हिन्दू-मुस्लिम कट्टर और आरएसएस-कांग्रेस उदार

सियासत में धर्मों के जरूरी साबित होने से उदार हो गये राजनीतिक दल

देश की सियासत जहां खड़ी है वहां राजनीति से धर्म को जुदा करना मुश्किल हो गया है। कोई अगर कह दे कि मौजूदा राजनीतिक माहौल से प्रेरित होकर हिन्हू-मुसलमान कट्टर हो गये हैं तो उसे आप काट भी नहीं सकते। हां, हाल की राजनीतिक गतिविधियों को देखें तो आपको जरूर लगेगा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस और कांग्रेस उदार हो गये हैं। हिन्दुत्व की बात करने वाला आरएसएस आपको धर्मनिरपेक्षता और धर्मनिरपेक्षता की बात करने वाली कांग्रेस आपको उदार हिन्दूवाद की ओर जाती हुई दिखेगी।

कांग्रेस की बात करेें तो वह इंदिरा गांधी के दौर में पहुंचने को बेताव है। इसके लिए कांग्रेस को उदार हिन्दुत्व का रास्ता दिख रहा है। कांग्रेस के भीतर यही बात चल रही है कि जब इंदिरा का शासन था तब तब कांग्रेस ने उदार हिन्दुत्व को अपना कर जनसंघ और संघ परिवार को कभी मजबूती से उभरने नहीं दिया। जबकि कांग्रेस को बदलते देख आरएसएस सावरकर के रास्ते से खुद को जुदा कर खुद के मुस्लिम विरोधी होने के दाग को मिटाने की कोशिश में है।

पिछले ही दिनों जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी पूजा करने द्वारका के मंदिर में पहुंचे तो पंडितों ने उन्हें इलाहाबाद के रहने वाले कश्मीरी पंडित बताकर पूजा करायी। दूसरी तरफ रविवार को नागपुर में संघ के दशहरा कार्यक्रम में पहली बार किसी मुस्लिम को मुख्य अतिथि बनाया गया। बाल स्वयंसेवकों की मौजूदगी में आरएसएस के उस कार्यक्रम में वोहरा समाज से जुडे़ होम्योपैथ डाॅक्टर मुन्नवर युसुफ को मुख्य अतिथि बनाया गया। ऐसे में एक तरफ कांग्रेस मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप को अपने दामन से मिटाने को बेेचैन है। जबकि संघ परिवार मुस्लिम विरोधी होने के दाग को ही धोना चाहता है।

राहुल गांधी जब द्वारका मंदिर पहुंचे तो पंडितों ने उन्हें दादी इंदिरा गांधी और पिता राजीव गांधी के हस्ताक्षरित पत्रों को दिखाया। इंदिरा गांधी 18 मई 1980 को द्वारका मंदिर पहुंची थीं। तो राजीव गांधी 10 फरवरी 1990 तो द्वारका मंदिर पहुंचे थे। पहली बार संघ अगर दशहरा कार्यक्रम में किसी मुस्लिम को मुख्यअतिथि बना रहा है तो संदेश जाता है कि संघ अपने हिन्दू राष्ट्र में मुस्लिमों के लिए भी जगह बना रहा है।

जाहिर है, आरएसएस और कांग्रेस धर्मों के आधार पर मतों का धुर्वीकरण देखकर ही खुद को बदल रही है। दोनों संगठन को मालूम हो कि देश में इन दिनों नकारात्मक मतदान का चलन है। ज्यादातर मुस्लिम अगर भाजपा को हराने की हैसियत रखने वाले किसी एक दल के पक्ष में वोटिंग करते हैं तो हिन्दुओं का बड़ा हिस्सा मुस्लिम तुष्टिकरण के खिलाफ मतदान केंद्रों में उमड़ता है। ऐसे में अब आरएसएस और कांग्रेस वोटिंग के नाम पर कट्टर होते हिन्दू-मुसलमानों को देखकर खुद उदार बनने लग गये हैं।

कुल मिलाकर कांग्रेस इंदिरा की ओर लौट रही है तो आरएसएस सावरकर माॅडल से अलग अपना रास्ता बना रहा है। दरअसल, सावरकर के हिन्दुत्व ने कभी मुस्लिमों को मान्यता नहीं दी। जबकि पूर्व में हिन्दुओं के विभाजन को रोकने के लिए सावरकर के हिन्दुत्व का संघ ने कभी विरोध नहीं किया था। संघ व्यापक हिन्दुत्व की सोच पर आगे बढ़ा है। कांग्रेस के उदार हिन्दुत्व को देख भाजपा चाहती है कि संघ कट्टर हिन्दुत्व वाली सोच को खारिज कर मुस्लिमों के साथ खड़ा दिखे।

उल्लेखनीय है कि कांग्रेस और हिन्दू सभा 1937 तक एक साथ थे। पंडित मदनमोहन मालवीय कांग्रेस के साथ साथ हिन्दू सभा के भी अध्यक्ष थे। हालांकि वर्ष 1937 में हिन्दूसभा की बैठक में जब सावरकर अध्यक्ष चुन लिये गये तो हिन्दू सभा, हिन्दू महासभा बन गई। इसी के बाद कांग्रेस और हिन्दू महासभा ने आपस में दूरी बनायी। बाद में आरएसएस और हिन्दू महसभा यानी हेडगेवार और सावरकर नजदीक आये। सावरकर ने वर्ष 1923 में अलग हिन्दू राष्ट्र और अलग मुस्लिम राष्ट्र का भाषण भी दिया और हिन्दुत्व की किताब में भी मुस्लिमों को जगह नहीं दी। सावरकर के हिन्दुत्व की आलोचना संघ इसलिए नहीं कर सका क्योंकि सावरकर का जहां भाषण होता दूसरे दिन से वहां संघ की शाखा शुरु हो जाती। जब जनसंघ बना तो हिन्दू महासभा से निकले श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने ही जनसंघ की स्थापना की।

उधर, कांग्रेस की हाल की राजनीति पर महीन नजर डालें तो देखेंगे कि वह मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति से खुद को मुक्त कर रही है। पिछले महीने तीन तलाक पर अदालती फैसले को लेकर कांग्रेस का जो अधिकारिक बयान आया, वह बड़ा संयमित था। कर्नल पुरोहित को मिली जमानत का भी कांग्रेसियों ने स्वागत किया। अब इलाहाबाद हाई कोर्ट की ओर से मदरसों में राष्ट्रगान को जरूरी किये जाने का भी कांग्रेस प्रवक्ता ने स्वागत कर दिया है। इसे कांग्रेस में नीतिगत बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है।

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