हिटलर और चीनी शासक के बीच समानताएं

अजय शुक्ला

समकालीन चीन की जनता के मिजाज को समझने के लिए लोगों को क्लासिक प्रोपगंडा डॉक्युमेंट्री ट्राइंफ डी विलेंस (संकल्प की जीत) देखनी चाहिए। यह फिल्म एडॉल्फ हिटलर के आदेश पर जर्मनी की अभिनेत्री फिल्मकार लेनी रिएफेन्स्टॉल ने बनाई थी। इसकी शुरुआत नाटकीय अंदाज में होती है जहां बताया जाता है कि कैसे जर्मनी ने प्रथम विश्वयुद्ध के अवमान को पीछे छोड़कर आगे बढ़ना शुरू किया। इसमें सन 1934 में न्यूरेमबर्ग में हुई नाजी पार्टी की विशाल रैली के दृश्य हैं। फिल्म में दिखाया जाता है कि 5 सितंबर, 1934 को विश्वयुद्ध की शुरुआत के 20 वर्ष बाद यानी जर्मनी की प्रताड़ना के 16 वर्ष बाद जर्मनी के पुनर्जन्म (हिटलर के चांसलर बनने के ) 19 महीने बाद एडॉल्फ हिटलर ने सैन्य प्रदर्शन के लिए एक बार फिर न्यूरेमबर्ग का रुख किया।
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की एक प्रोपगंडा फिल्म के स्वर काफी हद तक हिटलर की उस फिल्म से मेल खाते हैं। इसमें दिखाया गया है कि 30 जुलाई 2017 को चीन की प्रताड़ना की सदी (पहला अफीम युद्ध) की शुरुआत के 177 साल बाद चीन के पुनर्जन्म (चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के सत्ता में आने के) 68 वर्ष बाद चीन के स्वप्न को हकीकत में बदलने की शुरुआत के पांच साल बाद शी चिनफिंग एक सैन्य प्रदर्शन के लिए झूरिहे पहुंचे। रिएफेन्स्टॉल की फिल्म और उसमें दिखाए गए उत्साहित जर्मन काफी कुछ वही दृश्य रचते हैं जो आज चीन में देखने को मिल रहा है। वर्दीधारी हिटलर ने सन 1934 में नाजी पार्टी के सैल्यूट को जर्मन सैनिकों, अर्द्धसैनिकों और जनता तक पहुंचा दिया। वहीं चीन में शी चिनफिंग ने अपने सैनिकों से कहा- हैलो कॉमरेड्स। कॉमरेड आप लोग कड़ी मेहनत कर रहे हैं। उनकी इस बात पर ठीक जर्मन सैनिकों की तरह चीन के सैनिकों ने भी दोहराया- हम जीतने के लिए लड़ेंगे। हिटलर ने जर्मनी की सेना को नाजी पार्टी के अधीन कर लिया था। ठीक उसी तरह शी चिनफिंग ने रविवार को पीएलए से कहा कि वह हमेशा पार्टी के आदेश सुने और उनका पालन करे तथा पार्टी के कहे मुताबिक चले। माओत्से तुंग की 1938 में कही बात याद कीजिए- सत्ता बंदूक की नाल से निकलती है। हमारा सिद्धांत है कि बंदूक पर पार्टी का शासन होता है, पार्टी पर बंदूक का शासन नहीं होना चाहिए।
राजनीतिक प्रतीकों में समानता और जर्मनी और चीन के शासकों की भाषायी समानता एक प्रश्न पैदा करती है कि क्या सैन्य शक्ति को लेकर उनके विचार भी समान होंगे? हिटलर ने कहा था कि सेनाएं शांति के लिए नहीं होतीं। वे केवल युद्ध जीतने के लिए होती हैं। गत रविवार को शी ने भी दोहराया कि पूरी दुनिया में शांति नहीं है और शांति की रक्षा आवश्यक है। उन्होंने एक मजबूत सेना बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। शी चिनफिंग ने लगभग धमकी देने के अंदाज में कहा कि पीएलए किसी भी तरह के आक्रमणकारी को ध्वस्त कर देगी। उनकी बात से यह संकेत मिलता है कि सेना का इस्तेमाल केवल बाहरी आक्रमण के खिलाफ किया जाएगा। चीन ने अपने सुरक्षा हितों की जो परिभाषा तय की है उसके मुताबिक तो वह भीषण आक्रामकता का भी बचाव कर सकता है। मसलन दक्षिण चीन सागर में विवादित द्वीपों पर सैन्य कब्जा। डोकलाम में भी उसने ऐसा ही किया है। वह विवादित क्षेत्रों पर कब्जे के लिए एकतरफा तर्क गढ़ता रहा है। भूटान के दावे वाले क्षेत्र में भारत का मुकाबला चीन से है। अगर चीन भूटान साथ आ गए तो क्या होगा?
