हामिद अंसारी को याद करने का मौका भी जरूरत भी

अमित राजा

एम वैंकेया नायडू देश के नये उपराष्ट्रपति चुन लिये गये हैं। इस पद के लिए 10 अगस्त को जिन हामिद अंसारी का कार्यकाल पूरा हो जाएगा, वे कई कारणों से याद आ रहे हैं। उन्होंने 10 साल तक पूरी गरिमा के साथ इस महत्वपूर्ण पद पर काम किया। उन्होंने कभी ऐसा नहीं किया कि विवाद हो। पूरी तरह निर्विवादित रहे। उनकी कमी खलेगी। उन्हें अभी याद करने के कारण हैं। गुजरात दंगों के वक्त अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली तत्कालीन गुजरात सरकार के कामकाज को लेकर अपनी राय रखी थी। सो, उनके नाम पर आम सहमति बनने का तो सवाल ही नहीं था। कांग्रेस ने जब उनको पहली दफा राज्यसभा के सभापति पद के लिए नामित किया था तो लोगों शक था कि वे संसद के उच्च सदन की कार्यवाही का संचालन कर पाएंगे या नहीं। मगर, अंसारी ने खुद को साबित किया। वे साफ बोलने वाले साबित हुए। साथ ही कूटनीतिक तौर-तरीके अपनाने में भी पीछे नहीं रहे। यह गुर उन्होंने भारतीय विदेश सेवा के अपने कार्यकाल में सीखा था। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि भी रहे। उन्होंने सऊदी अरब, ईरान और अफगानिस्तान में भारत के राजदूत के बतौर काम किया।
अंसारी ने हमेशा दूरदृष्टि रखी। सउदी अरब और ईरान से संबंधों को लेकर उन्होंने जो सुझाव दिये और जिन बातों को रखा वह यही साबित करता है। उनके सुझावों में भारत का आर्थिक हित भी छिपा था। दो-ढाई दशक पहले जब इस्लामिक देशों के संगठन की गतिविधियां भारत के लिए गंभीर मसला थीं, तब पाकिस्तान और सऊदी अरब उस मंच पर अक्सर कश्मीर को लेकर भारत की आलोचना करता था। तब अंसारी ने अपने काम, वक्तव्य और अपनी दृष्टि से उस सोच में बदलाव लाया। उनका तर्क था कि कश्मीर सऊदी अरब और ईरान के बीच इस्लामिक देशों के नेतृत्व की लड़ाई में एक छद्म मुद्दा बना हुआ है। नई दिल्ली में उन्होंने कहा कि इस्लामिक देशों के संगठन और सऊदी अरब की ओर से कश्मीर को लेकर की जा रही बातों की अनदेखी होनी चाहिए। उन्होंने सऊदी अरब के साथ स्वतंत्र संबंध बनाने की भी वकालत की। क्योंकि मुस्लिमों के पवित्र धर्मस्थलों वाले देश से भारतीयों के जरिये स्वदेश भेजा जाने वाला धन बहुत बड़ा था। जबकि सऊदी अरब केवल अमेरिका का एक विश्वस्त सहयोगी नहीं था, बल्कि वह लंबे समय तक दुनिया का सबसे बड़ा पेट्रोलियम उत्पादक देश भी बना रहने वाला था। भारत के लिए उससे सीखने को काफी कुछ था। क्योंकि वहां तेल की आय से बने स्वतंत्र वेल्थ फंड से कई तरह की सामाजिक सुरक्षा योजनाएं चल रही थीं।
वर्ष 2016 में मोरक्को के रबात स्थित मोहम्मद वी विश्वविद्यालय में ‘वैश्वीकृत विश्व में विविधता का समायोजनः भारत का अनुभव‘ विषय पर अंसारी ने कहा था कि अरब और इस्लाम, इन दोनों शब्दों का इस्तेमाल एक साथ या एक दूसरे के लिए किया जाता है। लेकिन, दोनों समानार्थी नहीं हैं। समस्त अरब विश्व इस्लामिक नहीं। सभी तरह के इस्लामिक सोच का श्रेय अरबों को नहीं दिया जा सकता है। उन्होंने कहा था कि भारत विविधता की बेहतर मिसाल है। पाकिस्तान, मिस्र व अन्य देशों में शियाओं और अन्य अल्पसंख्यकों पर हो रहे पंथीय हमलों के बीच यह एक तार्किक बात थी। अंसारी ने एक कहा था कि अगर सुन्नी इस्लामिक देश सोचते हैं कि सऊदी अरब को उनका इकलौता और निर्विवाद नेतृत्वकर्ता होना चाहिए तो उनको भारत की ओर देखना चाहिए। हामिद असारी मुसलमानों से कहा करते थे कि वे सरकारी राहतों पर निर्भर रहना बंद करें।
अंसारी ने पटना में एक व्याख्यान में कहा था कि पीडि़त दिखने की भावना काम नहीं आती है और मुस्लिमों को अन्य अल्पसंख्यकों के अनुभवों से सबक लेना चाहिए। वर्ष 2015 में ऑल इंडिया मजलिस-ए-मुशावरात की स्वर्ण जयंती पर एक समारोह में उन्होंने कुछ ऐसा कहा कि मुस्लिम समुदाय नाराज भी हुए। उन्होंने कहा था कि मुस्लिम समुदाय का एक अहम धड़ा दुष्चक्र में फंसा है और वह सांस्कृतिक रूप से बचाव की मुद्रा में उलझा हुआ है, जहां वह खुद की प्रगति को नुकसान पहुंचा रहा है। परंपराओं को पवित्र बनाया जा रहा है लेकिन परंपराओं के पीछे के तर्कों को भुला दिया गया है। आधुनिकता की भावना को तवज्जो नहीं मिल रही। इससे समुदाय की बेहतरी का रास्ता बाधित है।

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