थियां हैं कि बढ़ती जाती हंै। आदमी को आदमी के करीब लाना और दुनिया को बदल देने का हौसला भी प्रेम से ही ताकत पाता है। इसलिए जब हम जिस्म पर ठहरते हैं तो उसकी ताकत रूह में ही पाते हैं। चांद, आकाश, सांसें, पानी सब हमें नये-नये बिंब देते हैं। ये बिंब हमारे अनुभवों से बदलते हैं। हम उसी नजर से उसकी व्याख्या करते हैं। लेकिन हर अनुभव दूसरे से अलग होता है। ऊपर से अलग रहते हुए भी वह किसी न किसी स्तर पर अपनी तरह का अकेला होता है। संवेदना के स्तर पर हम उसे महसूस कर सकते हैं। यह समान स्तर का प्रेम होता है। हम अक्सर सतह पर होते हैं। सतह तक के रास्ते खोजे हुए हो सकते हैं, पर भीतर जाने का रास्ता हमें ही तलाशना पड़ता है। इसलिए अमूमन हम हर बार चौंकते हैं। ख्वाब देखते हैं। उदास होते हैं। फिर ख्वाबों में जाना चाहते हैं।

दरअसल, प्रेम सर्वोच्च शक्ति की सर्वोच्च शक्ति के लिए तलाश है। उसकी अभिव्यक्तियां अलग-अलग है। रंगत-शेड्स बदलते रहते हैं। मगर उसमें दैहिक और आत्मिक अभिव्यक्तियां साथ-साथ होती हैं। जिसे संपूर्ण प्रेम हो जाता है, उसका जीवन नृत्य हो जाता है। इश्क की रूह तक पहुंचना मुश्किल है और इश्क रूह में बसता है। यहां तक पहुंचकर जिसे हम प्रेम करते हैं, वही हमारा खुदा हो जाता है। यह अहसास सही मायने में एक इन्वाल्वमेंट है। यह भावनाओं का उद्रेक है, जिसे हम दिल कह देते हैं। और, जज्बा एक भावनात्मक रसायन है, जो शरीर में कहीं पैदा होता है। हम दिल को दिल के इन्वाल्वमेंट यानी जज्बे को बायोलॉजी की दृष्टि से परिभाषित नहीं कर सकते हैं। इसमें और कुछ नहीं होता, आदमी बावरा सा रहता है। और इस बावरेपन का उस स्थिति से कोई रिश्ता नहीं है, जिसे डॉक्टर पागलपन कहते हैं। यह बावरापन भावनाओं की एक स्थिति से ऊपर है, जिसमें व्यक्ति खुद को भूलकर किसी दूसरे में समाहित कर लेता है। मगर, यह बुलबुला नहीं इश्क होता है। हम किसी से कितना प्यार करते हैं? यह उसके प्रति हमारे लगाव या आवेश और शिद्दत पर निर्भर करता है। प्रेमी-पे्रमिका भी इस अहसास को जीते हैं, मां-बेटा भी। पर, प्यार यहीं तक सीमित नहीं है। व्यक्ति के संस्कार, आबोहवा, सूरज, मिट्टी, नींद की गंध, पेड़-पौधे यह सब जब व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाते हैं-तब प्यार होता है।

कौन थे संत वैलेंटाइन

14 फरवरी को कैथोलिक संत वैलेंटाइन का शहीद दिवस है। वैलेंटाइन डे के रूप में प्रेम का पर्व यही दिन बन गया है। संत वेलेंटाइन तीसरी शताब्दी के थे। वे रोम में थे तो वहां सम्राट क्लॉडियस का शासन था। क्लॉडियस ने ये मानकर कि अविवाहित पुरुष विवाहित पुरुषों की तुलना में ज्यादा अच्छे सैनिक हो सकते हैं- अपने साम्राज्य में सैनिकों और अधिकारियों के विवाह करने पर ही रोक लगा दी। संत वैलेंटाइन ने इस आदेश का विरोध किया। वैलेंटाइन ने इस आदेश की अवहेलना कर कई सैनिकों और अधिकारियों की गुप्त शादियां करायी। सम्राट को इस बारे में जानकारी मिली तो उन्होंने वैलेंटाइन को मौत की सजा दे दी। 14 फरवरी के दिन ही संत वैलेंटाइन को फांसी पर चढ़ाया गया।

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