भारत को यह मानते हुए आगे बढना चाहिए चीन ने डोकलाम विवाद इसलिए नहीं पैदा किया है कि भारत के साथ सैन्य तनाव पैदा किया जाए। उसकी सोच है कि भारत इस वक्त पूर्ण प्रतिरोध नहीं करेगा। भारत के रुख और नीतियों में बदलाव के लिए चीन द्वारा राष्ट्रवादी उन्माद के प्रदर्शन और मीडिया का आक्रामक इस्तेमाल किया जा रहा है। भारत को झुकना नहीं चाहिए। देश के सैन्य नीतिकारों को चीन के प्रवक्ताओं और चीनी मीडिया की बयानबाजी के दबाव में नहीं आना चाहिए। वे सन 1962 की लड़ाई का जिक्र कर रहे हैं जो एक सीमित सैन्य ऑपरेशन था। बमुश्किल दो भारतीय डिविजन ने वह लड़ाई लड़ी जबकि सेना का 80 फीसदी हिस्सा जंग से बाहर रहा। आज देश की 12 डिविजन पहले दिन से मोर्चा संभाल सकती हैं। जबकि 25 अन्य डिविजन पश्चिमी और उत्तरी मोर्चे पर पाकिस्तान से निपट सकती हैं। जरूरत के मुताबिक लद्दाख, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में भी तैनाती की जा सकती है। सन 1962 में वायुसेना परिदृश्य से बाहर थी लेकिन अब पहाड़ी इलाकों पर भी उनके ठिकाने हैं। वायुसेना वहां भी अहम भूमिका निभा सकती है। इस बीच चीन सेना का प्रभाव सीमित रहेगा क्योंकि उसे तिब्बत में ऊंचे इलाकों से परिचालन करना होगा।
चीन ने तिब्बत में सड़क और ट्रेन का बुनियादी ढांचा तो विकसित किया है लेकिन भारतीय वायुसेना के समक्ष वह कितना टिक पाएगा यह देखना होगा। हालांकि भारत सड़क निर्माण में पीछे है और 73 की योजना में से केवल 22 सीमा सड़क ही बनी हैं लेकिन सेना आज सन 1962 की तुलना में बेहतर आवागमन कर सकती है। हथियारों की कमी अवश्य चिंता की बात है लेकिन सेना आज पहले की तुलना में काफी बेहतर स्थिति में है। चूंकि चीन को यह बात पता है इसलिए डोकलाम में व्यापक सैन्य प्रतिरोध की उम्मीद नहीं है। बल्कि भारत को यह मानकर चलना चाहिए कि चीन के सैनिक छोटी और मंझोले दर्जे की घुसपैठ करेंगे। इसके जरिये वे राजनीतिक संदेश देने की कोशिश करेंगे ताकि भारत पर दबाव बनाया जा सके। इनसे निपटने के क्रम में सैन्य योजनाकार अगर चीन की ऐसी हरकतों को स्थानीय स्तर पर ही निपटाएं तो बेहतर होगा। लेनी रिएफेन्स्टॉल 101 वर्ष की उम्र तक जिंदा रहीं और उनकी फिल्में कहीं लंबे समय तक कायम रहेंगी। परंतु न्यूरेमबर्ग की घटना के एक दशक बाद ही उस जर्मनी का पतन होने लगा। चीन जिस तरह अपने पूर्वी और दक्षिणपूर्वी पड़ोसियों तथा भारत के साथ तनाव बढ़ा रहा है, ऐसे में यह याद करना श्रेयस्कर है कि पीड़ित दिखने और शिकायती ढंग का राष्ट्रवाद एक दोधारी तलवार है।

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